Saturday, November 14, 2009 06:58 [IST]  

danik bhaskarसागर में शंख पुष्पी का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण

Bhaskar News

सागर. डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के फॉर्मेसी विभाग में हर्बल वियाग्रा के बाद शंख पुष्पी का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण देश में पहली बार किया गया है। यह कार्य करने वाले विभाग के शोधार्थी आलोक नाहटा को फॉर्मास्युटिकल साइंस के क्षेत्र में रेनबैक्सी साइंस स्कॉलर अवार्ड से नवाजा गया है।



आलोक ने यह अवार्ड आस्ट्रेलिया के नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक प्रो. पीटर सी डोहरथी के हाथों प्राप्त किया। जिसमें 50 हजार रुपए एवं प्रशस्त्रि पत्र दिया गया। इस अवार्ड के लिए देश के सिर्फ दो युवा वैज्ञानिकों का चयन किया जाता है।



चूहों की स्मरण शक्ति बढ़ गई-ज्यादातर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के मानव शरीर पर प्रभावों का उल्लेख अभी तक किताबों में ही दर्ज है। इनका वैज्ञानिक प्रमाणीकरण नहीं किया गया है। यह पहल सागर में डॉ. गौर विवि के फॉर्मेसी विभाग में शुरू हुई। शोधार्थियों ने हर्बल वियाग्रा के बाद शंख पुष्पी का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण किया है।



प्रमाणीकरण के दौरान पहले से मौजूद आयुर्वेदिक रसायन एवं मिश्रण का उपयोग अलग-अलग चूहों पर किया जाता है। शंख पुष्पी स्मरण शक्ति बढ़ाती है। इसका वैज्ञानिक प्रमाणीकरण करने के लिए सामान्य चूहों के दो ग्रुप बनाए गए।



पहले ग्रुप के चूहों को स्मरण शक्ति खत्म करने वाली ड्रग दी गई। दोनों ग्रुप के चूहों का परीक्षण किया गया। चूहों की स्मरण शक्ति का पता लगाने के लिए कई तरह के मॉडल बनाए गए। जैसे एक पिंजरे में करंट एवं ध्वनि प्रवाहित करने वाली लोहे की राड लगाई गई।



इस राड के आसपास बारी-बारी से दोनों ग्रुप के चूहों को लाया जाता है। पहले ग्रुप के चूहे करंट एवं ध्वनि प्रवाहित होने के दौरान कोई प्रतिक्रिया नहीं करते थे। जबकि दूसरे ग्रुप के चूहे पिंजरे में दूसरी ओर चले जाते थे।



इसके बाद पहले ग्रुप के चूहों को जिनकी स्मरण शक्ति खत्म की गई थी, उन्हें शंख पुष्पी के अर्क से बनाई गई ड्रग एक निश्चित अंतराल के बाद लगातार दी गई। धीरे-धीरे इनकी स्मरण शक्ति बढ़ती गई। यह प्रयोग कई माह किया गया। आलोक ने विभाग के प्रो. विनोद दीक्षित के निर्देशन में यह शोध कार्य किया है।



सुविधाएं मिलें तो भविष्य सुनहरा स्थानीय स्तर पर शोधार्थियों को मानव शरीर पर इस प्रकार के शोध करने की सुविधाएं नहीं हैं। शोधार्थियों का कहना है कि बाहर जाकर शोध कार्य करना महंगा होता है। जिस कारण कई शोधार्थी आगे शोध कार्य नहीं कर पाते हैं।




अब डॉ. गौर विवि के केंद्रीय विवि बनने के बाद शोधार्थियों को उम्मीद है कि विवि स्वयं अपने संसाधनों से बाहर या स्थानीय स्तर पर इस प्रकार के शोध कार्य के लिए संसाधन उपलब्ध कराएगा।

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