मेरे मन के कांच में एक लड़की...

लड़की की गोद है एक जगह
जहां रखे जा सकते हैं मन के टूटे हुए टुकड़े
झील की लहरों पर जैसे सूरज रखता है
दुनिया के लिए पहने गए तमाम चेहरे
उसके सारे चेहरों को झील गलाती है
मेरे मन के टूटे कांच को गलाती है गोद
मेरे मन के कांच में सूरज उतर रहा है
सुनहरी हो उठी है मन की वादियां
हर टूटा हुआ मन का टुकड़ा चमक उठा
हर टुकड़े पर प्यार पिघल कर छा गया
और दुनिया के पानियों में घुलकर चमक उठा
मेरे मन के कांचो में लड़की बैठी है अकेली
सुनहरे व़क्त से अपनी मांग भरती हुई
वो दुनिया में अकेली सूर्यमुखी है
जिसे मैंने प्यार किया है
धरती के सारे रस उसके प्यार से भरे हैं
ये मेरी धरती का दृश्य है
और मैं इसमें गुÊार रहा हूं
अपने मन के कांचों में चमक रहा ह
युवा कवि रवींद्र स्वप्निल प्रजापति की कविताएं कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से पत्रकार हैं। भोपाल में रहते हैं।










