Sunday, November 15, 2009 01:22 [IST]  

danik bhaskarक्या आप इरोम शर्मिला को जानते हैं ?

सुभाष गाताड़े

मणिपुर की इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक आमरण अनशन का दसवां साल शुरू हो चुका है। शर्मिला की एक ही मांग है- मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम हटाया जाए। वे भूख हड़ताल पर क्यों अड़ी हैं, और सरकार आख़िर क्यों उनकी मांग नहीं मान रही है ? इस पूरे मामले पर एक नजर..




ह नवंबर का दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ही नहीं, अध्यापकों और कर्मचारियों के लिए भी लंबे समय तक यादगार बना रहेगा। इस दिन विश्वविद्यालय के प्रमुख प्रांगण में सैकड़ों छात्रों-अध्यापकों की उपस्थिति में तीन घंटे से अधिक चलने वाले एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसका मक़सद था सुदूर मणिपुर में अपनी ऐतिहासिक भूख हड़ताल के दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहीं इरोम शर्मिला और उनके संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट करना।



यह अकेली दिल्ली का क़िस्सा नहीं है। नवंबर के पहले सप्ताह में भारत के कई शहरों में इसी क़िस्म के छोटे-बड़े सैकड़ों कार्यक्रम हुए। किसी ने इरोम शर्मिला के जीवन पर बनी या मणिपुर के ताजा हालात को बयां करती फिल्म दिखाई, कहीं लोग भूख हड़ताल पर बैठे, तो कहीं मोमबत्तियां जलाकर अपना समर्थन जाहिर किया।



आख़िर ऐसी क्या बात है कि इरोम शर्मिला ने पिछले नौ साल से भूख हड़ताल जारी रखी है और उन्हें सुरक्षा बलों के पहरे में जबरन नली के Êारिए कुछ खिलाया जाता है, जहां फिलवक़्त वे बंद हैं। यह 2 नवंबर, सन् 2000 की बात है, जब मणिपुर की राजधानी इंफाल से लगभग 15 किलोमीटर दूर मालोम बस स्टैंड पर सुरक्षा बलों द्वारा गोली चलाने से दस लोगों की मौत हुई थी।



इरोम शर्मिला उस व़क्त मालोम में ही एक बैठक में थीं, जो एक शांति रैली के आयोजन के लिए बुलाई गई थी। अगले दिन अख़़बारों के पहले पन्नों पर मारे गए लोगांे की तस्वीरें थीं। इरोम को उस व़क्त लगा कि ऐसी परिस्थिति मंे शांति रैली का आयोजन बेमानी होगा और उन्होंने वहीं निर्णय लिया कि ‘Êिांदगी की सरहद पर जाकर ऐसा कुछ किया जाए’ ताकि सुरक्षा बलों की यह ‘ज्यादती’ रुके।



वैसे, यह कोई पहला वाक़्या नहीं था, जब मणिपुर या उत्तर पूर्व की सड़कें मासूम लोगों के ख़ून से लाल हुई थीं। लेकिन इरोम को लगा कि पानी अब सर पर से गुÊारने को है, लिहाजा उन्होंने उसी दिन से ऐलान कर दिया था कि आज से वे खाना छोड़ रही हैं। उनकी बस एक ही मांग है कि मणिपुर की सरजमीं पर पिछले 51 साल से लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट- एएफएसपीए) हटा दिया जाए, जिसके तहत सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार दिए गए हैं ।



इस अधिनियम के तहत सरकार किसी क्षेत्र विशेष को अशांत क्ष़ेत्र घोषित कर सकती है, अगर वह इस नतीजे तक पहुंचती है कि ‘उपरोक्त क्षेत्र या उसका एक हिस्सा एक ऐसी अशांत या ख़तरनाक स्थिति में है कि नागरिक शासन की मदद के लिए फ़ौजी बल का इस्तेमाल Êारूरी है।’ तब संबंधित प्रशासक ‘ऐसे क्षेत्र या उसके किसी हिस्से को, जो किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश का हिस्सा है, अशांत क्षेत्र घोषित कर सकता है।’



