क्रिकेट का शहंशाह
आप 15 नवंबर, 1989 को कहां थे? मुझे पता है कि मैं कहां था: अपने अखबार के दफ्तर में टैलीविजन से चिपका हुआ घुंघराले बालों और गुलाबी गालों वाले एक लड़के को पाकिस्तान के तेज गेंदबाजों के छक्के छुड़ाते हुए देख रहा था। आज बीस बरस बाद घुंघराले बालों में कुछ-कुछ सफेदी झलकने लगी है लेकिन सचिन तेंदुलकर आज भी वही काम कर रहे हैं।
इन गुजरे बीस बरसों में हमारे चहुंओर दुनिया का नक्श बहुत कुछ बदल चुका है। पर एक चीज नहीं बदली है: क्रिकेट की दुनिया में तेंदुलकर की मौजूदगी। याद है 1989? यह वही साल था, जब साम्यवाद के पतन के प्रतीक के रूप में बर्लिन की दीवार गिरी थी। वही साल था, जब आम चुनावों में राजीव गांधी को पराजय का मुंह देखना पड़ा और वीपी सिंह मध्य वर्ग के नायक में तब्दील हो गए थे।
यही वह बरस था, जब कश्मीर घाटी में पहली बार उग्रवादियों की बंदूकें गूंजी थीं, जबकि अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन का बिगुल सुनाई दिया था। 1989 में विदेश घूमने जाना हो तो ५क्क् डॉलर की राशि ही आपकी सीमा थी, डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री होने से बहुत दूर थे, कोई निजी न्यूज चैनल नहीं थे और हिंदुस्तान तब अपनी हिंदू विरासत से जूझ रहा था।
मेरी पीढ़ी के अनेक हिंदुस्तानियों को उस दौर के साथ जोड़ने वाली सिर्फ एक चीज है: तेंदुलकर की बल्लेबाजी। रनों के पहाड़ और कीर्तिमानों के अंबार को भूल जाइए। यह इतिहासकारों और भविष्य के लिए आंकड़ों का हिसाब-किताब जमा करने वालों का काम है। एक सच्चे क्रिकेट के दीवाने के लिए तेंदुलकर का मुकाम हमेशा रन बनाने की मशीन से कहीं ज्यादा ऊंचा रहा है: उसने खेल को इस अंदाज में खेला कि जैसे उसे खेला जाना चाहिए था, बेइंतहा जुनून और बेलगाम जोश के साथ और इन सबसे ऊपर सच्ची गरिमा के साथ।
यह सच है कि पाकिस्तान के अपने पहले दौरे के समय सचिन ने जैसी बिंदास और धुंआधार बल्लेबाजी की, उसके बाद वे ज्यादा संतुलित और विधिवत तकनीक के साथ बल्लेबाजी करने लगे थे। बावजूद इसके जैसा कि कुछ रात पहले हैदराबाद में उन्होंने दिखा दिया कि उनके खेल की असल आत्मा अब भी आक्रमण करके क्रिकेट खेलना ही है।
आश्चर्यजनक रूप से हैदराबाद का महान अध्याय जब अपनी समाप्ति की ओर था, तब भी सचिन अपने साथ के उन तमाम लोगों से ज्यादा सरपट दौड़ रहे थे, जो उनसे उम्र में आधे होंगे। यह आसान नहीं है। क्रिकेट का इतिहास स्कूली होनहार लड़कों की ऐसी विलक्षण कहानियों से रोशन है, जो क्रिकेट के मैदान से बड़ी लीग तक का सफर नहीं तय कर सके।
सचिन ने न सिर्फ ऊंची छलांग लगाई, बल्कि इस छलांग का सफर उन्होंने दो साल की मामूली अवधि में ही तय कर डाला। पहली सीरीज में वकार का वह एक बाउंसर जिस तरह सीधे मुंह पर आया, उससे कोई कमतर खिलाड़ी हौसला खो देता। लेकिन सचिन ने नहीं खोया। वह एक क्षण, जो आया और गुजर गया, उसमें अपने घाव को झाड़कर सचिन जिस तरह उठ खड़ा हुआ, उस एक क्षण में वह किशोर मर्द बन गया।
सचिन के क्रिकेट से जुड़े हम सबके अपने-अपने पसंदीदा क्षण हैं: क्या यह क्षण वह है, जब २क्क्३ के वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के स्कोर का पीछा करते वक्त सचिन ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए शोएब अख्तर की गेंद पर छक्का मारा? या फिर जब चेन्नई में गेंदबाजों की मददगार पिच पर सचिन ने शेन वॉर्न को छठी का दूध याद दिला दिया था?
