एडुसेट अभी भी इसरो का
भोपाल. स्थापना के पहले से ही विवादों में रहा और काम शुरू होने के पहले ही आगजनी का शिकार हो चुका भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय का एडुसेट अभी भी इसरो की ही संपत्ति है। इसरो ने अभी तक इसे विश्वविद्यालय को हस्तांतरित नहीं किया है। इसी वजह से विवि को इसे दोबारा स्थापित करने में दिक्कत आ रही है। विवि प्रबंधन अब जले हुए एडुसेट की मरम्मत के लिए राशि का इंतजाम करने की कवायद में जुटा है।
विश्वविद्यालय के दूरस्थ केंद्रों पर विद्यार्थियों को सेटेलाइट के माध्यम से शिक्षा देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया एडुसेट विवादों से मुक्त नहीं हो पा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में विवि पर अपने बजट से इसकी मरम्मत कराने की मजबूरी आ गई है, क्योंकि अभी तक एडुसेट को विवि की संपत्ति घोषित नहीं किया गया है। दरअसल, इसरो ने एडुसेट की स्थापना के समय इसे एक साल तक संचालित करने के बाद ही इसका स्वामित्व पूरी तरह विवि को सौंपे जाने की शर्त रखी थी।
लेकिन इसी बीच एडुसेट आग की चपेट में आ गया। ऐसे में अब विवि फिर इसरो से मदद के लिए अनुरोध कर रहा है। फिलहाल विवि में एडुसेट को दोबारा स्थापित करने के लिए भवन और स्टूडियो बनाने का काम शुरू कर दिया गया है, लेकिन मुख्य उपकरण की मरम्मत का काम अभी भी अटका हुआ है।
ठंडा पड़ा प्रयास : भोज विवि ने प्रबंध बोर्ड की 41वीं बैठक में 89 लाख रुपए में एडुसेट की मरम्मत कराने की अनुमति तो ले ली, लेकिन इस राशि को यूजीसी के अनुदान से लेने के प्रस्ताव पर अडंगा लग गया। गौरतलब है कि दो माह पहले हुए कुलपतियों के सम्मेलन में राशि की मांग रखने पर यूजीसी अध्यक्ष ने एडुसेट ठीक करवाने के बाद ही अनुदान देने की शर्त रख दी थी। ऐसे में दूरस्थ शिक्षा परिषद ने भी यूजीसी से मिलने वाले अनुदान के स्थान पर विवि बजट से इसकी मरम्मत कराने को कहा है।
जांच पर विवाद : वर्ष 2003 में एडुसेट में आग लगने की घटना की जांच भी विवादों में घिरी है। विवि प्रशासन ने इस मामले की जांच के लिए विद्युत मंडल के एक अधिकारी सहित विवि के तीन अधिकारियों की समिति बनाई थी। इस समिति की जांच रिपोर्ट में एक करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन किया गया था। यह रिपोर्ट सरकार को भी सौंपी जा चुकी है, लेकिन शनिवार को बैठक में एडुसेट पर हुई अनौपचारिक चर्चा में फिर जांच पर सवाल उठाए गए।
घटना के समय एडुसेट प्रभारियों को ही जांच की जिम्मेदारी सौंपे जाने से बोर्ड के सदस्यों ने जांच की वैधानिकता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। अब कुलपति एसके सिंह जांच के मामले को उनके कार्यकाल के पहले का मामला बता कर इसे जल्द दुरुस्त करने की बात कह रहे हैं।










