मुहर
रोली ने दूर की सोची और एहसास किया कि वह जब तक यहां काम करेगी, यह पाजी पंडित ऐसी ही बातें करेगा। वह जानती थी, सुनील किसके बारे में ये बातें कह रहे हैं। ये सारी ग़लतियां रंजीत सर में हैं..
रोली शर्मा के अकड़ू और Êिाद्दी होने की बात आजकल सबको पता चल गई है। अभी-अभी रंजीत सर ने भी उसे उसके Êिाद्दीपन के लिए डांट लगाई है। रोली की नौकरी छूटे तीन महीने हो गए हैं। नौकरी की तलाश में मित्रों की मदद उसे अच्छी नहीं लगती। यह सच है, पर सीधे रास्ते बंद हैं। उसके मित्र समझदार हैं। नौकरी की बातचीत कहीं चलाने से पहले रोली से उसकी सहमति लेने का काम वे सलीके से करते हैं। इस तरह ताकि रोली को फील न हो जाए।
भोपाल के इस द़फ्तर में नौकरी की बात रंजीत सर ने चलाई है। सुनील पांडेय उनका सहपाठी रहा है और दो साल के पाठ्यक्रम के बीच कभी जो रंजीत ने सुनील से बात की हो। समय-समय की बात। तुक्के और अपनी बीवी की मदद से दो साल में सुनील ने द़फ्तर की दुनिया में बढ़िया स्थान पा लिया है। इस द़फ्तर में नौकरी की बात चलाने से पहले रंजीत ने दो या तीन बार सोचा था।
नौकरी रंजीत की भी नहीं है, पर उन्होंने छोड़ रखी है। उनका तरीक़ा है। छह महीने नौकरी करते हैं, शानदार काम करते हैं, इतना शानदार कि चाहकर भी बॉस डांट नहीं पाता, फिर छह महीने दुनिया घूमते हैं। फिर शुरुआत वहीं से करते हैं। इस अख़बार की छवि उनके मन में अच्छी है, इसलिए वे चाहते हैं कि रोली यहीं काम करे।
भोपाल तक का रिÊार्वेशन टिकट लेने के लिए वह क़तार में थी और कोलकाता के अपने मित्र से बात कर रही थी। आकाश था। यहां टिकट क़तार से कम मिल रहे थे। ऐसे में बुकिंग क्लर्क की झल्लाहट उसने आकाश पर निकाली। थोड़ी बेरुखी से कहा- ‘रखो बाद में बात होगी।’ उस मित्र ने कहा, ‘रोली तुम ‘ऐरोगेंट’ हो गई हो।’ शाम को रंजीत सर का फोन आया।
टिकट ले लेने की बात रोली ने सर को बताई। सर ने पूछा, ‘टिकट ‘कन्फर्म’ तो नहीं ही होगा?’ सवाल में तंज था। उसने कहा, ‘बिल्कुल सही।’ सर डांटने लगे। उनका कहना वाजिब था। जाना दो दिन पहले ही तय हो गया था। फिर टिकट भी उसे पहले ही ले लेना था। पर नहीं। आलसी नंबर एक से नंबर दस तक, सब वही जो ठहरी। और तो और, सर की डांट का बुरा भी मान गई। कह दिया, ‘अब मैं भोपाल नहीं आ रही।’ सर ने दुनिया की सारी उपेक्षा बटोर कर कहा, ‘महारानी, ऐसी अकड़ नहीं चलेगी। समझी।’
जब वो अपने लिए चाय बना रही थी, तो पाया कि चीनी नहीं है और इसी के साथ उसे सुबह की बात याद आई, आकाश ने कहा था रोली तुम ‘ऐरोगेंट’ हो गई हो। यह छोटे-मोटे आविष्कार की तरह लगा। शाम को उसे सर ने भी अकड़ू कहा था। यह याद आते ही वह चाय लेकर होस्टल की छत पर चली आई थी।
उसे हंसी और उसके साथ ही एक पुरानी बात याद आई। पत्रकारिता की पढ़ाई के आख़िरी साल में उसने ‘एवरीथिंग इÊा इल्युमिनेटेड’ फिल्म के बारे में सुना। अंकित था या कोई और, जो इस फिल्म की तारीफ़ कर रहा था। अगले ही दिन किसी पत्रिका में उस फिल्म की समीक्षा उसने देखी थी। उसे अच्छा लगा। दोनों घटनाएं अगर कई दिनों के अंतराल पर घटतीं, तब वह शायद इस फिल्म पर ध्यान नहीं दे पाती।
