बाल आधारित फिल्मों का गणित
पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1955 में स्थापित ‘बाल चित्र समिति’ इतने दशकों के बाद भी अपनी निष्क्रिय बाल्य अवस्था में चरमरा रही है। इसके पहले 1954 के कालखंड की व्यावसायिक बाल फिल्म ‘जागृति’ सफल रही थी।
अब्बास साहब की ‘मुन्ना’ भी सार्थक फिल्म थी और राज कपूर की ‘बूट पॉलिश’ भी अत्यंत सफल रही। ‘जागृति’ से लेकर आमिर खान की ‘तारे जमीं पर’ तक सफल सार्थक बाल आधारित फिल्में व्यावसायिक फिल्मकारों ने ही बनाई हैं, जिनमें चेतन आनंद की ‘आखिरी खत’ भी शामिल है, जिसका नायक 18 महीने का एक बच्च था। मणिरत्नम की ‘अंजलि’ भी महान रचना थी।
सरकारी समिति ने भी अपने प्रारंभिक दौर में कुछ अच्छी फिल्में बनाईं, परंतु उनका व्यापक प्रदर्शन नहीं हो पाया। भारतीय सिने उद्योग का बेढंगा ढांचा कुछ इस तरह सितारा केंद्रित है कि सिताराविहीन बाल फिल्मों का प्रदर्शन ही नहीं हो पाता और सरकारी खैरात पर आप कितने समय तक कोई काम कर सकते हैं? आर्थिक आत्मनिर्भरता के अभाव में महान संस्थाएं भी दम तोड़ देती हैं।
हमारे व्यावसायिक फिल्मकारों ने अपने ब्रांड के आधार पर अपनी बाल फिल्मों का व्यापक प्रदर्शन किया। सत्यजीत रे की ख्याति के कारण उनकी ‘गोपी गायां’ और ‘फेलुदा’ कहानियां सफल रहीं। महान कैमरामैन संतोष सिवन की बाल केंद्रित ‘हैलो’, ‘मल्ली’ और ‘टहान’ महान फिल्में होते हुए भी व्यापक प्रदर्शन के अभाव में लगभग अनदेखी ही रह गईं। सरकार को इस समिति पर व्यय रोक देना चाहिए, क्योंकि संस्था असफल रही है।
बाल आधारित फिल्मों का व्यवसायी फिल्मकार ही गहन प्रचार द्वारा व्यापक प्रदर्शन कर पाते हैं। जब 1955 में इस संस्था का जन्म हुआ था, तब के कालखंड के बच्चों और आज के बच्चों में जमीन-आसमान का अंतर है और आधुनिक टेक्नोलॉजी के प्रयोग के कारण उनकी जानकारियां बहुत बढ़ गई हैं। आजकल बच्चे रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ अभिनीत ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ फिल्म देखते हैं और उन्हें स्थितियोंवश पैदा हुए हास्य से ओतप्रोत ‘ऑल द बेस्ट’ फिल्म भी पसंद है।
ऋतिक रोशन की ‘कोई मिल गया’ और ‘क्रिश’ भी बच्चों की प्रिय होने के कारण सफल रही हैं। दरअसल व्यावसायिक सिनेमा की सफलता का एक कारण बाल दर्शक रहे हैं। वयस्कों द्वारा अभिनीत बचपन सी मासूम प्रेम कथाएं खूब सफल रही हैं। मासूमियत सबसे कारगर फॉमरूला है और अरबों रुपए का कॉमिक्स का कारोबार इसी के दम पर टिका है।
गब्बर और मोगैंबो जैसे खलनायकों की लोकप्रियता का आधार भी बच्चे ही हैं, जो इन खलनायकों के सनकीपन को वैसे ही पसंद करते हैं, जैसे कॉमिक्स में प्रस्तुत दैत्यों को। बच्चों की पसंद-नापसंद गहरे अध्ययन का विषय है और फिल्मकारों को भी इसके प्रशिक्षण की आवश्यकता है।










