सितारों की फीकी चमक
जरूरत से ज्यादा दिखावा सितारों को खत्म कर देता है। चैट शो, रिएलिटी शो, विज्ञापन, रैंप, मैगजीन, पोर्टल, ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर सब जगह वे मौजूद हैं, अखबारों के परिशिष्ट उन्हें समर्पित हैं, वे शादियों में नाच रहे हैं, सलून से लेकर जूते के स्टोर तक का उद्घाटन कर रहे हैं। आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि लालच की ऐसी बेकाबू बाढ़ में किसी शख्सियत की ऊंचाई और आकर्षण कायम रहेगा?
आज जब नामी-गिरामी सितारों से भरी फिल्म और बड़े-बड़े ब्रांडों की लांचिंग हर दूसरे दिन धराशायी हो रही है, फिल्म निर्माता और ब्रांड मैनेजर यह सवाल पूछ रहे हैं कि स्टार पॉवर होती क्या है? क्या बड़े सितारे सचमुच फिल्म की धमाकेदार शुरुआत कर सकते हैं या किसी ब्रांड की वजह से लांचिंग भव्य और शानदार हो सकती है? लेकिन इससे पहले कि कोई इस सवाल का जवाब दे, इससे ज्यादा सीधे-सरल सवाल ये हैं: स्टार कौन है? वह जिसका स्टारडम है?
हर कोई सितारों की ताकत या स्टार पॉवर के बारे में बात करता है, लेकिन आप उनसे पूछिए कि स्टार पॉवर का सही-सही अर्थ क्या है तो कुल मिलाकर जो आपके हाथ आता है, वह वही पिटी-पिटाई, रटी-रटाई बातें हैं। हम सभी जानते हैं कि स्टार कौन हैं। हम जानते हैं कि अमिताभ बच्चन स्टार हैं और वह हमेशा स्टार बने रहेंगे, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो जाए। हम जानते हैं कि आमिर भी एक स्टार हैं, भले उनको इस मुकाम तक पहुंचने में बरसों लग गए।
उसी तरह शाहरुख, अक्षय, रजनीकांत, सलमान, ऋतिक, ऐश्वर्या सभी स्टार हैं। हम जानते हैं कि धोनी स्टार हैं। वैसे ही सचिन हैं। युवराज शायद स्टार बनेंगे। शम्मी कपूर स्टार थे। एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव ने राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करने के लिए अपने स्टारडम का इस्तेमाल किया। चिरंजीवी ने कोशिश की। गोविंदा असफल हो गए। राजेश खन्ना ने उसे जिलाए रखा।
पहले हमारे पास कोई स्टार नहीं था, सिर्फ प्रतिभा थी। अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर, गुरुदत्त, मधुबाला, किशोर कुमार, मीना कुमारी और बलराज साहनी। नहीं, वे सितारे नहीं थे, लेकिन वास्तव में उनका कद बहुत ऊंचा था। हमारे पास संजीव कुमार, धर्मेद्र और शशि कपूर थे। आपने उनसे प्यार किया, उनके काम और उनकी सफलता के कारण।
लेकिन आज के सितारों की परख इन दोनों ही कसौटियों पर नहीं होती। संभव है आप बहुत बोझिल अभिनेता, लेकिन बहुत बड़े स्टार हों। हो सकता है आपके पीछे फ्लॉप फिल्मों का तांता लगा हो, लेकिन फिर भी आप अकड़कर चल सकते हैं और भारी-भरकम मेहनताने की मांग कर सकते हैं क्योंकि आप बड़े स्टार हैं। आपके निर्माता को बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के बारे में अनाप-शनाप बोलना है और यह दावा करना है कि आपकी जबर्दस्त रूप से पिटी हुई फिल्में दरअसल बहुत बड़ी सुपरहिट हैं।
उन्हें इस उम्मीद में ऐसा करना है कि हो सकता है कि अगली फिल्म की कुछ ज्यादा बेहतर शुरुआत हो सके। कोई भी फिल्मों के विज्ञापनों में किए गए दावों पर यकीन नहीं करता है, सिर्फ कुछ कमजेहन और भोले-भाले दीवानों को छोड़कर, जिन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। लेकिन आपकी पीआर मशीन चारों ओर इस झूठ का जाल बुनती जाती है और यह यकीन दिलाती है कि वह स्टार अपनी अगली फिल्म में भी पूरे निर्माण बजट से दोगुने मेहनताने की मांग कर सकता है।
स्टार कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चीज की मांग कर सकते हैं। किसी स्टार को महान अभिनय वाला किरदार थमा दीजिए और उस किरदार का बेड़ा गर्क हो जाएगा। सितारे जिन भूमिकाओं के लिए जान देते हैं, वे हैं बुद्धि से पैदल मूर्खतापूर्ण भूमिकाएं और उन बेअक्ल फिल्मों को वो मसाला फिल्में कहते हैं। पूरी दुनिया में कहीं भी फिल्मों की ऐसी परिभाषा नहीं है। वहां अच्छी फिल्में होती हैं और बुरी फिल्में।
