देराणी से पटती नहीं, जंवाई सारे नाराज
बीकानेर. नगर निगम चुनाव की रंगत से पाटा सराबोर है। यहां सब तय है। कौनसे प्रत्याशी का कहां नन्नाणा-दादाणा है। किस प्रत्याशी पीहर-ससुराल कौनसी गली में है। कहां मनमुटाव है और कहां हेत-भाव है। रिश्तों की बारीक डोरी से वोट कैसे बांधे जाएंगे और किस तरह वोट देखते ही देखते उस पार चले जाएंगे।
नगर निगम चुनाव में आधे वार्डो में महिलाएं खड़ी हैं और पाटे को पता है कि किस महिला की अपनी देराणी से नहीं पटती है, इसलिए देराणी के पीहर के वोट पर तो पकड़ ढीली ही रहेगी। जंवाइयों की नाराजगी का भी पाटे को पता है। पाटा साफ बताता है। छिपाता कुछ भी नहीं है और यही वजह है जब बोलने लगता है तो पोल खुलती-सी लगती है।
पाटे का विश्लेषण है ‘देराणी सूं बण कोयनी, वोट लासी कठै सूं।’ इसी तरह एक प्रत्याशी के बहनोई नाराज हैं जिसके लिए कहा जाता है ‘बेंदोई रो परवार मोकÝो है पण बटै कईं?’ वार्ड पार्षद के चुनाव में खूब बारीक पीसने वाले शहर के पाटों पर सभी की कुंडली पहुंच चुकी है।
महापौर के प्रत्याशियों के ओम आचार्य से अशोक आचार्य तक चक्कर लगाने और लाल बाबा से लेकर श्रद्धांनदजी की शरण में पहुंचने तक की जानकारी है। पाटे के रिजल्ट भी हाथों हाथ है। कौन मानेगा और कौन मेहनत पर पानी फेरेगा, यह जताने में पाटा संकोच नहीं करता। पाटे पर प्रत्याशी भी पहुंचते हैं और प्रत्याशियों के समर्थक भी। कई बार पाटा पूछ भी लेता है कि ‘थारे कैंडीडेट ने कईं सूझी रे?’
अपने प्रत्याशी के बारे में जानने वाले समर्थक को जवाब नहीं मिलता और यहीं से पाटे पर प्रत्याशी की चीर-फाड़ शुरू हो जाती है। कुछ कम सहनशक्ति वाले अपने प्रत्याशी का बुरा सुन नहीं सकते। ऐसे समय में पाटा हाई-अलर्ट पर रहता है। कुछ सुहाने वाली बातें करता है लेकिन खरी-खरी कहने वाले कहां चूकते हैं। अपनी बात कह ही देते हैं। सुनने के बाद भले ही कोई नाराज हो। कहने वाले कहां चूकते हैं।
यहां महिलाओं को आरक्षण देने के बाद राजनीतिक दलों की पतली हुई हालत पर भी बात होती है तो ठेकेदारी का काम करने वाले लोगों के पार्षद बनने की अन्तर्कथा भी रस लेकर सुनाई जाती है। निगम की आर्थिक स्थिति का रोना रोते हुए महापौर से नाउम्मीदी की बात भी आती है तो यह भी चर्चा होती है कि दो विधानसभाओं से जीतने वाला व्यक्ति विधायक से तो अधिक रुआब वाला होगा ही। इस पेटे पार्षदों के अधिकारों की बात भी चल जाती है। मसखरा बीच में बात काटते हुए पूछता है कि ‘इयां ने राजनेता कद समझसी काका?’
भतीज की बात भी सही है। सीधे जनता द्वारा चुनकर आने के बाद भी पार्षदों को कोई भी जनप्रतिनिधि या राजनेता नहीं समझता। यह पार्षदों का दुख भी है और जरूरत भी। पाटे को एक और नया टॉपिक मिल जाता है। बात चलती रहती है लेकिन मजाल है कि इन पाटों पर किसी भी प्रत्याशी का कार्यालय खुल जाए।
पाटे के मुखिया अगर किसी बात को लेकर सबसे अधिक सजग हैं तो वह है पाटे की शुचिता। कोई भी पाटा किसी प्रत्याशी का कार्यालय नहीं बना है। कहीं से भी किसी प्रत्याशी की जीत हार की बात नहीं होती। ‘नो पोलीटिक्स’ कहते हुए हाथ जोड़कर सभी राजनेताओं का स्वागत करने वाले यहां बैठे लोग किसी को भी वोट देने से मना नहीं करते लेकिन किसी को भी यह छूट नहीं देते कि पाटे को राजनीति का मंच बना ले।