अधिनियम का सेक्शन चार किसी कमीशंड अफसर, वारंट अफसर या नान कमीशंड अधिकारी को ऐसे क्षेत्र में मिले अधिकार पर रोशनी डालता है। इसके तहत वह ‘सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए गोली भी चला सकता है, जिसमें किसी की मौत भी हो सकती है’। धारा छह बताती है कि इस अधिनियम के अंतर्गत काम कर रहे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई केंद्र सरकार की अनुमति से ही मुमकिन है। अंदाÊा लगाया जा सकता है कि साधारण नागरिकों के लिए अपने ऊपर हुए अत्याचार की जांच शुरू करवाने के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाना कितना लंबा, ख़र्चीला और पीड़ादायी अनुभव होता होगा।



मालोम बस स्टैंड पर शुरू हुए इस अनोखे भूख हड़ताल की ख़बर धीरे-धीरे प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी पहुंची, और उसके प्राणों की रक्षा के लिए सरकार पर दबाव बढ़ा। इस दबाव से बचने का एक ही रास्ता था कि सरकार ने इरोम शर्मिला को ‘आत्महत्या की कोशिश’ के आरोप में न्यायिक हिरासत में ले लिया। 21 नवंबर को प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कर वहीं नाक से जबरन तरल भोजन देने का सिलसिला शुरू किया।



‘आत्महत्या की कोशिश’ के लिए अदालत अधिक से अधिक एक साल की सÊा दे सकती है और इतने सालों के दौरान शर्मिला कई बार उसे काट चुकी हैं। उन्हें एक साल की सÊा पूरी करने के बाद न्यायिक हिरासत से रिहा किया जाता है और तुरंत गिऱफ्तार कर जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के उसी सीलन भरे वार्ड में डाल दिया जाता है और यह चक्र जारी रहता है।






तीन साल पहले, तीन अक्टूबर को जब अदालत द्वारा इरोम को सुनाई गई एक साल की सÊा ख़त्म हुई और वे अस्पताल से छूटकर कांगला किले की ओर बढ़ीं, तब लोगों का यही अनुमान था कि पुलिस फिर उन्हें गिऱफ्तार कर अस्पताल की न्यायिक हिरासत में डाल देगी। लेकिन शायद आला अफसरों को इस बात का गुमान नहीं था कि इरोम ने अपने इस अनूठे संघर्ष के मंच के तौर पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंचना तय किया है, ताकि वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया को बता सकें कि ‘सशस्त्र बलों को निरंकुश अधिकार देने वाले इस कानून के कारण मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं निरंतर होती हैं, जिन पर कोई कार्रवाई भी नहीं हो पाती।’ दिल्ली में जंतर-मंतर पर इरोम ने अपनी भूख हड़ताल जारी रखी। बाद में यहां पर भी उन्हें गिऱफ्तार कर राममनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, और फिर वहीं से उन्हें मणिपुर भेजा गया।



इस बात का विशेष उल्लेख Êारूरी है कि एक तरफ़ जहां इरोम शर्मिला सरकार के खिलाफ़ अपने अनोखे संघर्ष में पूरे जी-जान से जुटी हैं, वहीं उनके इस संघर्ष में बहुत-से लोग उनके पीछे मÊाबूती से खड़े हैं। इरोम की भूख हड़ताल के चलते उनके भाई सिंहजीत की सरकारी नौकरी भी छूट गई, क्योंकि उन्हें लगा कि अपनी बहन का निरंतर साथ दिया जाना Êारूरी है। यह भी सही है कि इस दौरान उनके परिवार का दिवाला निकल चुका है, क्योंकि उन पर काफी कर्Êा हो चुका था।



