Sunday, November 15, 2009 01:56 [IST]  

danik bhaskarदहशत भरी फ़िजा में क्या कहें क्या सुनें!

जाहिदा हिना

लंबे व़क्त से शायद ही ऐसा कोई दिन खाली जाता होगा कि पाकिस्तान में मौत का खेल न हुआ हो। बेशक़, इस व़क्त वहां जान-माल की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन बारूद, ख़ून और मौत की आग में जल रही जनता आख़िर कब तक घरों की चारदिवारी में क़ैद रह सकती है..




हिंदुस्तान, इंग्लैंड या अमेरिका से अगर किसी से बात होती है और वो हाल-अहवाल पूछता है, तो समझ में नहीं आता कि उससे क्या कहूं। हमारे लिए तो बारूद, ख़ून और मौत आम-सी बात हो गई है। पिछले ह़फ्ते की ही बात है। तबाह हाल मर्द अपने बच्चों और अपनी औरतों के टुकड़े पेशावर के मीना बाज़ार में चुन रहे थे। उन लोगों को सब्र आ गया, जिनके प्यारों की शिनाख़्त हो गई थी।



जाने वालों के चेहरे देख लिए जाएं, तो दिल को करार आ जाता है, लेकिन उनको उम्र भर सब्र नहीं आएगा, जिन्होंने चादर में बदन के न पहचाने जाने वाले टुकड़े देखे। दिल यूं कहां बहलता है, यही ़ख्याल चैन नहीं लेने देता कि जाने वाली अपने बेटे की उंगली थामकर अपने लिए मेहंदी और बेटी के लिए चूड़ियां ख़रीदने निकली थी, जिसने बेटे से पेशावरी चप्पल दिलाने का वादा किया था, वो शायद किसी अज़ीÊा के घर चली गई हो, या शायद वो इस हंगामे में बेहाल होकर बेटे को कलेजे से लगाकर दीवानावार किसी तरफ़ निकल गई हो और किसी लम्हे वापस आ जाए।



पेशावर के चंद दिनों बाद, जो लोग रावलपिंडी में बारूद का निशाना बने, उनमें से ज़्यादातर अपनी पेंशन लेने के लिए क़तार में लगे थे और कुछ के हाथों में फोन, गैस और बिजली के बिल थे। एक मोटरसाइकिल सवार आया और आठ किलो बारूद के परों पर बिठाकर उनको साथ ले गया।



कहा गया कि हलाक होने वालों में Êयादातर साठ बरस की उम्र से ऊपर के लोग थे। न होते तो पेंशन लेने क्यों गए होते और बिल भी आमतौर पर घर के बड़े-बूढ़े या फिर औरतें जमा करती हैं, लेकिन जन्नत में जाने वाले बेकरार श़ख्स को इससे क्या ग़र्ज। उसे और उस जैसे दूसरों को जन्नत में 72 हूरों के इनाम की ख़ुशख़बरी सुनाई गई है और इसीलिए ये लोग मौत बांटते फिर रहे हैं।



पेशावर और रावलपिंडी के ये वाक्यात हमें हैरान नहीं करते, ये हमारे लिए अब रोज़ की बात है। हर श़ख्स सहमा हुआ है। कुछ दिनों पहले तक स्कूलों के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था कि वहां दहशतगर्दी की कोई वारदात होगी। लेकिन अब न स्कूल महफ़ूÊा हैं न यूनिवर्सिटी। पढ़ने के लिए जाने वाले हवा की ज़द पर रखे हुए चिराग़ हो गए हैं, जिनके बुझने का डर उनकी मांओं को डिप्रेशन का मरीज बना चुका है।



बाप जो अपने जवान बेटों को देखकर ख़ुश होते थे, कि आने वाले दिनों में वो इनकी Êिाम्मेदारियां संभाल लेंगे। बुÊाुर्ग बाप अब हर लम्हा इस ख़ौफ़ से लरज़ते रहते हैं कि जिन बेटों को अपने कंधे पर बैठाकर मेलों की सैर कराई थी, अब उन्हें उनका जनाÊा न उठाना पड़े। हर गली में मौत का फे रा है और हर घर को ख़ौफ़ खाए जा रहा है कि इसके फ़र्श पर कहीं सफ़े मातम न बिछ जाए।




बात दूरदराज के शहरों से शुरू हुई थी और अब पेशावर, लाहौर, इस्लामाबाद सब ही बारूद के ढेर पर बैठे हुए हैं। हर तरफ़ बारूद की बरसात है, ख़ून की नदियां हैं। जिस तरह 1947 में लोग अपने भरे घरों को छोड़कर नई ज़मीनों की तरफ़ चल पड़े थे, उसी तरह स्वात और कई जगह से लोग अपने-अपने भरे घरों को छोड़कर तन पर पहने हुए कपड़ों में निकले।



ये वो हैं, जिनके घरों में अनाज के अंबार थे। ख़ुश्क मेवों के ढेर थे, फ़र्श पर बिछे गलीचे और दीवार से लगे हुए गाव-तकिए थे और फिर ये ही लोग एक व़क्त की रोटी के लिए क़तार में लगे थे। इस दरबदरी ने लोगों को जिस अज़ाब में मुब्तिला किया है, इसका अंदाÊा करना मुश्किल नहीं। इससे बड़ा अज़ाब उन घरानों पर नाज़िल हुआ, जिनके जवान बेटे ख़ुदा की राह में तलब किए गए और जब हुक्म की तामील न की गई, तो हथियारों के Êाोर पर उठा लिए गए। उनमें से कुछ आत्मघाती बने और कुछ जाने किस काम आए।



ज़ोहरा निगार जो हमारी मशहूर शायरा हैं, उन्होंने नौज़वान ख़ुदकश बम्बार के बारे में एक नज़्म लिखी है, जिसकी कुछ लाइनें इस तरह हैं- ये ख़बर आई कि उसका सर मिला/अधखुली एक आंख उसमें ख्वाब था उलझा हुआ/खून में लिथड़ा हुआ ख्वाब फ़िरदौसे-बरीं/ मंज़र हूरें, कुआंरी, दिलनशीं..। फ़हमीदा रियाज़ ने सूफ़ी और पश्तों के बेबदल शायर रहमान बाबा के मज़ार को बारूद से उड़ाने के सानहे (दुर्घटना) पर एक नÊम लिखी है, इस शुमारे में ये वाक्या भी लिखा गया है, जो हम अख़बारों में ख़बर के तौर पर पढ़ चुके हैं।



जिसके मुताबिक़ स्वात की एक मुक़ामी, रूहानी श़िख्सयत को अफ़राद ने क़त्ल करके द़फ्न कर दिया, तो उनके कंमाडर को तब भी तसल्ली नहीं हुई, लिहाज़ा उन्होंने फ़ैसला किया कि लाश को क़ब्र से निकालकर चंद दिन तक किसी पेड़ या बे से लटका दिया जाए, उसके बाद ही रहमान बाबा के मÊार पर हमला हुआ, जिसने हर श़ख्स को दहशतज़दा कर दिया।



दहशत की एक ऐसी फ़Êा में क्या कहें या क्या सुनें। उदास और बोझिल दिल के साथ कई ख़त मिले हैं, जिनके जवाब देना मुश्किल है। कई पाठक मेरे बारे में जानना चाहते हंै। पाठकों से निवेदन है कि मेरे बारे में जानने के लिए गूगल पर जाकर Êाहिदा हिना को सर्च करें। आप मेरे बारे में जान जाएंगे।

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