अनोखी बात इसके बाद घटी। उसी दोपहर कैसेट्स की अचर्चित दुकान में टहलते हुए रोली को इस फिल्म की सीडी भी मिल गई। उसे ख़ूब आश्चर्य हुआ। उसे लगा हो-न हो, सारे समीकरण ऐसे बन रहे हैं, जिससे रोली को यह फिल्म दिखाई जा सके। उसने वह फिल्म ख़रीद ली। वरना वह सीडी ख़रीदकर फिल्में देखने वालों में से नहीं है। आज तक उसके पास ख़रीदी हुई बस वही फिल्म है। रोली ने पूरी फिल्म को याद किया और उस घटना की इस बेअंदाÊा पुनरावृत्ति को भी। आज कहीं कोई तीसरा न मिल जाए, जो उसके अकड़ू और Êिाद्दी होने की बात उसे बता दे।
तीसरे दिन वह भोपाल पहुंची। रंजीत सर पिछले पांच दिनों से डंडा-डेरा जमाए हुए थे। सर रोली से दो साल ही सीनियर हैं, पर उनका ज्ञान तगड़ा है और उसे बघारते रहने से बाÊा नहीं आते हैं। रोली को बहुत मानते हैं। चाहते हैं, दुनिया की सारी समझ, सारा ज्ञान और सारा कुछ रोली के पास रहे। रोली, भले ही ऐसा न चाहती हो। दोनों के झगड़े मशहूर हैं। कल साक्षात्कार है। जब से वह आई है, सर उसे कुछ न कुछ समझाए जा रहे हैं। एक घंटे धाराप्रवाह शेयर बाÊार के बारे में समझाते रहे। अभी अर्थशास्त्रीय सूत्रों को समझा रहे हैं। पर रोली यह सब नहीं सुनना चाहती है।
उसे बार-बार समझाए जाने की कोशिश अच्छी नहीं लग रही है। जैसे वह बहुत बड़ी हो गई हो, या जैसे कोई उसे याद दिला रहा हो कि उसकी नौकरी नहीं है। एक बार बीच में टोक कर कहती भी है, ‘इससे पहले मुझे नौकरी नहीं मिली है क्या?’ साक्षात्कार के लिए जाते हुए उसने पीपल के गिरे हुए पत्तों के रंग का सूट पहना था। रास्ते भर, जैसा कि आप सभी अवगत हो गए होंगे, रंजीत सर बड़बड़ाते रहे। ऑफिस के बाहर सुनील पांडेय मिल गए। मिलते ही उन्होंने रंजीत से शेयर बाÊार के उतार-चढ़ाव की बातचीत शुरू कर दी। रंजीत बात Êारूर कर रहे थे, पर साथ ही साथ यह भी सोच रहे थे कि कहीं रोली के साक्षात्कार में देर न हो जाए। उनकी बेचैनी साफ़ दिख रही थी, जिसे देख रोली मन ही मन हंस रही थी।
साक्षात्कार के समय एचआर की टीम के साथ सुनील पांडेय भी बैठे रहे। औपचारिक सवाल पूछे जा रहे थे, उनके औपचारिक जवाब ही वह दे रही थी। एचआर के लोग सवाल पूछ, कई बार सुनील की ओर देख लेते थे, कहीं सवाल वÊानी तो नहीं हो गया? बीच-बीच में सुनील अपने संघर्षो की कहानी, अपनी Êाुबानी शुरू कर दे रहे थे।
सीनियर होने के नाते सब उनकी सुन भी रहे थे- कि बचपन में कैसे पैदल चलकर सुनील पांच सौ मीटर दूर अपने स्कूल जाया करते थे, -कि बचपन में उन्हें फ़ीस जमा करने में कितनी मुश्किल आती थी- इसलिए नहीं कि उनके पास पैसे नहीं थे, बल्कि इसलिए कि फ़ीस जमा कराने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती थी। ..और इतना कह कर सुनील ने रोली की ओर देखा। रोली ने बड़े ग़ौर से देखा, सुनील उसकी तरफ़ देख रहे हैं। एचआर के लोगों ने देखा, सुनील अभ्यर्थी की ओर देख रहे हैं और अभ्यर्थी सुनील की ओर देख रही है।
