दाम दे गए धोखा
कुरुक्षेत्र. भाई इबकै यो बासमती लाई तो न्यू थी के सारा टोटा लिकड़ ज्यागा। जे न्यू बेरा होंदा कि या धोखा देगी, तो क्यूं इतने दिहाड़े भरदे। थानेसर की अनाज मंडी में धान की ढेरियों पर बैठे किसानों का यही दर्द था कि चावल के भाव तो आसमान पर जा पहुंचे हैं, लेकिन उनकी धान को मेहनत के अनुसार भाव ही नहीं मिले हैं।
चावल का निर्यात तो सरकार ने खोल दिया। चावल नीति न होने के कारण किसानों को सबसे अधिक आया हुआ है। मंडी में इस समय 20 हजार क्विंटल से अधिक धान है, जिसमें से दो तिहाई बासमती है। बासमती के दाम मिलने की आस छोड़ी किसानों ने मंडियों में धान के सीजन का आखिरी दौर चल रहा है।
अब किसानों ने बासमती के भाव बढ़ने की आस छोड़ दी है। कुरुक्षेत्र में पिपली और थानेसर की अनाज मंडी में बासमती के ही ढेर हैं। पहली बोली में किसान इस कारण धान नहीं बेच रहे थे कि शायद एक दो दिन में अच्छा भाव मिल जाए।
गत वर्ष से अब की बार थानेसर की अनाज मंडी में 3 लाख 69 हजार 561 क्विंटल बासमती की आवक अधिक हुई है। पिछले साल 7 नवंबर तक 16 लाख 54 हजार 518 क्विंटल बासमती की आवक दर्ज की गई थी।
जो इस बार बढ़कर 24 लाख 24 हजार 79 क्विंटल हो गई है। किसानों ने अच्छे भाव मिलने की आस में ही बासमती की पैदावार पर अधिक जोर था। पिछले साल की तुलना में अब तक भले बासमती 41 हजार 748 क्विंटल अधिक बिक चुकी है।
परंतु भाव 900 रुपए प्रति क्विंटल कम रहे। इसके विपरीत डुप्लीकेट की आवक 4512 क्विंटल कम और सरबती की आवक एक लाख 3 हजार 660 क्विंटल कम रहने का कारण यही है कि किसानों का रूझान बासमती की ओर अधिक रहा।
कीमत में ज्यादा अंतर
चावल व धान की कीमतों में जमीन आसमान का अंतर क्यों, गांव बढेड़ा खालसा के किसान बनारसी दास कहते हैं कि बाजार में चावल की कीमत व धान की कीमत में जमीन आसमान का अंतर है। बासमती चावल की कीमत 50 से लेकर 100 रुपए किलो तो धान की कीमत केवल 27 रुपए किलो क्यों है। किसान की सबसे बड़ी मजबूरी है कि वे धान का स्टाक नहीं कर सकते। इसी का लाभ व्यापारी उठा रहे हैं।
मेहनत का नहीं मिला फल
युवा किसान राजकुमार यूनिसपुर कहते हैं कि किसान दिन रात मेहनत कर फसल पैदा करता है। जब फल मिलने का समय आता है तो उनका शोषण होता है। सरकार की गलत नीति के कारण ऐसा होता है। सरकार व्यापारियों को लाभ पहुंचाना चाहती है।
चावल की मांग है तो क्यों ना मिले दाम
किसान राजकुमार कहते हैं कि इस साल चावल का निर्यात भी खुला है और बाहर चावल की मांग की बढी है। फिर ऐसा क्या कराण है कि किसानों को बासमती के दाम सही मिल रहे। ये सारा काम सरकार है कि वह इस बात पर नजर रखे कि किसानों की मेहनत को कोई लूट न सके। इसके अच्छा तो ये है कि पीआर लगा कर दाम और बोनस दोनों हासिल करो। लेकिन पीआर में भी नमी के नाम पर किसानों से धोखा होता है।
किसान दब रहे हैं कर्ज में
थानेसर अनाज मंडी में आए किसान राजबीर कहते हैं कि इस बात से साफ जाहिर है कि सरकार व्यापारियों और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाना चाहती है। इस भाव से तो किसान अपने कर्ज भी नहीं उतार पाएगा। सरकार को चाहिए कि प्रदेश की चावल नीति घोषित कर बासमती का भी समर्थन मूल्य घोषित करे। इसके किसानों के पास विकल्प रहेगा कि वह बासमती लगाए या पीआर।










