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Saturday, November 07, 2009 02:23 [IST]  

danik bhaskarयहां गाड़ी चलाने पर हमें ईनाम तो दो

नीरज मैनरा/कुलदीप

लुधियाना. हाल ही में आपने टेलीविजन और अखबारों में चांद पर पड़े गड्ढे को देखा होगा, जो नासा के दागे गए राकेट से हुआ था। वैसे ही गड्ढे अगर आपको ‘साक्षात’ देखने हैं तो आपको चांद पर जाने की जरूरत नहीं है, बस फोकल प्वाइंट हो आइए। यह शहर का वह इलाका है जहां बड़े- बड़े गड्ढे आपको ‘जी आयां नूं’ कहेंगे, लेकिन वहां से गुजरते हुए आपका रोता हुआ मन यही कहेगा, ‘यहां आना न दोबारा’।



चलिए हम आपको ले चलते हैं फोकल प्वाइंट में, जहां सड़क में गड्ढे नहीं बल्कि गड्ढों में कहीं कहीं सड़क दिखती है। हम ढंडारी फ्लाईओवर को जोने वाली फोकल प्वाइंट की मेन रोड पर खड़े हैं। दूर से ही धूल के गुब्बार दिखाई दे रहे हैं, जो वाहनों के चलने से लगातार फिजा में बने हुए हैं। फर्राटे से निकलना तो सांस लेने में भी यहां मुश्किल है। सड़क की बात करें तो वह नदारद है।



आइए गड्ढों से निकल कर ‘सफर’ की शुरूआत करते हैं। फोकल प्वाइंट के अंदर जाने वाली मुख्य सड़क पर गुजरने वाले वाहनों की स्थिति देखिए, वह कभी दाएं झुकते हैं तो कभी बाएं। लगा, वाहन कमाल के न बने होते तो कभी के गिर जाते। कैमरे की लाइट चमकते देख आसपास के लोग भी जुट गए। उनकी आंखों में आस की किरण दिखी। उनके चेहरे के भाव बता रहे हैं,‘शायद अब तो प्रशासकों की आंखें खुलेंगी’।



पास ही खड़े पाल सिंह ने बताया,‘अर्सा हो गया, सड़क पर चले। कारोबारी मजबूरी न होती तो इधर देखते भी नहीं।’ सोहन सिंह ने कहा, ‘कोई सुनता ही नहीं।’उत्सुकता से हमे देख रहे युवक ने हमें पूछा, ‘बड़े गड्ढे देखने हैं तो मैं दिखाऊं।’ उसने अपना नाम संजय बताया। हमारे हामी भरने पर वह अपनी साइकिल पर आगे आगे चलने लगा। आगे का ‘नजारा’ देखकर हम दंग रह गए।



बलखाते हुए निकलते ट्राले देखकर पहले हमने सोचा सड़क टेढ़ी होगी, लेकिन नजदीक जाने पर पता चला वह छोटे गड्ढों से वाहनों को निकाल रहे हैं। तभी हमारे सामने से स्कूटर सवार निकले। उनका स्कूटर आधा ही सड़क के ऊपर दिख रहा था। यह उनके लिए रोज की बात थी, लेकिन हमारी आंखें खुली की खुली रह गई। दिमाग में विचार कौंधा, क्या प्रशासकों का यह हाल नहीं दिखता?



अब हम फोकल प्वाइंट की स्टेशन रोड पर खड़े हैं। यहां एक तरफ शायद सड़क बनाने का काम कभी शुरू हुआ था। मिट्टी को खोद कर निकाल लिया गया, फिर काम वहीं ठप रह गया। अगर इन रास्तों से आप परिचित नहीं हैं तो रात में हर्गिज यहां आने का जोखिम न उठाएं।



अगर वाहन में हैं तो वह निश्चित तौर पर कहीं गहरे गड्ढे में फंसें मिलेंगे, अगर पैदल चलेंगे तो औंधें मुंह गिर जाएंगे। ऐसा हाल एक या दो सड़कों का नहीं है, बल्कि समूचे फोकल प्वाइंट का है। यह सरकार या प्रशासनिक अधिकारियों को क्यों नहीं दिखते? ये तो वे ही जानें।