शारजाह की वह शानदार पारी, जो एकदिवसीय क्रिकेट में सचिन के अमिट हस्ताक्षर की तरह मौजूद है? या पिछले साल अवसाद के गहरे निशान छोड़ गए 26/11 के आतंकी हमले के कुछ हफ्तों के भीतर इंग्लैंड के खिलाफ खेली गई जीत के मुकाम तक ले जाने वाली वह अभूतपूर्व पारी? जब आपने शानदार 87 अंतरराष्ट्रीय शतक बना लिए हों तो उसमें से क्रिकेट की किसी एक उपलब्धि को छांटना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन सचिन तेंदुलकर की वास्तविक उपलब्धि सारी सीमाओं से आगे की है।
हम दो मिनट वाले भुरभुरे स्टारडम और क्षणभंगुर सैलिब्रिटीज के दौर में रह रहे हैं, जहां नामो-शोहरत ऐसा नशा है जो हमारे सबसे बेशकीमती गुणों को निगल सकता है। तड़क-भड़क और ग्लैमर के बेकाबू चक्करदार घुमावों के बीच पूरी संभावना होती है कि कोई अपनी राह से भटक जाए। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सचिन को यह बात छू तक नहीं गई है कि वह हिंदुस्तान के मौजूदा क्रिकेट के सबसे बड़े शहंशाह हैं, बल्कि अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से भी बड़े।
जैसाकि शाहरुख खान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि क्रिकेट खिलाड़ियों और फिल्मी सितारों की एक पार्टी में जब अमिताभ बच्चन ने कदम रखा तो चारों तरफ शोर गूंज उठा। उसके बाद सचिन ने प्रवेश किया और अमिताभ उस पंक्ति में सबसे आगे थे, जो क्रिकेटर की एक झलक पा लेना चाहती थी। तमाम ऊंचाइयों और कुछ तलछट के साथ सचिन शांत, संतुलित और अपने काम के प्रति एकाग्र बने हुए हैं।
उन्होंने समझते-बूझते हुए विवादों को दूर रखा है। लाखों लोगों के सामने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए भी उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपनी निजता को बचाए रखा है। भले वह कभी कॉलेज न गए हों, लेकिन जिंदगी ने उन्होंने किसी क्लासरूम से कहीं ज्यादा गहरे सबक सिखाए हैं। वे अपने व्यावसायिक महत्व से बखूबी वाकिफ हैं, लेकिन उनकी पहचान यह है कि वे एक मध्यवर्गीय मराठी परिवार से हैं, जो हमेशा अपनी जड़ों के प्रति ईमानदार रहा है।
पूर्ववर्ती लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर जैसी धीरता-गंभीरता उनमें भले न हो, लेकिन क्रिकेट के मामले में उनमें वाक्पटुता वैसी ही है। एक अर्थ में गावस्कर से तेंदुलकर तक का सफर भारतीय क्रिकेट और नए भारत के एक समूचे युग का प्रतिनिधित्व करता है। गावस्कर वह शिल्पकार थे, जिन्होंने बड़ी बारीकी और कारीगरी से एक-एक पारी को गढ़ा था। शायद यह हिंदुस्तान की तारीख में नेहरूवादी दौर का प्रतीक था, जब न तो क्रिकेट और न ही मुल्क किसी तरह की अतिशयता और अपव्यय को बर्दाश्त कर सकता था।
तेंदुलकर स्वतंत्र आत्मा के कलाकार हैं, जो हिंदुस्तान की आजादी जैसी आजाद जहनियत से बल्ला घुमाते हैं। आजाद भारत, जो अपने तमाम समाजवादी दबावों से मुक्त है, जहां क्रिकेट आज बहुत बड़ा फायदेमंद मनोरंजन उद्योग है। सचिन की पारी कब तक चलेगी?
आंकड़ों के आईने में अब तक के सबसे महान बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन ऑस्ट्रेलिया के लिए 20 सालों तक खेले। सचिन भी दो दशकों से दबाव के माहौल में भी लगातार खेल रहे हैं। शरीर कुछ शिथिल हो रहा है, लेकिन दिमाग अब भी छोड़ने का तैयार नहीं है। शायद 2011 का वर्ल्ड कप अब भी एकमात्र लक्ष्य है। कभी शारजाह में एक बैनर पर लिखा था : ‘जब मरूंगा तो मैं भगवान को देखूंगा, लेकिन तब तक मैं सचिन को देखूंगा।’










