देश की उम्मीदों के प्रतीक बन गए हैं सचिन
सचिन तेंडुलकर ने अपना अंतरराष्ट्रीय कॅरियर बर्लिन की दीवार ढहने के करीब सप्ताह भर बाद शुरू किया था। बर्लिन की दीवार गिरना शीत युद्ध की समाप्ति और साम्यवाद के ढहने का संकेत था। उन्हीं दिनों 16 साल का लड़का इमरान खान, वसीम अकरम और वकार यूनुस के खिलाफ पहली बार बल्ला उठाता है।
बीते 20 सालों में दुनिया को कई नाटकीय परिवर्तनों से गुजरना पड़ा, लेकिन सचिन हमारी चेतना में मजबूती के साथ जमे हुए हैं। वे चकित करने वाली निरंतरता के साथ रन बनाते गए हैं, कीर्तिमान रचते गए हैं और देश के मनोबल को ऊंचा रखे हुए हैं।
ऐसे बहुत कम क्रिकेटर हैं, जिन्होंने इतनी लंबी पारी खेली है। दिमाग में कुछ गिने-चुने नाम आते हैं जैसे गावसकर ने 18 साल तक क्रिकेट खेला, रिचर्डस 17 साल, मियांदाद 19 साल और सोबर्स व ब्रेडमैन का क्रिकेट सफर 20-20 साल चला।
इस सूची में सचिन के भी शामिल होने से उनकी महानता अपने आप साबित हो जाती है। फिर भी यह पूरी कहानी नहीं है। क्रिकेट के इतिहास में अन्य किसी भी खिलाड़ी ने न तो इतने अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और न ही इतने रन बनाए व सैकड़े जमाए।
इस नजरिए से देखें तो सचिन सभी से आगे निकल चुके हैं। क्या यह उन्हें रिचर्डस या गावसकर अथवा लारा व पोंटिंग से बेहतर बल्लेबाज बना देता है? यह बहस विद्वानों व प्रशंसकों में समान रूप से दिलचस्पी जगाती आई है।
अलग-अलग पीढ़ियों से आने वाले खिलाड़ियों का आकलन करना और किसी निष्कर्ष पर पहुंचना असंभव है। यह कहना ठीक रहेगा कि तेंडुलकर का नाम सर्वकालिक महान दस क्रिकेटरों की सूची में सदैव रहेगा।
जो एक बल्लेबाज दूसरे तमाम बल्लेबाजों से बहुत ऊपर दिखाई देता है, वह बेशक डॉन ब्रेडमैन हैं और सचिन अकेले हैं जिनकी उनके साथ तुलना की जाती है। यही बात सचिन को खेल में बहुत ऊपर स्थापित कर देती है।
हालांकि ब्रेडमैन और सचिन के रिकॉर्डो में कोई बराबरी नहीं है। ब्रेडमैन ने 99.94 के औसत से टेस्ट मैचों में रन बनाए जिसकी बराबरी कर पाना किसी भी बल्लेबाज के लिए नामुमकिन है। तब भी दोनों में समानताएं हैं और वे केवल शारीरिक कद-काठी और रनों व रिकॉर्डो की भूख के मामले में ही नहीं हैं।
दोनों सिर्फ खिलाड़ी नहीं रहे, बल्कि अपने-अपने देशों के लिए उम्मीद, आकांक्षा और उत्कृष्टता के प्रतीक बन गए। ब्रेडमैन ने 1930 के दशक की महामंदी से उपजी निराशा और नाउम्मीदी को पीछे धकेल दिया और ऑस्ट्रेलिया को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी।
सचिन उस दौर में आए जब भारतीय राजनीति सारे देश में मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों से धधक रही थी और अपनी बल्लेबाजी से उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा और कामयाबी के लिए आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है।
ज्यादा बड़ी बात यह है कि ब्रेडमैन और सचिन तेंडुलकर दोनों ने किस जबरदस्त खूबी से अपने-अपने देश के लोगों और क्रिकेट जगत की आकांक्षाओं के दबावों का इतने लंबे समय तक सामना किया है। सचिन का इस देश के लिए क्या महत्व और मानी है, इसको बताने के लिए कई थीसिस भी कम होंगी।
लेकिन किसी लेखक-कवि ने इसे इन शब्दों में बखूबी कहा है, ‘बल्लेबाज मैदान में बल्लेबाजी के लिए अकेले जाते हैं, लेकिन तेंडुलकर नहीं। तेंडुलकर जब भी क्रीज की ओर कदम बढ़ाते हैं, एक संपूर्ण राष्ट्र उनके साथ जंग के मैदान की ओर कदमताल करता है। एक दीन-हीन राष्ट्र राहत के लिए याचना करता है, भारत होने की आजीवन व्यग्रता से मुक्ति की प्रार्थना करता है और अपने रक्षक की भावना के साथ एकाकार हो जाता है।’










