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Saturday, November 07, 2009 03:42 [IST]  

danik bhaskarबोलती हैं दीवारें, सुनने वाला चाहिए

राणा रणधीर

पटियाला. शमशान का नाम सुनकर भी इंसान वहां जाने का विचार छोड़ देता है। लेकिन एक विशेष परिस्थिति में उसे न चाहते हुए भी वहां जाना पड़ता है। शमशान न जाने का यह मिथक अब शाही शहर में टूटने वाला है। क्योंकि पटियाला के संस्थापक बाबा आला सिंह और पटियाला शाही घराने के सदस्यों का समाधि स्थल देश ही नहीं, विश्व मानचित्र पर एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में तैयार हो चुका है।



पिछले सवा साल से यहां चल रहा पुनर्निर्माण का काम अब लगभग पूरा हो चुका है। शीश महल और चार बाग का जीर्णोद्धार कर रही एजेंसी ने ही शाही समाधां की नुहार बदली है। एजेंसी का दावा है कि सिर्फ इसे मामूली समाधि स्थल मानने वाले लोग भी यहां की कलाकारी देख एक बार ताजमहल को जरूर याद करेंगे।



पयर्टन स्थल के रूप में मिला तोहफा: यहां महाराजा बाबा आला सिंह (देहांत संवत 1822) की समाधि है। समाधि स्थल के पीछे पटियाला राजघराने के कई पारिवारिक सदस्यों की समाधियां हैं। बाबा आला सिंह के समाधि स्थल का नीचला भाग चूने की नक्काशी से, तो स्थल का ऊपरी हिस्सा व्हाइट मार्बल पर नक्काशी कर निर्मित किया गया है। स्थल की तीसरी मंजिल पर अभी एक गुबंद अधूरा पड़ा है।



संभवत यह गुंबद निर्माण के समय से ही ऐसी अवस्था में है, जो आज तक वैसे ही पड़ा हुआ है। असल में शाही समाधां पर आम जनता के ज्यादा ना आने का कारण यहां समाधि स्थलों का होना था। इसके बावजूद सरकार और पयर्टन विभाग ने इसे टूरिज्म के लिहाज से तैयार करने के लिए काम शुरू किया। बिल्डिंग की खस्ता हालत को मरम्मत से ठीक किया गया।



देश के कई भागों से आए कलाकारों ने दीवारों पर हूबहू वैसी ही नक्काशी की जो कभी महाराजा पटियाला ने यहां करवाई थी। सिंगल पीस पिल्लरों और दीवारों पर सालों की मेहनत से कमाल की नक्काशी की गई है। इतना ही नहीं दीवारों की छतों पर बने गोल गुंबद एक बार ताजमहल की याद दिला देते हैं।



यहां भी गौर कीजिए



इतना कुछ होने के बाद भी समाधि स्थल की देख रेख करने वाला कोई न होने के कारण गंदगी की भरमार है। समाधि स्थलों पर नशेड़ियों ने खाली नशीले पदार्थो की बोतल और सिगरेट्स की टुकड़े गिराए हुए है। वहीं समाधि के पास घास न कटने के कारण गंदगी का आलम है।



इनकी है समाधि



यहां पटियाला राजघराने के महाराजा कर्म सिंह मोहिंदर बहादुर(12 अक्तूबर 1797-23 दिसंबर 1845), अमर सिंह बहादुर (संवत 1858-संवत 1838), महाराजा मोहिंदर बहादुर (संवत 1830बी-1869बी), महाराजा अरिंदर सिंह मोहिंदर सिंह (नाइट ग्राउंड कमांडर) समेत दो दर्जन समाधियां बनाई गई है।

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