Thursday, November 12, 2009 00:33 [IST]  

danik bhaskarप्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा

जयप्रकाश चौकसे

नियमित व्यायाम, तर्कसम्मत विचार प्रक्रिया और संतुलित जीवन शैली के कारण आज भी प्रेम चोपड़ा तंदुरुस्त हैं और अमेरिका में ‘हार्टलैंड’ फिल्म की शूटिंग करके लौटे हैं।



राज कपूर की नातिन नताशा नंदा के जन्मदिन की दावत में प्रेम चोपड़ा से मुलाकात हुई। वे अत्यंत प्रसन्न हैं कि हाल में प्रदर्शित ‘ऑल द बेस्ट’ और ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ जैसी फिल्मों में नायकों के नाम प्रेम चोपड़ा हैं और उन्हें याद भी किया गया है। मसलन रणबीर कपूर कहते हैं ‘प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा’। सिनेमाघरों में इस संवाद पर तालियां बजती हैं।



ज्ञातव्य है कि राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ की मूल पटकथा में यह पात्र नहीं था, परंतु व्यावसायिक दबाव के कारण यह पात्र गढ़ा गया। इसे स्थापित करने के लिए चंद दृश्यों के बदले इस एक संवाद ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया। यह सिनेमाई कीमिया और किफायत है कि नाम के साथ उसका काम (गुंडागर्दी) भी स्पष्ट हो गया। उम्र की संध्या में प्रेम चोपड़ा को खुशी है कि इसी हास्य दृश्य के बहाने उन्हें याद किया गया और दर्शकों की स्मृति में वे आज भी कायम हैं।



हर कलाकार की इच्छा होती है कि वह लंबे समय तक याद किया जाए। यही उसके परिश्रम का असली मुआवजा होता है। जीवन की अनिवार्य क्षणभंगुरता के कारण ही यादों में लंबे समय तक बने रहने की चाह होती है। उम्र की संध्या में दो साउंड ट्रैक समानांतर चलते हैं- वर्तमान की ध्वनियां और विगत सफलता पर बजाई गई तालियां। वर्तमान की ध्वनियां धीमी सी सुनाई पड़ती हैं, क्योंकि विगत की तालियां जोर से बज रही हैं। बुजुर्गो के कम सुनने को युवा रिश्तेदार बुढ़ापे की कमजोरी समझते हैं। इस दौर में स्मृति पक्ष सशक्त होता है।



बहरहाल प्रेम चोपड़ा फिल्म ‘रॉकेट सिंह- सेल्समैन ऑफ द इयर’ में रणबीर कपूर के दादा की भूमिका निभा रहे हैं। प्रेम चोपड़ा का प्रवेश उस समय हुआ जब शिखर खलनायक प्राण सिकंद ‘उपकार’ के द्वारा चरित्र भूमिकाओं में आ गए थे और इसी फिल्म में युवा खलनायक के रूप में प्रेम चोपड़ा को इतनी सफलता मिली कि उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बतौर खलनायक उनकी पहली फिल्म रही ‘वो कौन थी’ और इसी के बाद उन्होंने मनोज कुमार की ‘शहीद’ फिल्म में सुखदेव की भूमिका निभाई।



इस खूबसूरत नौजवान ने कुछ पंजाबी फिल्मों में नायक की भूमिकाएं की थीं और खंडवा के मंडलोई की ‘कुंआरी’ में भी नायक थे। उनकी नायक वाली फिल्म ‘मैं शादी करने चला’ भी असफल रही। दरअसल छोटे फिल्मकारों की कम बजट वाली उनकी नायक भूमिकाओं वाली फिल्में नहीं चलीं और बड़े फिल्मकारों की भव्य फिल्मों में उनकी खलनायकी सराही गई। इस कारण बेहतर व्यक्तित्व वाले प्रेम चोपड़ा को नकारात्मक भूमिकाएं करते रहना पड़ा।



नियमित व्यायाम, तर्कसम्मत विचार प्रक्रिया और संतुलित जीवन शैली के कारण आज भी वे तंदुरुस्त हैं और अमेरिका में ‘हार्टलैंड’ फिल्म की शूटिंग करके लौटे हैं। इस फिल्म में टैक्सास और लुधियाना के किसानों की कथा है। हजारों मील की दूरी के बाद भी टैक्सास और लुधियाना में कुछ समानताएं हैं। अन्याय और शोषण भी शहरों को एक-दूसरे से जोड़ देते हैं। पंजाबी फिल्मों से यात्रा प्रारंभ करने वाले प्रेम चोपड़ा ने हाल में अवतार भूगल की ‘ऑनर किलिंग’ पूरी की है, जिसमें पंजाबी, अंग्रेजी और हिंदी बोली गई है। समय चक्र इस तरह से चलता है।

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