Sunday, November 15, 2009 01:27 [IST]  

danik bhaskarअजब दास्तां है मेरी जिंदगी की..

राजकुमार केसवानी

एक सदी- यानी सौ बरस। कितने सारे होते हैं ये सौ बरस? इतने कि हम जिनसे मोहब्बत करते हैं उनकी लंबी उम्र की दुआएं मांगते हुए कहते हैं- ‘आप सौ साल जिएं’। इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं।



इसी ख्याल से सोचता हूं, तो सोचता हूं आख़िर किसने मांगी होगी उमराव जान के लिए ऐसी दुआ। अब देखिए न उमराव जान की कहानी को सौ बरस के ऊपर हो चले हैं और यह अब तक न सिर्फ़ जिंदा है, बल्कि दिन-ब-दिन उस पर जवानी आती जाती है। उम्र तो बहुत सारे क़िस्सों और फ़सानों की उमराव से ज्यादा है और वो अपनी पूरी पु़ख्तगी के साथ हमारे साथ मौजूद हैं, मगर उमराव जान की बात थोड़ी अलग है।



मेरी समझ से उमराव जान की इस जवानी का राÊा यह है कि उसकी पूरी कहानी, अब तक किसी ख़ूबसूरत राज की तरह कुछ सामने है, कुछ पसे-पर्दा है। व़क्त की हवाओं के थपेड़े या फिर किसी दिले-आशिक़ की आह से इस राज से जरा पर्दा हटता है, तो कभी एक हक़ीक़त लगती है, कभी एक फ़साना लगता है। और जो कुछ कसर बाक़ी थी, उसे मुज़फ्फ़र अली ने 1981 में रेखा को ‘उमराव जान’ बनाकर पूरा कर दिया।



कभी-कभी कोई फ़नकार फ़सानों को भी हक़ीक़त की शक्ल दे देता है। रेखा ने यही काम ‘उमराव जान’ के साथ किया है। अब इसके बाद तो कोई चाहकर भी यह नहीं चाहता कि कोई इसे फ़साना कहे।



मैं ख़ुद को भी उन्हीं में से एक गिनता हूं। और मुझे ताÊा दिलासा इस बात ने दिया है कि कुछ अर्सा पहले ही उर्दू के नामवर प्रोफ़ेसर क़मर रईस साहब ने एक पत्रिका ‘ऐवाने-उर्दू’ में उमराव जान की एक असल फोटो प्रकाशित की है। यह फोटो उन्हें हैदराबाद से किसी नवाब की लायब्रेरी से मिली है। उस लायब्रेरी में रखी "उमराव जान ‘अदा’ " के पहले एडीशन वाली किताब (1905) के अंदर एक बहुत ही Êार्द चेहरे वाला ख़स्ता हाल लिफ़ाफ़ा मिला, जिसके अंदर कैमरे से खींची गई यह फोटो मौजूद थी।



यह बात पहले ही Êामाने में जहिर है कि जब मिÊर हादी रुस्वा की यह किताब पहली बार छपकर लोगों तक पहुंची, तो उसके फ़ौरन बाद ही इस किताब के जवाब में एक दूसरी किताब आ गई थी- ‘जुनूने इंतÊार याने फ़साना-ए-मिÊर रुस्वा’। माना जाता है कि यह किताब उमराव जान ने रुस्वा से नाराÊा होकर जवाब में लिखी थी। इसके बावजूद अब तक इस बात पर बहस जारी है कि मिÊर रुस्वा ने अपने निजी अनुभवों को ‘उमराव जान’ नाम का एक किरदार गढ़कर बड़ी कामयाबी से पेश किया है। इतनी कामयाबी से कि वह क़दम-क़दम पर असल लगता है।



अब हक़ीक़त जो हो, लेकिन यह सही है कि मिÊर हादी रुस्वा की बदौलत हम सब को कुछ ख़ूबसूरत ग़Êालें, कुछ बेहतरीन संगीत और कुछ फिल्में मिल गईं।
इतना सब कह चुकने के बाद यह ठीक नहीं है कि मिÊर रुस्वा और उमराव के बारे में कोई और बात ही न करें। मिज्र मुहम्मद हादी रुस्वा (1857 से 1931) उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेÊाी, लैटिन और दूसरी कई Êाबानों के जानकार थे। लखनऊ में पैदा हुए, पले, बढ़े। शायरी का शौक़ लगा, तो उस दौर के मशहूर उस्ताद दबीर ने मदद की।



