Saturday, November 14, 2009 09:23 [IST]  

danik bhaskarफुटपाथ पर तड़पता बचपन

भास्कर न्यूज

चूरू. जिले भर में आज बाल दिवस पर कई कार्यक्रम होंगे। इन्हीं कार्यक्रमों के बीच कई बच्चे ऐसे भी मिलेगें जिनका बचपन फुटपाथ पर हर रोज कुचलता हुआ नजर आता है। ऐसा नहीं है सरकार इनके कल्याण के लिए प्रयासरत नहीं है।



बाल कल्याण जैसी सैंकड़ों योजनाएं इनके कल्याण के लिए चलाई जा रही है। जिसके तहत जिले भर में इनकी स्थिति को सुधारने के लिए एक परियोजना के तहत 49 लाख का बजट भी सरकार ने आबंटित कर दिया है। लेकिन कार्मिकों की उचित इच्छाशक्ति के अभाव में ये योजनाएं भी इन बच्चों को मुस्कान देने में सफल नहीं हो पा रही है। जिले में बाल मजदूरों की स्थिति को फोकस करती भास्कर की विशेष रपट।



सबसे ज्यादा होटल ढाबों में कार्यरत
श्रम विभाग की मानें तो जिले में सबसे अधिक बाल मजदूर होटलों व ढाबों में कार्यरत हैं। कुछ तहसीलों में कचरा बीनने सहित दूसरे कार्यो में भी बाल श्रमिक लगे हैं।



फैक्ट फाइल
जिले में पहली बार 1997 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन ने बाल श्रमिकों का सर्वे करवाया। जिसके तहत जिले में 437 बाल मजदूरों को पंजीकृत किया गया।



वर्ष 02 में श्रम मंत्रालय ने जब सर्वे कराया तो बाल मजदूरों की संख्या 437 की तुलना में घटकर 148 ही रह गई।



वर्ष 06 में जब दोबारा एक एनजीओ के माध्यम से इनका सर्वे कराया गया तो यह संख्या 25 सौ को भी पार कर गई।



एक अनुमान के मुताबिक शेखावाटी में 10 हजार से अधिक बाल मजदूर होटलों, ढाबों व दूसरे अन्य जोखिम पूर्ण कार्यो में लगे हुए हैं।



14 वर्ष से कम उम्र के बाल मजदूरों की भारत में कुल संख्या लगभग 8.5 मिलियन है।



8.5 मिलियन बाल मजदूरों में 25 प्रतिशत विभिन्न व्यवसायों तथा 36 प्रतिशत घरेलू कार्यो में लगे हुए हैं।



राजस्थान राज्य में कालीन व बुनाई उद्योग में 12 हजार से अधिक बाल मजदूर कार्यरत हैं।



इनमें से सबसे ज्यादा टोंक के कालीन उद्योग में कार्यरत हैं।



सरकारी प्रयासों से राज्य के 14 हजार 223 बाल मजदूरों को मुख्य धारा में शामिल कर उन्हें शिक्षित व सुयोग्य नागरिक बनाने का कार्य किया जा रहा है।
1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पहली बार बाल अधिकारों को लेकर एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया। भारत सरकार ने बालकों को विधिक संरक्षण प्रदान करने के तहत 13 बड़ी विधायी अभिनियमितियों को मान्यता दी है। जिसके तहत बालक श्रम गिरवी करण अधिनियम 1933, बालक नियोजन अधिनियम 1938, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखाना अधिनियम 1951, शिशु अधिनियम 1961, बाल श्रम प्रतिषेध और विनियमन अधिनियम 1986 आदि प्रमुख हैं।

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