जीवन दर्शन. एक गांव की यात्रा के दौरान गांधीजी ने ग्रामीणों से कहा- खाली समय में आप क्या करते हैं? ग्रामीणों का कहना था कि उस समय हम खाली बैठते हैं। तब गांधीजी ने कहा- कर्म की बुआई और चरित्र की कटाई करो।
गां धीजी एक छोटे से गांव में पहुंचे तो उनके दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर व्यक्ति उन्हें देखना और उनसे बात करना चाहता था। गांधीजी स्वयं भी सहज स्नेही थे। सो उन्होंने सभी से प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया।
तत्पश्चात भोजन व विश्राम हुआ। जब शाम को गांधीजी गांव की चौपाल पर बैठे तो उन्होंने ग्रामीणों से प्रश्न किया- इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं? लोगों के समूह में से एक वृद्ध उठकर खड़ा हुआ और गांधीजी को प्रणाम कर बोला- आप तो अत्यंत ज्ञानी हैं, क्या आप नहीं जानते ज्येष्ठ मास में खेतों में कोई फसल नहीं होती।
अत: बोने-काटने का प्रश्न ही निर्थक है। इन दिनों हम खाली रहते हैं। गांधीजी ने पुन: पूछा- जब फसल बोने व काटने का समय होता है तब क्या आप लोगों के पास बिल्कुल समय नहीं होता? वृद्ध बोला- उस समय तो रोटी खाने का भी समय नहीं होता। तब गांधीजी ने कहा- तो इस समय तुम लोग बिल्कुल निठल्ले हो और सिर्फ गप्पें हांक रहे हो। यदि तुम चाहो तो इस समय भी कुछ बो और काट सकते हो। ग्रामीणों ने उनसे इस बात को स्पष्ट करने का आग्रह किया।
तब गांधीजी बोले- आप लोग ऐसा कर सकते हैं : कर्म बुवाई और आदत की कटाई, आदत की बुवाई और चरित्र की कटाई, चरित्र की बुवाई और भाग्य की कटाई, तभी आपका जीवन सार्थक होगा। ग्रामीणों ने गांधीजी की बात का पालन किया और उनका जीवन सुखी हो गया। आशय यह है कि यदि हम कर्मठता को अपनी जीवनशैली बना लें तो निश्चित ही यह हमारे चरित्र को उज्ज्वल बनाता है और उज्ज्वल चरित्र हमारे सुखद भविष्य का निर्माणकर्ता होता है।