यूं तो उन्होंने कई किताबें लिखीं और अंग्रेÊाी किताबों के उर्दू में अनुवाद किए, लेकिन ‘उमराव जान अदा’ उनकी अकेली पहचान है।



कि बचपन किसी का, जवानी किसी की



मुज़फ्फ़र अली की ‘उमराव जान’ के संगीत और रेखा की बेमिसाल अदाकारी ने इस कहानी को इसी एक फिल्म के साथ जोड़ कर रख दिया। हक़ीक़त यह है कि इसी कहानी पर सबसे पहले निदेशक एस.एम.यूसुफ़ ने 1958 में एक फिल्म बनाई थी ‘मेहंदी’।



पाकिस्तान में भी 1972 में ‘उमराव जान अदा’ के नाम से फिल्म बनी और 2003 में जियो टीवी ने इसे सीरियल के रूप में पेश किया। लेकिन पाकिस्तान में भी 1981 वाली ‘उमराव जान’ ही Êयादा प्रसिद्ध है। 2006 में भी जे.पी. दत्ता ने अभिषेक और ऐश्वर्या को लेकर फिल्म बनाई, मगर वो शहीद हो गई।



जब ‘उमराव जान’ में ख़य्याम साहब की लासानी बंदिशों, आशा भोंसले की मद्धम पर आकर इठलाती गायकी और शहरयार की ख़ूबसूरत शायरी की छांव से Êारा बाहर निकलकर पीछे देखता हूं, तो मुझे 1958 की ‘मेहंदी’ नजर आती है। फिल्म में नवाब सुल्तान वाली भूमिका अजीत ने निभाई और अमीरन उर्फ़ उमराव जान की भूमिका में थीं जयश्री। जयश्री मतलब वी. शांताराम की पत्नी और अभिनेत्री राजश्री की मां। पति से अलग होने के बाद यह उनकी पहली फिल्म थी।



यह फिल्म अभिनय और मेकिंग के लिहाज से 1981 की फिल्म से काफ़ी कमजोर पड़ती है, लेकिन इसका संगीत और शायरी अपनी तरह से बहुत लाजवाब है। यह शायद संगीतकार रवि की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। ख़ुमार बाराबंकवी की लाजवाब शायरी ने उमराव जान की पीड़ा को बेहद ख़ूबसूरत ल़फ्Êा दिए हैं।



इस फिल्म में Êयादातर गीत लता मंगेशकर के गाए हुए हैं। मुझे यक़ीन है आपको भी याद होंगे। ‘अजब दास्तां है मेरी Êिांदगी की, कि बचपन किसी का, जवानी किसी की / मुक़द्दर ने मुझसे ये क्या दिल्लगी की / कि बचपन किसी का, जवानी किसी की’। उमराव पर फिल्माई गई लगभग हर ग़Êाल के म़़क्ते, मतलब आख़िरी शेर में ख़ुमार साहब ने बहुत ख़ूबसूरती से शायर की जगह उमराव के तख़ल्लुस ‘अदा’ का इस्तेमाल भी किया है। आख़िर को उसे फिल्म में एक शायरा के तौर पर भी दिखाया गया है। ‘सिखाया गया है इशारों पे चलना / निगाहें बदलना, दिलों को मसलना / ‘अदा’ हर अदा है मेरी बेक़सी की’।
दूसरा गीत भी क्या गीत है भई वाह। ‘अपने किए पे कोई पशेमान हो गया / लो और मौत का सामान हो गया’। और फिर आख़िर में अदा। ‘ये बहकी-बहकी बातें, भरी बÊम में अदा / ये आज क्या तुझे अरे नादान हो गया’।



दो और ख़ूबसूरत नगीने। ‘प्यार की दुनिया लुटेगी हमें मालूम न था / दिल की दिल ही में रहेगी, हमें मालूम न था’। दूसरा है ‘अदाओं मे शोखी, निगाहों में मस्ती / लड़कपन मुझे दे गया जाते-जाते’। इसी के आख़िर में है कि ‘अदा कोई अपना नहीं है जो समझे, मेरे दिल की धड़कन, मेरे दिल की बातें / किसी के न कानों में आवाज पहुंची, जुबां थक गई है सुनाते-सुनाते’। इन सबके ऊपर मेरे दिल में जिस चीÊा ने अपने लिए एक ख़ास जगह बनाई है, वह क़ामिल रशीद की लिखी हुई है। अंदाÊा साहिर लुधियानवी वाला है। Êारा देखिए।