लेकिन इरोम शर्मिला की 75 वर्षीय मां इरोम सखी ने इस दौरान जो कुछ झेला है, उसके सामने इन आप्तजनों के त्याग की चमक फीकी पड़ती दिखती है। 2 नवंबर, 2000 के उस दिन अपनी बिटिया को आशीर्वाद देने के बाद से वे कभी अपनी बेटी से मिली नहीं हैं। आंखों से टपकने वाले आंसुओं को रोकने की कोशिश किए बिना इरोम सखी ने एक पत्रकार को बताया था, ‘यह मुमकिन है कि बिटिया को देख कर मेरे भावुक हो जाने से उसका संकल्प कमÊाोर पड़ सकता है। और मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी इंसानियत की बेहतरी के लिए छेड़ी गई इस लड़ाई में हार जाए।’



मणिपुर के इतिहास की यह ख़ासियत है कि वहां राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में महिलाएं हमेशा ही आगे रही हैं। यह अकारण नहीं था कि थंगजाम मनोरमा की शहादत के बाद इंसाफ़ की मांग करते हुए जो व्यापक आंदोलन चला था, उसमें भी महिलाओं की भूमिका पर विशेष चर्चा हुई थी। 15 जुलाई, 2004 को असम राइफल्स के क्षेत्रीय मुख्यालय के सामने सूबे की चंद प्रतिष्ठित और बुÊाुर्ग महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था। वे अपने साथ जो बैनर लाई थीं, उस पर लिखा था-‘भारतीय सेना आओ हम पर बलात्कार करो’। इसी छह नवंबर को देश के अलग-अलग हिस्सों से वहां पहुंचे गणमान्य लोगों के एक प्रतिनिधि-मंडल ने इरोम शर्मिला से मुलाक़ात की।



लोगों को मालूम होगा कि जुलाई माह में एक पूर्व आतंकवादी संजीत की सरेआम मुठभेड़ में हत्या के बाद से मणिपुर बंद चल रहा है और इस दौरान मानवाधिकार हनन के तमाम आरोप लगे हैं। उपरोक्त शिष्टमंडल में ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक सुमित चक्रवर्ती, रिटायर्ड आईपीएस डॉ. केएस सुब्रह्मण्यम, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव आदि कई लोग शामिल हैं।



चंद रोÊा पहले ही सरकार ने प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी को इरोम से मिलने के लिए अनुमति नहीं दी थी। बीबीसी संवाददाता के साथ बात करते हुए इरोम ने कहा था, ‘मेरी भूख हड़ताल मणिपुर की जनता की तरफ़ से है। यह कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है- यह प्रतीकात्मक है। वह सच्चाई, प्यार और अमन का प्रतीक है।’ देखना यह होगा कि इरोम ने ‘सच्चाई, प्यार और अमन’ के लिए जो एक लौ जलाई है, क्या शेष भारत के लोग उसे थाम लेंगे या चुपचाप बुझने देंगे?





स्पेशल एक्ट के तर्क
जाहिर है, आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट को लागू रखने के पीछे सरकार की भी अपनी मजबूरियां हैं। किसी भी क्षेत्र को एक सीमित अवधि के लिए ही अशांत घोषित किया जाता है और छह महीने से पहले इसकी समीक्षा की जाती है। बहरहाल, इस अधिनियम को लागू करने के पीछे कई वजहें बताई जाती हैं। सबसे बड़ी वजह तो यह है कि कोई भी सैन्य बल विद्रोहग्रस्त, अशांत क्षेत्र में बिना समुचित वैधानिक सुरक्षा के अपने जवान नहीं भेजना चाहेगा।



हर पल ख़तरे वाले क्षेत्रों में थोड़ी-सी भी ढिलाई से जवानों की जान जा सकती है या सार्वजनिक स्थानों पर बड़ा हमला हो सकता है। फिर, जब आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई शुरू होती है, तो वे स्थानीय लोगों को सैन्य बलों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज करवाने के लिए भड़काते हैं। ऐसे क्षेत्रों में मुठभेड़ों में स्थानीय आतंकियों का पलड़ा थोड़ा भारी ही रहता है। आम लोगों के बीच छुपे विद्रोहियों के खिलाफ़ कार्रवाई के दौरान निरपराध और उनके मकान आदि भी चपेट में आ जाते हैं।




