जब श्रोताओं ने सवालों की झड़ी लगा दी थी
सागर. उन्हें सुनने के लिए हम सब बैचेन थे। जैसे ही वह डॉयस के सामने बोलने के लिए खड़े हुए तो हॉल में सन्नाटा सा छा गया था। वह बोले। उनके विचारों को सुनकर मानो सभी अभिभूत हो उठे थे। उन्होंने अपनी वाणी पर अंतिम विराम लगाया ही था कि सामने बैठे श्रोता एक-एक करके सवाल पूछने लगे। उनके लिए सवालों की झड़ी लगा दी थी।
श्रोता आतुर थे कि उनके सवालों के जवाब वह किस तरह देते हैं। वह हर सवाल को धैर्य से सुनते और जवाब में उनकी बौद्धिक सतर्कता से श्रोता आनंदित भी हो जाते थे। जानेमाने पत्रकार प्रभाष जोशी की ऐसी ही कई यादें सागर से भी जुड़ी हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रवींद्र भवन में श्री जोशी ने स्व. बाबूराव पिंपलापुरे व्याख्यान माला (2008) में शिरकत की थी।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. सुरेश आचार्य ने किया था। प्रो. आचार्य बताते हैं कि श्री जोशी अपने मिलने वालों से एक परिवार के बुजुर्ग की तरह मिलते थे। व्याख्यान माला के पहले सुबह के समय वह सिविल लाइंस स्थित मीना पिंपलापुरे के बगीचे में बैठे थे। इसी समय मीडिया से जुड़े कुछ उत्साही युवक उनसे चर्चा करने आए।
वह उन पर एक टेली फिल्म की शूटिंग करना चाहते थे। श्री जोशी ने इन युवकों को समय दिया। बातचीत की। उन्होंने युवकों के हर सवाल का जवाब दिया। मैं भी समीप में बैठा सुन रहा था। उनकी बौद्धिक सतर्कता से आनंद होता था। वह जवाब देते-देते युवकों से बीच-बीच में कहते थे-ऐसा है कि नहीं।
वह अद्भुत क्षण था- श्री जोशी 1984 में डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में आए थे। वरिष्ठ साहित्यकार रमेश दत्त दुबे बताते हैं कि श्री जोशी के साथ में साहित्य अकादमी के संपादक गिरधारी राठी भी आए थे। विभाग में प्रभातजी का व्याख्यान हुआ था। पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह क्षण अद्भुत था। उन्होंने विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया था। कार्यक्रम के बाद वह एक दिन और सागर में रुके थे। विवि में उन्हें सुनने के लिए पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े कई लोग मौजूद थे। श्री दुबे बताते हैं कि इस दौरान उनकी श्री जोशी से व्यक्तिगत चर्चा भी हुई थी। खासतौर पर मैंने जिज्ञासावश उनके एक अखबार में प्रकाशित होने वाले कॉलम (कागज कोरे) पर चर्चा की थी।
सभी से आत्मीयता से मिले थे
1992-93 में स्व. लक्ष्मीनारायण दुबे की पुण्यतिथि के अवसर पर रवींद्र भवन में आयोजित कार्यक्रम में श्री जोशी आए थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार डॉ. आरडी मिश्र कर रहे थे। डॉ. मिश्र बताते हैं कि श्री जोशी सभी से आत्मीयता से मिले थे। कार्यक्रम में मैंने उन्हें सुना। इसी तरह स्व. बाबूराव पिंपलापुरे व्याख्यान माला में उन्हें सुनने का मौका मिला। तब का एक वाकिया याद है।
उन्होंने कहा था- विचार और वैचारिकता में बड़ा भेद होता है। प्रभाष जी के भीतर उनकी भाषा अलग थी। उनकी शैली अलग थी। शब्द संयोजन भी बड़ा सारगर्भित रखते थे। वह प्रभाव को सर्वथा अपने मौलिक विचारों में समन्वित करते रहे। वह निर्भीक, निष्ठावान और निष्पक्ष पत्रकार थे। उनके भीतर एक चेतना थी, अपनी मानव भूमि को निरंतर वे अपने अवचेतन में बनाए रखते थे।