मनोरंजक फिल्में और दुखद फिल्में। प्रचलित फिल्में और काल्पनिक फैंटेसी फिल्में। वे सभी फिल्में, अगर उन्हें एक ईमानदार बजट के अंदर थोड़े बेहतरीन ढंग से बनाया गया है तो उनके सफल होने की अच्छी संभावना होती है। अभी हाल ही में बनी एक हॉरर फिल्म पैरानॉर्मल एक्टिविटी महज 5 लाख में बनी और वह अभी तक सिनेमाघरों में ३क्क् करोड़ रुपए कमा चुकी है और संभव है कि ५क्क् करोड़ रुपए का आंकड़ा भी पार कर जाए।
फिल्म ब्लेयर विच प्रोजेक्ट १५ लाख मंे बनी थी और उसने १क्क्क् करोड़ रुपए कमाए। इन दोनों ही फिल्मों में कोई स्टार नहीं था और न ही उन्हें नामी-गिरामी निर्माताओं का सहारा था। ये फिल्में सिर्फ और सिर्फ फिल्म बनाने की खुशी और रस लेने के लिए बनाई गई थीं। इसी तरह हॉलीवुड की अभी हाल की ही एक हिट फिल्म है हैंगओवर, जिसने हमारे बॉक्स ऑफिस को अपना दीवाना बना लिया।
फिल्म में ऐसा कुछ नहीं था। न कोई स्टार, न महान लोकेशन, बल्कि इसके ठीक उलट, लास वेगास की एक ठुंसी हुई पार्किग थी। इस फिल्म का न ही ऐसा कोई काबिले-जिक्र निर्माण बजट ही था। लेकिन इन सबके बावजूद फिल्म की स्क्रिप्ट इतनी जबर्दस्त तेवर से लैस थी कि फिल्म ने सिनेमाहॉल के पर्दो से उतरने से ही इनकार कर दिया। यहां तक कि घमंड में चूर मल्टीप्लेक्सों के पर्दो पर भी छाई रही। दूसरी ओर अभी हाल के महीनों में बॉलीवुड की कुछ भारी-भरकम फ्लॉप फिल्मों में बड़े नामी-गिरामी स्टार थे और ऐसा लहीम-शहीम बजट कि पहले कभी सुना न हो। हर किसी ने इन फिल्मों की नाकामी को ढंकने के लिए रात-दिन मेहनत की और ऐसा दिखाया कि मानो वह कभी असफल हुई ही नहीं थी।
लेकिन मेरे मूल प्रश्न पर वापस लौटते हैं। एक स्टार के होने से बॉक्स ऑफिस या ब्रांड पर क्या असर पड़ता है? क्या इससे लांचिंग बहुत भव्य हो जाती है? अगर ऐसा है तो क्यों बॉलीवुड बड़े-बड़े लहीम-शहीम सितारों वाली ऐसी फिल्मों के मलबों से रोशन हुआ रहता है, जो बॉक्स ऑफिस पर एक कदम भी न बढ़ा पाईं या जो सोमवार की सुबह ही चारों खाने चित्त हो गईं?
जहां तक ब्रांडों का सवाल है तो उनमें से कितने ब्रांडों को आप उनके सितारों के दम-खम की वजह से याद करते हैं। बेशक देखने वाले सितारों को कुछ खास उत्पादों के साथ जोड़कर देखते हैं, लेकिन ब्रांडों के मामले में अमूमन गलती ही कर जाते हैं। पर्दे पर स्टार जैसे बात करते हैं, कपड़े पहनते हैं, यह सब देखने में ही दर्शक इतने मशगूल होते हैं कि ब्रांड की सारी बातें तो वो भूल ही जाते हैं।
सितारों के दीवाने अपने सितारों के बालों की स्टाइल, उनकी लाइफ स्टाइल, उनकी सेक्स अपील में ही इतने ज्यादा खोए रहते हैं कि उनकी फिल्में और उनके द्वारा एंडोर्स ब्रांडों की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते। इसलिए एक स्टार और जिस काम को करने के लिए उन्हें पैसा दिया जा रहा है, उस काम के बीच एक दूरी बढ़ती जा रही है। स्टार सोचते हैं कि आखिरी एक हफ्ता प्रमोशन करके ही वे कुछ भी बेच सकते हैं। लेकिन भगवान भी ऐसा नहीं कर सकते।
जरूरत से ज्यादा दिखावा इन दिनों सितारों को खत्म कर देता है। चैट शो, म्यूजिक वीडियो, रिएलिटी शो, विज्ञापन, रैंप, मैगजीन, इंटरनेट पोर्टल, ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर सब जगह वे मौजूद हैं, अखबारों के परिशिष्ट उन्हें समर्पित हैं, वे शादियों में नाच रहे हैं, सलून से लेकर जूते के स्टोर तक का उद्घाटन कर रहे हैं। आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि लालच की ऐसी बेकाबू बाढ़ में किसी शख्सियत की ऊंचाई और आकर्षण कायम रहेगा?










