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Saturday, November 07, 2009 05:23 [IST]  

danik bhaskarकरोड़ों का घोटाला!

भास्कर न्यूज

उज्‍जैन. कॉलोनाइजरों ने शासन और नगर निगम को बड़ी चालाकी से करोड़ों रुपए का चूना लगा दिया। जो राशि निगम के खजाने में आनी थी वह भू-माफिया की तिजोरी में चली गई। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की एक रिपोर्ट से इस घोटाले के उजागर होने का रास्ता खुला है। निगम ने जांच शुरू कर दी है।



नगर निगम ने कॉलोनियों की जांच शुरू की है। इसी क्रम में आयुक्त चंद्रमौली शुक्ला ने टीएनसीपी से 1987 से 98 तक स्वीकृत कॉलोनियों की जानकारी मांगी थी। टीएनसीपी ने शुक्रवार को रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। निगम अधिकारियों द्वारा रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। प्राथमिक जांच में करोड़ों रुपए का घोटाला उजागर होने के संकेत मिले हैं। निगम द्वारा कॉलोनाइजरों को नोटिस जारी किए जाएंगे।



ऐसे किया घोटाला



1998 के पहले तक कॉलोनी की स्वीकृति में 15 प्रतिशत भूमि गरीबों के आवास के लिए छोड़ी जाती थी। 1987 से 98 तक 30 कॉलोनियों को स्वीकृति दी गई। इनमें प्रत्येक में 15 प्रतिशत भूमि का कब्जा एसडीएम ने ले लिया था। 1998 में न्यायालय के आदेश पर प्रशासन ने कब्जा छोड़ दिया। 15 प्रतिशत भूमि के एवज में कॉलोनाइजरों को आश्रय शुल्क जमा करने का नियम लागू किया गया। आश्रय शुल्क 60 रु. प्रति वर्ग मीटर के मान से देय है। अधिकतर कॉलोनाइजरों ने कब्जा लेने के बाद 15 प्रतिशत भूमि का न तो आश्रय शुल्क चुकाया और न ही नगर निगम से निर्माण की अनुमति ली। इससे निगम को मिलने वाली आश्रय शुल्क, विकास व्यय व सुपरविजन चार्ज की राशि नहीं मिली।



रिपोर्ट उगलेगी राज



टीएनसीपी की रिपोर्ट के आधार पर निगम जांच कर रहा है। कितनी कॉलोनियों में कितनी जमीन छोड़ी गई थी और उनमें कितनों ने निर्माण की अनुमति ली। निगम के रिकॉर्ड से भी इसका मिलान किया जा रहा है। जानकार सूत्रों की मानें तो यह घोटाला करोड़ों नहीं अरबों में पहुंच सकता है। मामले की जांच उपायुक्त अशोक शुक्ला, इंजीनियर अरुण जैन व चंद्रकांत शुक्ला कर रहे हैं।



अधिकारियों पर उठेगी अंगुली



कॉलोनियों के इस घोटाले पर निगम की नजर अब तक क्यों नहीं पड़ी? कॉलोनियों की 15 प्रतिशत छोड़ी गई भूमि पर अवैध निर्माण होते रहे और निगम अधिकारी सोते रहे। निर्माण के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। जांच रिपोर्ट जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सवालिया निशान लगाएगी।



भास्कर एक्सक्लूसिव : केवल तीन ने ही ली अनुमति



इस अवधि में 30 कॉलोनियों को स्वीकृति दी गई थी। इनमें से मात्र तीन कॉलोनियों विद्यापतिनगर व अरोविल हाउसिंग की उज्जैन व गोयलाखुर्द कॉलोनियों में छोड़ी गई 15 प्रतिशत भूमि पर निर्माण की अनुमति ली गई। शेष 37 कॉलोनियों में 15 प्रतिशत राशि के भूखंड बेच दिए गए और बिना अनुमति निर्माण किए गए।



इससे निगम को करोड़ों रु. का चूना लगा। उदाहरण के लिए एक गृह निर्माण संस्था ने कुल क्षेत्रफल की 15 प्रतिशत 750 वर्ग मीटर भूमि पर निर्माण की अनुमति नहीं ली। यदि अनुमति ली जाती तो केवल आश्रय शुल्क के रूप में 45000 रु. चुकाना पड़ते। निगम के अन्य शुल्क अलग से चुकाना पड़ते। इस तरह से कॉलोनाइजरों ने अवैध निर्माण कर करोड़ों रु. बचा लिए।



अध्ययन कर रहे हैं



टाउन कंट्री प्लानिंग की रिपोर्ट मिल गई है। इसका अध्ययन किया जा रहा है। जांच के बाद कॉलोनाइजरों को नोटिस जारी किए जाएंगे।



चंद्रमौली शुक्ला, आयुक्तनगर निगम

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