रोली को देखने के बाद सुनील ने अपनी बात चालू रखी, ‘ये जो महान पढ़ाकू लोग थे और हमें किसी लायक़ नहीं समझते थे, आज ख़ुद सड़क पर हैं। उनका सारा ज्ञान जाने कहां गया कि ये लोग बेकार, बेरोÊागार घूम रहे हैं।’ रोली ने दूर की सोची और पाया कि यहां जब तक वह काम करेगी, यह पाजी पंडित ऐसी ही बातें करेगा। वह जानती थी, सुनील किसके बारे में ये बातें कह रहे हैं। ये सारी ग़लतियां रंजीत सर में हैं। वे अपने कॉलेज में शायद ही किसी से मेल-जोल रखते हों, ख़ुद उससे भी वे केवल राजनीतिक, आर्थिक और पढ़ाई-लिखाई की बात करते हैं।
वे बहुत तेÊा हैं। और अपने आप में इतना ग़ुम रहते हैं कि उन्हें पत्रकारिता के अलावा किसी भी दुनियादारी से कोई मतलब नहीं रहता है। अपने बैच से सबसे पहले नौकरी उन्होंने ही पाई थी। तऩख्वाह भी सबसे तेÊा उन्हीं की बढ़ी थी। यह Êारूर है कि आज उनके पास नौकरी नहीं है, पर उन्होंने नौकरी छोड़ी है, उन्हें निकाला नहीं गया है। इतना लंबा सोचने में रोली की सांस फूल गई थी। आज तक रंजीत सर के बारे में उसने एक साथ इतनी अच्छी बातें कभी नहीं सोची होंगी। इसलिए उसने सुनील पांडेय से कहा कि रंजीत सर जब चाहें, उन्हें नौकरी मिल जाए। कितने अख़बार वाले, जो उनके काम को जानते हैं, उन्हें बुला रहे हैं।
सुनील पांडेय झटका खा गए। किसी से कुछ भी सुनने की उनकी आदत छूट गई थी। फिर भी हंसते हुए कहा- ‘मैं रंजीत जी की बात नहीं कर रहा था। मैं तो एक आम चलन की बात बता रहा हूं।’
एचआर के लोगों की समझ में Êयादा कुछ नहीं आ रहा था कि यहां क्या चल रहा है और यह भी कि रंजीत, आख़िर है कौन?
कुछ देर रुक कर रोली को सुनाते हुए सुनील जी ने एचआर हेड से पूछा- ‘अब?’ एचआर हेड ने सुनील से कहा कि इन्हें मेल द्वारा पत्र भेजा जाएगा। फिर उसने रोली को उस अख़बार को लगातार देखते रहने की सलाह दी, ताकि जब काम पर आना हो, तो अख़बार की नीतियों को समझने में Êयादा समय ख़र्च न हो। जब रोली जाने लगी, तो सुनील जी ने उससे कहा- ‘रंजीत जी से कहिएगा कि शाम को मिलें।’ रोली ने रंजीत सर को फोन कर दिया।
वह पूरे दिन भोपाल घूमती रही। एक छोटे-से दिन में जहां पहुंच सकती थी, गई। जहां नहीं पहुंच सकती थी, वहां मन ही मन गई। शाम को सर मिले। मिलते ही डांटने लगे। कहने लगे- ‘सुनील कह रहा था, नई नियुक्तियां, मंदी के कारण पांच-छह महीनों के लिए टाल दी हैं।’ वह झूठ बोल रहा था, पर हंसते हुए उसने एक बात कही कि रोली थोड़ी ‘एरोगेंट’ है।’ सुनील की हरेक बात का जवाब देना जरूरी है?
रोली को उसके पिछले दिनों की वे तमाम छोटी-छोटी हरक़तों की याद पर याद दिलाते रहे, जिससे साबित होता था कि रोली Êिाद्दी और अकड़ू है। रोली बहुत ग़ुस्से में थी- दो दिन पहले भी यही मंदी रही होगी, जब उसे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। एक बार रोली को ़ख्याल आया कि रंजीत सर को बता दे, किस बात का जवाब देते हुए उसने सुनील से कुछ कहा था, पर नहीं बताया, क्योंकि उसी समय हबीबगंज स्टेशन पर एक रेल खुली थी। रोली उसके डिब्बे गिन रही थी। उसने ग़ौर किया कि इधर कुछ रेल गाड़ियों में हरे रंग के डिब्बे भी होते हैं।










