Saturday, November 14, 2009 00:42 [IST]  

danik bhaskarअसल मलिका-ए-हिंदुस्तान

खुशवंत सिंह

इंदिरा गांधी की पच्चीसवीं पुण्यतिथि के मौके पर दुनिया भर में मीडिया में भारी-भरकम लेखों की बाढ़ सी आ गई। यह सब ठीक उसी तर्ज पर हुआ, जैसाकि होना चाहिए था, क्योंकि इंदिरा गांधी यकीनन बरसों-बरस असल मलिका-ए-हिंदुस्तान थीं। उन्होंने बेरहम प्लास्टिक सर्जरी से देश की सूरत ही बदल दी थी।



कांग्रेस पार्टी को उन्होंने अपनी इच्छाओं का गुलाम बना लिया, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, शाही घरानों को बिना कमाए हासिल प्रिवी पर्स से वंचित कर दिया, पाकिस्तान को अपमानजनक पराजय का स्वाद चखाया और बांग्लादेश को आजाद किया। देवकांत बरुआ बहुत गलत नहीं थे, जब उन्होंने इंदिरा की जय-जयकार की : इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया।



तेरे नाम की जय, तेरे काम की जय। लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि उनकी शख्सियत के दो बिलकुल अलहदा चेहरे थे - एक सार्वजनिक चेहरा और एक निजी चेहरा। वह महान जननेता थीं, लेकिन ठीक इसी के साथ अपनी निजी जिंदगी में वह बेहद कमजोर और लाचार थीं। नि:संदेह वह बेइंतहा खूबसूरत स्त्री थीं, लेकिन इसी के साथ-साथ दूसरी खूबसूरत औरतों को वह बेइंतहा नापसंद करती थीं और उन्हें नीचा दिखाती थीं।



इन खूबसूरत स्त्रियों में तारकेश्वरी सिन्हा और महारानी गायत्री देवी भी शामिल थीं। वह अपनी बुआ विजयलक्ष्मी पंडित को नापसंद करती थीं और उन्हें वरिष्ठ राजनयिक का दायित्व देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपनी चचेरी बहन नयनतारा सहगल के प्रति काफी बेरुखी बरती और उनके पति एन. मंगत राय को, जो बहुत सक्षम और ईमानदार सिविल कर्मी थे, आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।



वह बेवजह उन सभी लोगों के प्रति आक्रामक थीं, जो उनके समकक्ष थे क्योंकि वह किसी का भी एहसानमंद नहीं होना चाहती थीं, जैसे रोमेश थापर, जगत सिंह, केवल सिंह। आपातकाल के दौरान उन्होंने और उनके परिवार ने जितने लोगों को सलाखों के पीछे बंद किया, उससे किसी को भी चक्कर आ सकता है।



मैं बहुत उत्सुक नहीं था कि उनके किए हर काम को याद करूं, लेकिन उनकी जिंदगी, उपलब्धियों और विफलताओं पर अभी हाल ही में पुनर्प्रकाशित हुई प्रणय गुप्ते की किताब मदर इंडिया : ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ इंदिरा गांधी (पेंगुइन-वाइकिंग) से गुजरते हुए मैं खुद को रोक नहीं पाया। गुप्ते जाने-माने कद्दावर पत्रकार हैं, जो न्यूयॉर्क टाइम्स और कुछ बहुत प्रतिष्ठित अमेरिकी, अंग्रेजी और भारतीय पत्रिकाओं के संवाददाता थे।



अभी वह दुबई में रहते हैं, लेकिन कभी मेरी पड़ोसन रह चुकीं ज्योत्सना वर्मा से मिलने के लिए लगातार दिल्ली आते रहते थे। मुझे शक है कि अब वे उस तरह आएंगे क्योंकि ज्योत्सना वर्मा मनीला में इंडियन बैंक में नौकरी करने लगी हैं।



ईश्वर की खोज : स्कॉटलैंड का एक व्यक्ति विलियम डेलरिम्पल सबसे पहले पीठ पर बैग लटकाए एक युवा घुमंतू के रूप में हिंदुस्तान आया था। तब कोई चीज थी, जिसने उससे कहा कि वह भारत से ताल्लुक रखता है, स्कॉटलैंड से नहीं, जहां उसका जन्म हुआ था। अगली बार वह अपने साथ स्कॉटलैंड की खूबसूरत पत्नी को लेकर लौटा और दिल्ली को अपना घर बना लिया।



