अभी कड़वी रहेगी चीनी
पानीपत. सरकार भले ही महंगाई कम करने के सब्जबाग दिखा रही हो, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। आलम यह है कि महज एक साल के भीतर चीनी की कीमतें दोगुनी हो गईं हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के हालिया बयान के बाद तो चीनी के भाव 37 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं।
हरियाणा में गन्ने का रकबा लगातार गिर रहा है। 2008-09 में इसका रकबा 2.34 लाख एकड़ था जो 2009-10 में 11 फीसदी गिरकर 2.05 लाख एकड़ रह गया। प्रदेश के गन्ना कमिश्नर के मुताबिक 2008-09 में हरियाणा में चीनी उत्पादन 22.88 लाख टन था। लेकिन इस बार गन्ने की कम बिजाई से चीनी उत्पादन में कमी आ सकती है।
और बढ़ेंगी मुश्किलें
पानीपत डिस्ट्रीब्यूटर (एफएमसीजी) एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश गर्ग का कहना है कि सरकार ने अक्टूबर में देश के लिए चीनी का कोटा 18.5 लाख टन घोषित किया था, लेकिन नवंबर में 3.5 लाख टन की कटौती कर 15 लाख टन कर दिया है। जाहिर है चीनी की कीमतों में और इजाफा होगा। गर्ग का कहना है कि मौजूदा समय में देश में चीनी का स्टॉक नहीं है।
उत्पादन फिर घटने के आसार
देश में चालू वित्तीय वर्ष में भी चीनी का उत्पादन कम होने के आसार हैं। 2008-09 में भी चीनी का उत्पादन 150 लाख टन था, जबकि खपत करीब 240 लाख टन है। यानी 90 लाख टन कम उत्पादन तो पहले ही था। 2009-10 में देश में चीनी का उत्पादन 160 लाख टन ही होने की संभावना है।
एक अनुमान के मुताबिक अकेले हरियाणा में रोजाना करीब 1200 टन चीनी की खपत है। घरेलू आवश्कताओं की पूर्ति के लिए केंद्र सरकार को 43 से 48 लाख टन चीनी का आयात करना पड़ेगा। कृषि मंत्री ने कहा कि 3.3 लाख टन व्हाइट चीनी, जोकि भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच चुकी है वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आंवटित होगी, जबकि अधिकारियों के मुताबिक उक्त चीनी खुले बाजार में बेची जाएगी।
क्या कहा था पवार ने ?
कृषि और खाद्य मंत्री शरद पवार द्वारा महाराष्ट्र के चीनी उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए समय से पहले ही उत्पादन में 100 लाख टन कमी की घोषणा कर दी गई थी। इसके बाद खुले बाजारों में चीनी के दाम 32-35 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए।
जिससे देशभर में हंगामा मच गया। इस दौरान जमाखोरों से हजारों क्विंटल चीनी भी जब्त की गई। इस कार्रवाई से एक महीने तक इसके दाम 28-31 रु. के करीब टिके रहे, लेकिन 31 अक्टूबर को फिर कृषि मंत्री के बयान ने चीनी के दाम उछाल दिए।
गन्ने पर दुविधा में सरकार
चालू पेराई सीजन (2009-10) में गन्ने की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार दुविधा में है। गन्ने की नई मूल्य प्रणाली फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) और राज्य सरकारों द्वारा तय किए गए राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) की कीमतों के अंतर का भुगतान चीनी मिलें करेंगी या राज्य सरकार, इस पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
बुधवार को शरद पवार ने कहा कि चीनी की कीमतें बढ़ी हुई हैं इसलिए मिलों को गन्ना किसानों को ज्यादा दाम देना चाहिए। एफआरपी के तहत गन्ने का समर्थन मूल्य 129.84 रुपए प्रति क्विंटल (9.5 रिकवरी के आधार पर) तय किया गया है।
मांग पर अड़े किसान
2009-10 के लिए हरियाणा ने 175 से 185 रुपए, पंजाब ने 170 से 180 रुपए तथा यूपी ने गन्ने का एसएपी 162.50 से 170 रुपए प्रति क्विंटल तय किए हैं। वहीं, यूपी और पंजाब सरकारें एफआरपी और एसएपी की कीमतों के अंतर के भुगतान से इनकार कर चुकी हैं।
चीनी मिलें भी किसानों को एफआरपी से ज्यादा दाम देना नहीं चाहती। ऐसे में उत्तर भारत के किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। यूपी में तो किसानों ने आंदोलन भी शुरू कर दिया है। इससे गन्ने की पेराई शुरू नहीं हो पाई है। किसान मिलों को 280 रुपए प्रति क्विंटल से कम पर गन्ना देने को तैयार नहीं हैं।