बात से बुझेगी आग: अवध नारायण श्रीवास्तव (मणिपुर के पूर्व राज्यपाल, पूर्व आईपीएस एवं प्रसिद्ध साहित्यकार)
मुझे लगता है कि मणिपुर की समस्या ‘नासमझी’ से उपजी है। आप सरकारी नासमझी भी कह सकते हैं, जिसके कारण ख़ासतौर पर युवाओं में ग़ुस्सा है। यही बात उन्हें हथियार उठाने के लिए उकसाती है। हालांकि वहां सक्रिय 25-26 विद्रोही गुटों में से बहुत से गुटों का तो कोई उद्देश्य ही नहीं है, वे तो बस लड़ रहे हैं। इसलिए सरकार और जनता के बीच संवाद सबसे Êारूरी है। अगर उनकी बातें सुनी जाएं, समझी जाएं, तो अधिकांश समस्या ऐसे ही दूर हो जाएगी।



इरोम शर्मिला का अनशन मेरा कार्यकाल ख़त्म होने के बाद शुरू हुआ था, वरना मैं उससे बात Êारूर करता। जहां तक आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट का सवाल है, यह एंटीबायोटिक के स्ट्रांगेस्ट डोÊा की तरह है। अगर सरकार को लगता है कि इस दवा से फ़ायदा हुआ है, तब तो इसे जारी रखने का तुक है, अन्यथा महज स्टेटस बनाए रखने के लिए इसे लागू रखने का कोई अर्थ नहीं।



इसे संशोधित करने का विकल्प भी है। जब मैंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से बात की थी, तो यह सुझाव दिया था कि सैन्य बलों का हिल्स में ऑपरेशनल रोल रखा जाए, लेकिन वैली से निकाल लिया जाए (मणिपुर मुख्य रूप से दो भौगोलिक क्षेत्रों में बंटा है : पहाड़ियां, और घाटी व मैदान। राज्य की 59 फीसदी आबादी घाटी में ही रहती है)। तब यह सुझाव मान लिया गया था।



राज्यपाल के तौर पर मेरे कार्यकाल में हालात ऐसे नहीं थे। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। अभी रांची में राष्ट्रीय खेल पांचवीं बार स्थगित हुए हैं, लेकिन तब इंफाल में राष्ट्रीय खेलों का आयोजन क़रीब डेढ़ महीने चला था, जिसमें लगभग 30 हÊार लोग शामिल हुए थे। उस समय कोई छोटी-सी वारदात भी नहीं हुई थी। एक और ख़ास बात। जब तक ये खेल चले, इंफाल के घर-घर में तिरंगा स्वस्फूर्त लहराया जाता रहा।



मणिपुर की वैली में वैष्णव संस्कृति का गहरा असर है। पिछले साल मेरा दो बार मणिपुर जाना हुआ। वहां के लोग भी मुझसे मिलते रहते हैं। वे पूछते हैं कि यदि आप (सरकार/शेष भारत) भी हमें छोड़ देंगे, तो हम कहां जाएंगे। हालांकि ग़ुस्सा वहां भी है, लेकिन मेरा निजी मत है कि लोग नाराÊा हैं, तो उनसे बात तो करें! दरअसल, जब सीधा और सतत संपर्क नहीं होगा, तो ग़लतफ़हमियां पनपेंगी ही।



मेरा मानना है कि जिन लोगों ने हथियार उठा रखे हैं, उनमें से Êयादातर तो बातचीत से ही पिघल जाएंगे। मणिपुर कला-संस्कृति और साहित्य के मामले में बहुत समृद्ध राज्य है। मेरा अनुभव है कि वे विश्वसनीय और वफ़ादार लोग हैं। Êारूरत है तो उन्हें बातचीत के लिए तैयार करने की, संवाद स्थापित करने की। (बातचीत पर आधारित)

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