उनका कहना है



फोकल प्वाइंट की सड़कों की कायापलट करने की योजना बन चुकी है। पहले सड़कें आठ दस टन वजनी वाहनों के हिसाब से बनी थीं, अब उन्हें 40 टन वजनी वाहनों के हिसाब से डिजाइन किया गया है। पहले बनी सड़कों से सामग्री हटाकर नए सिरे से सड़कों को बनाया जाएगा। इन पर करीब 15 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। नगर निगम ने इनके टेंडर जारी कर दिए हैं, जो अगले हफ्ते में खुल जाएंगे। काम अलॉट होने के छह महीनों में फोकल प्वाइंट की दशा बदल जाएगी। इसके अलावा कुछ काम पहले भी अलॉट हो चुका है। - एमएस जग्गी, ज्वाइंट कमिश्नर, नगर निगम, लुधियाना।



क्या कहना है एसोसिएशन्स पदाधिकारियों का



फोकल प्वाइंट की कई महीनों से ऐसी ही दशा है। इन्हें सुधारने के लिए हमें सब्जबाग तो खूब दिखाए गए, लेकिन दावे कागजों तक ही सीमित हैं। वैसे भी सड़कों का निर्माण तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता। सड़कें बन कर टूट जाती हैं। उन पर कोई ध्यान देने वाला नहीं है। जनता का पैसा पानी में बह जाता है। निर्माण जल्द और पुख्ता ढंग से करवाया जाए। - रजनीश आहूजा, प्रधान फोकल प्वाइंटइंडस्ट्रियल शैड्स एसोसिएशन।



स्थानीय निकाय मंत्री मनोरंजन कालिया ने भरोसा दिया था कि फोकल प्वाइंट को स्वर्ग बना देंगे। लेकिन प्रेक्टिकल काम जीरो है। फोकल प्वाइंट फेज चार में स्टॉर्म सीवर डालने का 43 लाख रुपए का नगर निगम का काम था। वह ही उनसे नहीं हो पाया है, करोड़ों की सड़कें कैसे बनाएंगे? स्थिति बद से बदतर हो रही है। सड़कों का लैवल फैक्ट्रियों से ऊंचा हो चुका है, जो और मुसीबत दे रहा है। नीच से ऊपर तक वादे ही मिले हैं। पता नहीं वह कब पूरे होंगे। - दिनेश लाकड़ा, वरिष्ठ उपप्रधान, लघु उद्योग भारती, पंजाब।



कोई गली और सड़क ऐसी नहीं जो ठीकठाक हो। अगर फैक्ट्री से जाना हो तो यह सोचाना पड़ता है कि किस रास्ते से जाएं, जहां गड्ढे कम मिलें। सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं। यहां तक की मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खुद दशा देख चुके हैं, लेकिन स्थिति पत्थर पर पानी डालने वाली ही है। लोगों को अब खुद ही सोचना पड़ेगा, यह काम सरकार के बस में नहीं लगता। - एससी रल्हन,प्रधान, लुधियाना हैंड टूल्ज एसोसिएशन।



फोकल प्वाइंट की मौजूदा दशा कारोबार के लिए घातक साबित हो रही है। विदेश से आने वाले ग्राहक भी बुरी छवि लेकर लौटते हैं। उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पैरिस बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन हमारा उनसे यही आग्रह है कि वह हमें मूलभूत सुविधाएं ही मुहैया करवा दें। उन्होंने वादा भी किया था, जो वादा ही रह गया। फोकल प्वाइंट सबसे ज्यादा रेवेन्यू देता है, जबकि दुख सबसे ज्यादा उठाता है। - उपकार सिंह, ज्वाइंट सेकेट्ररी, चैंबर ऑफ कॉमर्शियल एंड इंडस्ट्रियल अंडरटेकिंग्स।

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