कुतुबमीनार के पीछे उसने एक विशालकाय फार्म हाउस किराए पर लिया, जहां अब वह अपनी पत्नी, तीन बच्चों, बकरियों और किताबों के साथ रहता है। विलियम डेलरिम्पल के नाम से छह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और अब उनकी सातवीं किताब नाइन लाइव्स : इन सर्च ऑफ द सैक्रेड इन मॉडर्न इंडिया (ब्लूम्सबरी) प्रकाशित हुई है। मैंने उनकी अधिकांश किताबें पढ़ी हैं और बिना किसी हिचक के कह सकता हूं कि वे सभी किताबें बेशुमार जानकारियों से भरपूर हैं और उन्हें बेहद खूबसूरत काव्यमय गद्य में लिखा गया है।



नाइन लाइव्स किताब किसी अचंभे की तरह मेरे सामने आई। यह भारतीय, तिब्बती और पाकिस्तानी समुदाय के लोगों के बारे में है। सभी को अंतिम सत्य की तलाश है और इस बात की कि उनका अस्तित्व क्यों और किसलिए है। यह यकीन करना मुश्किल है कि डेलरिम्पल अतीत के बारे में नहीं, बल्कि वर्तमान के बारे में लिख रहे हैं। किताब में एक संपन्न जैन परिवार की लड़की है।



वह साध्वी बनने के लिए अपने परिवार और समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं का त्याग कर देती है। वह नंगे पांव गांव-दर-गांव भटक रही है, कई-कई दिनों तक बिना अन्न के एक दाने के चली जा रही है और मोक्ष की कामना में खुद को मृत्यु की सीमा तक भूखा रखना चाहती है। मध्यप्रदेश के जंगलों में ऐसी जनजातियां हैं, जो पूरी-पूरी रात ढोलक की ताल पर थिरकती हैं, मुर्गो को मारकर उन्हें पकाने से पहले उनका खून पीती हैं।



महाराष्ट्र और कर्नाटक के ऐसे निर्धन परिवार हैं, जो अपनी बेटियों को देवदासी बनने के लिए देवी येलम्मा को समर्पित कर देते हैं। ये देवदासियां वेश्याओं से अलग नहीं होतीं और गुमनाम पिताओं की अवैध संतानों को पालते एड्स की शिकार हो जाती हैं और पचास के पहले ही मर जाती हैं। किताब में एक स्थूलकाय बिहारी मुसलमान औरत है, जिसे अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ता है, जब हिंदू हमलावर उसके गांव पर धावा बोल देते हैं।



वह मुस्लिम बांग्लादेश में शरण तलाशती है, लेकिन बाद में बंगाली मुसलमान उसे जबरन निकाल देते हैं क्योंकि वह बंगाली नहीं बोल सकती। बाद में उसे सिंध में सूफी पीर शहबाज कलंदर की मजार पर आसरा मिल जाता है। वह दमादम मस्त कलंदर गाती और साथ में नाचती जाती है। सड़क के आखिरी छोर पर नया-नया देवबंदी मदरसा खुला है। मदरसे के शिक्षक सूफी दरगाह को गिराने पर तुले हुए हैं, क्योंकि वह गैर इस्लामी विधर्मी जगह है।



कुछ तमिल मूर्तिकार हैं, जिनके परिवार पिछले ७क्क् सालों से इस पेशे में मुब्तिला हैं। ऐसे और भी तमाम लोग हैं। उन सभी को भरोसा है कि दिव्यता की खोज में वे सब सही राह के मुसाफिर हैं। सबसे ज्यादा हैरतअंगेज और रीढ़ को कंपा देने वाले हैं बंगाल में तारापीठ के तांत्रिक, जो खोपड़ियों के कंकाल जमा करते हैं, कब्रिस्तान में रहते हैं, कड़वी शराब पीते हैं, गांजा सुलगाते हैं, दर्जनों बकरियां काटते हैं और यौन कर्म में तल्लीन रहते हैं।



यह सब वे सत्य की खोज में करते हैं। ऐसे बाउल गायक हैं, जो श्रीकृष्ण, राधा और गोपियों की भक्ति में दिलों को बींध देने वाले गीत गाते गांव-गांव, शहर-शहर भटक रहे हैं। डेलरिम्पल कभी फैसला नहीं देते और न ही इस पर सवाल करते हैं कि ये तमाम लोग जैसे सच को देख रहे हैं, वह सही है या नहीं। यह उन तमाम लोगों का अमूल्य दस्तावेज है, जिनके अस्तित्व के बारे में मुझे सिर्फ एक उड़ता-उड़ता सा आभास था। नाइन लाइव्स पढ़ने के बाद मैं बहुत समृद्ध महसूस करता हूं और अपने पाठकों को यह किताब पढ़ने की सलाह देता हूं।



सिस्टर कहो : बंता ने नर्स से शादी की। उसका दोस्त संता उससे मिलने आया और पूछा, ‘बंता, तेरी शादी कैसी चल रही है?’ बंता ने जवाब दिया : ‘यार बढ़िया है। लेकिन बीवी जोर देती है कि मैं उसे सिस्टर कहकर बुलाऊं।’

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