Wednesday, November 11, 2009 01:12 [IST]  

danik bhaskarअसफल ब्रांड का दोहन

जयप्रकाश चौकसे

 kk_310खबर है कि विपुल शाह अपनी फिल्म ‘सिंह इज किंग’ के भाग दो का निर्माण करने की सोच रहे हैं। प्राय: सफल फिल्मों की ब्रांड वैल्यू के कारण उनके भाग दो के दोहन की बात की जाती है, जैसे बोनी कपूर ‘वांटेड’ के बाद ‘मोस्ट वांटेड’ की सोच रहे हैं।

हालांकि ‘सिंह इज किंग’ अधिकांश वितरण क्षेत्रों में अपने अधिक मूल्य के कारण असफल रही थी। दरअसल वह एक निहायत साधारण फिल्म थी। फिल्म के प्रदर्शन पूर्व जबरदस्त प्रचार किया गया था और प्रदर्शन के बाद भी कुछ क्षेत्रों के व्यवसाय का ग्रॉस आंकड़ा प्रकाशित कर उसे सफल घोषित कर दिया गया। ग्रॉस और नेट में बहुत अंतर है। यह सच है कि विपुल शाह को फिल्म से लाभ हुआ, परंतु वितरण और प्रदर्शन क्षेत्र में घाटा हुआ। यह सारा प्रकरण इस बात को रेखांकित करता है कि ब्रांड कैसे रचे जाते हैं।

व्यावसायिक फिल्म की एकमात्र कसौटी टिकट खिड़की पर एकत्रित धन होता है और इस व्यावसायिक तथ्य को भी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। साजिद की फिल्म ‘कम्बख्त इश्क’ के प्रदर्शन के तीसरे दिन शानदार दावत दी गई, परंतु आज यह माना जाता है कि वह असफल फिल्म थी। हाल ही में प्रदर्शित ‘ब्लू’ के भी आंकड़े प्रकाशित किए गए, जबकि यह घोर घाटे की फिल्म है।

यह सारा खेल केवल मनोरंजन क्षेत्र में नहीं हो रहा है, वरन अन्य क्षेत्रों में भी खोखले ब्रांड रचे जा रहे हैं और यह सब आम आदमी को लूटने के लिए किया जा रहा है। भव्य चमकीले शॉपिंग मॉल में देखी जाने वाली भारी भीड़ खरीददारों की नहीं है।

‘बाजार से गुजरा हूं, परंतु खरीदार नहीं हूं’, शायर का यह ख्याल कई जगह अलग संदर्भ में सच होकर उभर रहा है। कई दुकानें संकुल मालिक को मासिक किराया भी नहीं दे पा रही हैं।

संकुल मालिक भी उधारी की सीमा बढ़ा रहा है, क्योंकि खाली दुकान संकुल को दागदार बना देती है। नए किस्म की मजबूरियां उभर रही हैं। सारी समृद्धि खोखली नहीं है, परंतु कहीं-कहीं उसका स्वांग भी रचा जा रहा है। यह मार्केटिंग और विज्ञापन का शिखर समय है। यह है तो आधुनिक विधा, परंतु हिटलर के प्रचारमंत्री गोएबल्स इसका पहला मंत्र रच गए थे कि एक झूठ को विश्वास के साथ सौ बार बोलो, लोग सच मान लेंगे।

विपुल शाह बहुत संगठित और अनुशासित व्यक्ति हैं और मार्केट की नब्ज जानते हैं। सुना है कि वह स्टेशनरी की दो भव्य दुकानों के भी मालिक हैं। अत: वह बहीखाते बेचते भी हैं और लाभ कमाना भी जानते हैं। वह यह भी जानते हैं कि अब गुणवत्ता से ज्यादा आवश्यकता पैकेजिंग की है।

‘लंदन ड्रीम्स’ के बाद उन्हें अक्षय कुमार को ज्यादा लाभांश देना पड़ेगा। यह भी सुना है कि निर्देशन के दायित्व के साथ निर्माण इत्यादि की जवाबदारी ‘लंदन ड्रीम्स’ में उन्होंने ली थी और होम करते-करते हाथ झुलस गए हैं। प्रस्तावित ‘सिंह इज किंग-दो’ बतौर मरहम बनाई जा सकती है।

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