कुछ खिलाड़ी नहीं समझते उत्तरदायित्व
यह सचिन तेंडुलकर की सर्वश्रेष्ठ और कई मायनों में सबसे दु:खद पारी रही। भगवान को शायद यही मंजूर था। ऐसा लग रहा था कि तेंडुलकर अपने साथियों की गलतियों को ढंकना चाहता हो जिन्होंने निर्णायक क्षणों में महत्वपूर्ण कैच छोड़े, साधारण गेंदबाजी और बल्लेबाजी की।
यह आश्यर्चजनक है कि तेंडुलकर जैसे जीनियस ने स्तरहीन प्रदर्शन करने वाले अपने साथियों को कैसे झेल लिया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह ३६ वर्ष का हो चुका है और अभी भी उसमें युवाओं से ज्यादा चुस्ती और गजब का उत्साह है।
यह दु:ख की बात है कि शेष सभी भारतीय खिलाड़ी टीम के प्रति अपना उत्तरदायित्व इतनी गंभीरता से नहीं समझते हैं और यही वजह है कि कई बार वे जीती हुई बाजी भी अपनी कुछ गलतियों के चलते हार जाते हैं जिससे क्रिकेट प्रेमियों को घोर निराशा का सामना करना पड़ता है।
ऐसा लगता है कि कुछ खिलाड़ियों में खेल के प्रति उमंग और जीतने का जुनून कुछ हद तक खत्म हो गया है। हमारे गेंदबाजों और बल्लेबाजो को अपनी योग्यता के अनुरूप सावधानी से और पूरे आत्मविश्वस के साथ खेलना चाहिए।
ऐसे तनावपूर्ण माहौल में भी सचिन ने शानदार पारी का प्रदर्शन करते हुए अपने सभी चाहने वालों के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।