ये अफ़साना नहीं है सुनने वालो दिल की बातें हैं
सियाही ग़म की है वैसे बड़ी रंगीन रातें हैं



यूं तो बहुत लंबी नज्म है, लेकिन कम से कम एक हिस्सा और सुन लीजिए।



है ग़ुस्ताख़ी मगर कहना है कुछ दुनिया से, मर्दो से
शरीफ़ों, मनचलों, मुल्लां से, आवारगर्दो से
है बेपर्दा मगर ताने दिए जाते हैं पर्दो से
ये अफ़साना नहीं है..



अगर आपने ‘उमराव जान’ (1981) देखी है, तो आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि फिल्म ‘मेहंदी’ में उस्ताद जी का रोल ‘मुग़ल-ए-आÊाम’ के संगतराश- कुमार ने निभाया है, जिसे ‘उमराव जान’ में भारत भूषण ने निभाया। इस फिल्म में कुमार पर हेमंत कुमार का गाया एक गीत भी फिल्माया गया है- ‘बेदर्द Êामाना तेरा दुश्मन है तो क्या है / दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका ख़ुदा है’।



इस सारी बात का लब्बो-लुबाब यह है कि ‘उमराव जान’ के नाम के साथ अकेली एक फिल्म को याद किया जाता है, जबकि ‘मेहंदी’ भी इसी उपन्यास पर आधारित थी और इसमें ख़ूबसूरत संगीत था। फिल्म की छोड़िए, पर हो सके, तो आप इसका संगीत Êारूर सुनिए और मुझे भी बताइए कि आपको यह कैसा लगा।



एक बात और। उमराव जान ख़ुद एक अच्छी शायरा थीं। पुस्तक में उसकी शायरी के कुछ ख़ूबसूरत नमूने मौजूद हैं-
किसको सुनाएं हाल दिले-जार ‘अदा’
आवारगी में हमने जमाने की सैर की



***
शब-ए-फ़ुरकत बसर नहीं होती
नहीं होती, सहर नहीं होती
शोर-ए-फरयाद अर्श तक पहुंचा
मगर उसको ख़बर नहीं होती



लीजिए जिस बात की ‘उसको’ तब ख़बर नहीं हुई, उस बात की ख़बर अब सारे Êामाने में है। इसीलिए, तो चचा ग़ालिब ने कहा है कि ‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक’।



और..
इस नफ़े-नुकसान के गणित से चलती दुनिया में जब कोई लाभ-हानि से हटकर सोचता है, तो बहुत प्यारा लगता है। फिल्म ‘ब्लू अम्ब्रेला’ को देखे काफ़ी दिन बीत चुके हैं, पर पंकज कपूर की बात अब तक साथ चल रही है।



फिल्म में पंकज कपूर का दिल एक नीले रंग के ख़ूबसूरत छाते पर आ जाता है, जो कि एक बच्ची के पास है। जब तमाम प्रलोभनों के बावजूद वह बच्ची नंदू (पंकज कपूर) को छाता बेचने से इंकार कर देती है, तो वह चोरी पर उतारू हो जाता है।



जब उसे समझाइश दी जाती है कि ऐसा नहीं करना चाहिए और आख़िर एक मामूली से छाते के लिए यह सब करने से क्या फ़ायदा, तब Êारा उसका सवालों से भरा जवाब देखिए-



‘बारिश के पानी में नाव दौड़ाने से कोई फ़ायदा होता है क्या? सूरज को उस पहाड़ी के पीछे डूबते हुए देखने से कोई फ़ायदा है क्या? आत्मा की ख़ुशी के लिए फ़ायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।’



है न सौ टंच सच्ची बात? बस तो इस घड़ी तो मैं चला, अगले ह़फ्ते फिर करेंगे, वही आत्मा की ख़ुशी की बात- आपस की बात।
जय-जय।

  share
apne vichaar
post a comment
name:
email:
select your language:     Hindi Roman     Hindi Phonetic     English
comment:
code: