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Saturday, November 07, 2009 00:15 [IST]  

danik bhaskarजीवन में जरूरी है शिक्षा और विद्या का संतुलन

पं. विजयशंकर मेहता

जीने की राह. विद्या संयम और सेवा करना सिखलाती है, किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में ही जीवन का आनंद है।



शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला, परंतु एक हानि भी हुई कि पढ़े-लिखे लोग अशांत हो गए। आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी, जो शोषण का कारण बनती गई। ये केवल शिक्षा के खतरे हैं। आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे- केवल शिक्षा ही नहीं, विद्या की भी आवश्यकता है।



शिक्षा केवल बाहरी जानकारी देती है और विद्या भीतरी अनुभूतियां कराती है। शिक्षा संस्थानों, पुस्तकों और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है किंतु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से। शिक्षा केवल विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है। शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जाएंगे लेकिन विद्या के लिए तो गुरु ढूंढ़ना पड़ेगा।



विद्या कहती है थोड़ा संयम साधो, आज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्य, सद्भाव का विस्तार करना ही सेवा है। विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है। किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा ने लोगों की खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया। केवल शिक्षा लोगों की आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है। आदतें ध्यान में बाधा हैं इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है। उसे विद्या का सहारा मिला तो वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जाएगा। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में ही जीवन का आनंद है। एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कराइए..।
-पं. विजयशंकर मेहता

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