हर जगह डेंगू के ठिकाने
बिलासपुर. शहर में हर जगह डेंगू-मलेरिया फैलाने का इंतजाम है। बजबजाती नालियां, कचरे के ढेर और पसरी गंदगी बताती है कि नगर निगम के पास मच्छरों से निपटने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। सवा करोड़ खर्च करने के बाद लार्वा कंट्रोल की मुहिम फ्लॉप हो चुकी है, अब मच्छरों पर काबू करने की कोशिश की जा रही है।
घर हो या आफिस, बाग-बगीचे हों या सार्वजनिक स्थान, बाजार हर कहीं लोगों को सुकून नहीं मिलता। चंद मिनटों में ही लोगों को मच्छर घेर लेते हैं। दिन हो या रात, लोगों को मच्छरों की भिन- भिन से निजात नहीं मिल पा रही है। परेशान लोग मच्छरों से राहत के लिए मजबूरन क्वाइल, मेट व मच्छर भगाने वाली दवाओं पर राशन की तरह हर महीने अपनी कमाई का एक हिस्सा खर्च कर रहे हैं।
निगम के खर्चे की बात करें, लार्वा कंट्रोल हो या मच्छरों को मारने के लिए फागिंग मशीन, दोनों में ही बराबर खर्च आता रहा है। निगम ने मच्छर उन्मूलन के लिए 2002 से 2006 तक लार्वा कंट्रोल के लिए भोपाल की लक्ष्मी पेस्ट कंट्रोल कंपनी को 1.98 लाख रुपए मासिक पर ठेका दिया।
31 मार्च 2007 को यह ठेका समाप्त हो गया। इसके बाद नया ठेका नहीं हुआ। लिहाजा जुलाई तक इसी कंपनी को दवा के छिड़काव का कार्य दिया गया। 8 अक्टूबर 2007 से लार्वा कंट्रोल के लिए स्थानीय यूनिवर्सल पेस्ट कंट्रोल को ठेका दिया गया। इस बार यह ठेका 1.81 लाख रुपए में दिया गया। ठेके की अवधि समाप्त होने के बाद यह कार्य अतिक्रमण निवारण दस्ते के सुपुर्द कर दिया गया।
विभागीयतौर पर चल रहे इस कार्य के अपेक्षित नतीजे नहीं मिले तो 30 अगस्त को इसे स्थगित कर पुन: नए टेंडर कराए गए। मामला अभी दर स्वीकृति पर अटका हुआ है। परेशानी की बात यह है कि यदि चुनावी आचार संहिता के पहले ठेके की कार्यवाही यानि निविदा समिति द्वारा दर स्वीकृति तथा उसे मेयर इन कौंसिल का अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ तो नगर निगम को मच्छरों के आगे हथियार डालने की नौबत आ जाएगी।
आटोमेटिक लिको मशीन सालों से बंद
नगर निगम में मच्छरों को मारने के लिए कुछ वर्ष पूर्व लाई गई लाखों की लिको फागिंग मशीन बंद पड़ी है। सूत्रों का कहना है कि चूंकि यह मशीन अधिक दवा एवं डीजल से संचालित होती है, परंतु इसके नतीजे कारगर होने के बावजूद इसे सिर्फ इसलिए कंडम कर दिया गया है, क्योंकि इसके जरिए लोगों को कमाई नहीं हो पाती। तुलनात्मक रूप से हेंड मशीन कम दवा के सहारे काम करती हुई दिखाई देती है, इसलिए महकमे के लोग इसी पर निर्भर हो गए हैं।
मच्छरों से बचने क्या करें
मच्छरों से बचने के लिए उनके पनपने के कारणों पर ध्यान देना होगा। मसलन घर के आस पास पानी भरे स्थानों, पानी टंकी, कूलर आदि से पानी निकालें। रुके हुए पानी भरे गड्ढों में मिट्टी का तेल डालें, तो लार्वा नहीं पनपेगा। लार्वा 7 दिन में मच्छर बन जाता है। अत: पुराने टायर, टीन या जिन जगहों पर पानी भरने की समस्या है, उनका तत्काल निराकरण करें। बहते हुए पानी में लार्वा नहीं पनपता। इसके अतिरिक्त मच्छरों से बचाव के लिए मेडिकेटेड मच्छरदानी का उपयोग आदर्श माना जाता है।
निगम का दावा झूठा: नेता प्रतिपक्ष
नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष बसंत शर्मा ने मच्छर उन्मूलन के लिए स्वास्थ्य विभाग के दावों को झूठ का पुलिंदा बताते हुए कहा कि किसी भी वार्ड में उन्होंने फांिगंग मशीन का इस्तेमाल होते नहीं देखा। निगम मच्छर उन्मूलन के मामले में गंभीर नहीं है। नवंबर शुरू हो चुका है। मच्छरों के लार्वा के पनपने के इस सीजन की शुरूआत के पहले ही लार्वा कंट्रोल का अभियान चलाना था, लेकिन शहर में अभी तक अभियान का पता नहीं है।
लार्वा कंट्रोल के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है। एमआईसी से अनुमोदन के बाद वर्क आर्डर हो जाएगा। जरूरत पड़ने पर इस अभियान को विभागीय तौर पर भी संचालित किया जा सकता है।
मुकेश बंसल, कमिश्नर नगर निगम
शहर में लार्वा कंट्रोल का अभियान बंद होने से लोगों को स्वाभाविक रूप से परेशानी हो सकती है। लार्वा कंट्रोल का प्रस्ताव एमआईसी में आते ही उसका क्रियान्वयन किया जाएगा। वास्तव में पुराने टेंडर की अवधि समाप्त होने के पहले ही नए टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर लेनी थी, जिससे समय पर काम चालू हो जाता।
विनोद सोनी, मेयर
मानसून के बाद अक्टूबर का महीना लार्वा के पनपने की दृष्टि से अनुकूल होता है, इसलिए इस अवधि में लार्वा कंट्रोल का अभियान चलाया जाता है। अभियान शुरू कराने के लिए प्रक्रिया चल रही है।
डा.ओंकार शर्मा, सफाई एवं स्वास्थ्य अधिकारी










