कुप्रबंध मिटे तो गंदगी हटे
जोधपुर. शहर में सफाई व्यवस्था का बंटाधार होने के पीछे सफाईकर्मियों की कमी तो मुख्य वजह है ही, मानव संसाधन का समुचित इस्तेमाल नहीं होना भी एक बड़ा कारण है। पिछले 5 वर्षो में निगम के संसाधनों में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
निगम प्रशासन ने करोड़ों रुपए में दो ठेका फर्मो को डोर—टू—डोर वेस्ट कलेक्शन का काम सौंपा, मगर सफाई जस की तस ही रही। ‘भास्कर’ ने जब हकीकत की पड़ताल की तो चौंकाने वाले पहलू सामने आए। ऐसा नहीं है कि निगम के पास पर्याप्त सफाईकर्मी तथा संसाधनों की जबर्दस्त किल्लत है।
हकीकत तो यह है कि बढ़ते राजनीतिक दखल तथा बदइंतजामियों का सीधा खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। वर्ष 1991 के बाद निगम को हर साल कुछ न कुछ संसाधन उपलब्ध होते रहे, लेकिन इसकी तुलना में सेवाएं व सुविधाएं नहीं बढ़ीं।
मैनपॉवर का कुप्रबंधन
पांच साल पूर्व राज्य सरकार ने दो हजार की जनसंख्या पर 5 सफाईकर्मियों का प्रावधान किया तो इसका काफी विरोध हुआ क्योंकि इससे सीधे तौर पर शहर की जनसंख्या के हिसाब से पूर्ववर्ती स्टाफ पैटर्न में कटौती हो रही थी। बहरहाल यह भी कड़वा सच है कि संसाधन बढ़ने के बावजूद उपलब्ध मैनपॉवर का निगम पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहा।
स्टाफिंग पैटर्न के अनुसार पहले एक हजार की आबादी पर 4 सफाईकर्मी का प्रावधान था। यदि इस लिहाज से भी देखें तो 6.66 लाख की आबादी (1991 की जनसंख्या के अनुसार) पर 2664 पद की स्वीकृति सही थी, मगर 17.50 प्रतिशत लीव रिजर्व के लिए 466 पद अतिरिक्त की स्वीकृति को व्यावहारिक नहीं माना गया था। हाल ही में राज्य सरकार ने निगम में सौ सफाईकर्मियों की नई भर्ती का ऐलान तो कर दिया, लेकिन इस पर खर्च होने वाली राशि के लिए कोई प्रावधान नहीं कर निगम को नई मुसीबत में डाल दिया।
केरू तक का मंहगा सफर
शहर में प्रतिदिन जमा होने वाला 250 मेट्रिक टन कचरा शहर के निर्धारित डंपिंग स्टेशनों से उठाकर शहर से 19 किमी दूर केरू भेजा जाता है, लेकिन ठेका फर्म व निगम कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते यह व्यवस्था भी सिरे नहीं चढ़ पा रही है। इसी प्रकार ठोस कचरा प्रबंधन के लिए स्वीकृत की गई 19 करोड़ रुपए की योजना भी ठोस नतीजे देने में नाकाम रही है।
इसके तहत पहले चरण में 45 वार्ड व दूसरे चरण में 5 अन्य वार्डो में डोर—टू—डोर वेस्ट कलेक्शन का काम ठेका फर्म कर रही है। यह फर्म ठोस कचरे में मलबे की मिलावट कर निगम को राजस्व का नुकसान पहुंचा रही है।
सालाना खर्च करोड़ों रुपए
आठ साल पूर्व की तुलना करें तो खर्च होने वाली राशि आधी ही थी। सफाईकर्मियों को दिए जाने वाले वेतन को शामिल कर दें तो सफाई पर सालाना खर्च साढ़े चार करोड़ आता है।ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर एनबीबीसी ने निगम को 1065 प्लास्टिक कंटेनर दिए थे।
प्रत्येक कंटेनर की कीमत 14 हजार रुपए आंकी गई है। डेढ़ साल में 400 से ज्यादा कंटेनर जल कर नष्ट हो चुके हैं, लेकिन निगम इसको लेकर गंभीर नहीं है। निगम ने इनके स्थान पर लोहे की चद्दर के कंटेनर भी बनवाए, लेकिन वे भी ज्यादा कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। रोबोर्ट मशीन भी खरीदी, वह भी धूल फांक रही है।










