Sunday, November 15, 2009 01:21 [IST]  

danik bhaskarकैसे खत्म हो अफगान युद्ध की दुविधा?

एम जे अकबर

ओसामा बिन लादेन को ढूंढ़ने के लिए २क्क्१ में अफगान युद्ध शुरू हुआ था। जब पेंटागन, सीआईए और उपग्रह विज्ञान के संयुक्त प्रयास इस छह फुट के व्यक्ति को खोज पाने में विफल हो गए तो युद्ध की दिशा थोड़ी घुमा दी गई। अब तेजी से अपने डैने फैलाते तालिबान को काबू में करना अफगानिस्तान में सैन्य कब्जे की नई वजह बन गई। लेकिन जब तालिबान ने झुकने से इनकार कर दिया तो अपने गिरते समर्थन को थामने के लिए नया तर्क ढूंढ़ निकाला गया : पाकिस्तान के आणविक हथियारों को ‘इस्लामियों’ के हाथों में जाने से रोकने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए।



ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो देश आणविक हथियारों की रक्षा नहीं कर सकता, क्या उस पर यह भरोसा किया जा सकता है कि वह अपने यहां हथियार रख सकता है? ओबामा ने उस लड़ाई को लड़ने से इनकार कर दिया, जिसे बुश ने शुरू किया था। बुश यह तो जानते थे कि लड़ाई को शुरू कैसे करना है, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि इसे खत्म करना कैसे संभव होगा।



पाकिस्तान के नजरिए से इसका समापन करजई की जगह किसी ऐसे तालिबानी नेता को बिठाकर किया जा सकता है, जो मुल्ला ओमार नहीं हो। वह नेता शांति का ऐलान कर देगा, जिससे अमेरिका को काबुल से शान से निकलने का मौका मिलेगा और वियतनाम के सैगोन से हेलीकॉप्टर से भागने जैसी शर्मिदगी से बच सकेगा। अन्य कोई प्रस्ताव नहीं होने की स्थिति में इसे कुछ महत्व दिया जा सकता है।



यदि ऐसा होता है तो ‘अच्छे तालिबान’अफगानी महिलाओं को फिर से शताब्दियों पीछे धकेल देंगे और देश को शुद्धतावाद के कोमा में ले जाएंगे। लेकिन वे इस्लामाबाद के सहयोगी होंगे और अमेरिका व ब्रिटेन उनके संरक्षक की भूमिका निभाएंगे। यदि स्थानीय तालिबान पाकिस्तान के पिछवाड़े में हिंसक गतिविधियां नहीं करते तो इस्लामाबाद कुछ और करने की स्थिति में होता। मैं उज्बेक नेता जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम से एक बार मजार-ए-शरीफ में मिल चुका हूं।



उनकी राय भले ही पूरी तरह सही नहीं हो, लेकिन स्पष्ट होती है। उन्होंने हाल ही में डेली टेलीग्राफ के डीन नेलसन और बेन फार्मर को दिए एक साक्षात्कार में कुछ बेहद अहम विचार व्यक्त किए हैं :



छह साल की लड़ाई के दौरान कैप्टन या मेजर रैंक के एक भी अफगानी अफसर ने अपनी जान नहीं गंवाई है, क्योंकि अफगान इसे अपनी लड़ाई मानते ही नहीं।



यदि पश्चिमी नेता मानते हैं कि तालिबानी अंतत: लादेन का साथ छोड़ देंगे तो वे गलत सोच रहे हैं।



पश्चिमी मदद से गरीबी दूर नहीं हुई, बल्कि इससे स्थानीय पहल खत्म हो गई, राजनेता और भी अमीर हो गए।



तालिबान को केवल व्यावहारिक सैन्य रणनीति से हराया जा सकता है जिसमें ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ तालिबान जैसे वर्गीकरण से बचना होगा और स्थानीय जनता को साथ लेना होगा।



दोस्तम इन शब्दों में भ्रष्टाचार निरोधक पाखंड को खारिज कर देते हैं : ‘वे काबुल में यूनिकॉर्न (ऐसा पौराणिक जानवर जो घोड़े जैसा दिखता है और उसके सिर पर एक सींग होता है) चाहते हैं।’

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