भाजपा को एक नया वाजपेयी चाहिए
अज सरे बालीने मन बर खेज़ ऐ नादां तबीब, दर्द मंदे इश्क रा दारू बजुज़ दीदार नीस्त।
(चल हट जा मेरे सिरहाने से ऐ डॉक्टर, मैं इश्क बीमार हूँ, सिवा दीदार कोई दवा नहीं)
अमीर खुसरो रहमतुल्लाह अलय ने ये पंक्तियां अपने पीर की जुदाई में कही थीं पर आप इन्हें आज की भाजपा पर बेबाक टिप्पणी कह सकते हैं। नेतृत्वविहीन, दिशाहीन और जघन्य कमजोरी से ग्रसित पार्टी को संजीवनी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के मुखिया मोहन भागवत ने कहा कि दवा-दारू चाहिए या कीमोथैरेपी, अपने इलाज के लिए बीमार स्वयं जिम्मेदार है। शुरुआत इससे हुई कि दिल्ली का कोई नेता अब पार्टी की बागडोर नहीं थामेगा। अभी अटकलें चल रही हैं और सबसे आगे नितिन गडकरी हैं। जी हां, कैंसर के इलाज के लिए गुलकंद की सलाह डॉक्टर भागवत ने दी है। भाजपा को जब भी बीमारियों ने सताया, उसने रामबाण का प्रयोग किया। आज भाजपा का हर छुटभैया नेता एलके आडवाणी को कोसते नहीं थकता, जो भाजपा को पोसते-पोसते बूढ़े हो गए। भावी प्रधानमंत्री का पद संभालते उम्र गुजर गई और पार्टी में कोई पद नहीं रहा। टायर नहीं हुए पर रिटायर होने पर मजबूर हैं क्योंकि युवा शक्ति का जमाना है। कांग्रेस के प्रधानमंत्री छरहरे जितने हों, उम्र में सिर्फ पांच साल बड़े आडवाणी से बस उन्नीस हैं। युवा होना एक मन:स्थिति है और इस लिहाज से भाजपा के मुकाबले उस से 95 साल बड़ी कांग्रेस जवान दिखती है।
भाजपा अपने लिए एक अदद राहुल गांधी को ढूंढने निकलती है तो उसे नितिन गडकरी मिलते हैं। दीवारों पर पोस्टर चिपकाने से लेकर महाराष्ट्र राज्य भाजपा में हर पद संभालने वाले गडकरी आजकल दिल्ली में अपनी कुर्सी तलाश रहे हैं, संघ की टिकट से लैस लुटियन की दिल्ली में पार्टी के मठाधीशों से स्वीकृति की दरकार लिए। पार्टी के वर्तमान नेता झंडेवालान में संघ के दफ्तर में हाजिरी बजा रहे हैं। कीमोथैरेपी करें या ऑपरेशन, इस पर विचार चल रहा है। गडकरी नामक गुलकंद से बीमार भाजपा में नई जान आएगी, इस का भरोसा किसी को नहीं। शिवसेना के पिछलग्गू होकर महाराष्ट्र के हालिया चुनाव में मुंह की खाए नेता अगर देशव्यापी नेतृत्व दें तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, मठाधीशों की ये दलील नाजायज नहीं लगती। खासकर तब जब राजनाथ के राज में सारी चमक मिट्टी में मिल गई हो।
सवाल है कि एक दल जिसने पांच साल सरकार का नेतृत्व किया है, उसे कौन सा लकवा मार गया कि नितिन गडकरी से बेहतर नेता नहीं मिल रहा। गडकरी में करिश्मा नहीं और उन्हें जनता तो क्या पार्टी के कार्यकर्ता तक नहीं जानते। नरेंद्र मोदी विकल्प हैं पर उनकी छवि उन्हें गुजरात के बाहर जाने से रोकेगी। गुजरात की पांच करोड़ जनता की सेवा का संकल्प उन्होंने यूं ही नहीं लिया है। विपक्ष का नेता कैबिनेट मंत्री के दर्जे का होता है और मोदी को कई देशों में वीसा नहीं मिलता। आने वाले राष्ट्रप्रमुख राजनाथ से हाथ मिलाते हैं। अरुण जेटली वाक्शक्ति के पहलवान हैं पर मंच पर आने की क्षमता नहीं। अत: नेपथ्य में ही रहेंगे। जसवंत सिंह को जिन्ना के जिन ने निगल लिया। सुषमा स्वराज की तुलना सोनिया से होगी तो पलड़ा हल्का होगा।
पर खेवैया चाहिए, नहीं तो डूबती नैया कौन बचाएगा? नेतृत्व के दिवालियेपन का नतीजा यह है कि जहां उभर रहे थे, वहां भी डगमग हो रहे हैं। अगर मजबूत नेता होता तो रेड्डी बंधु लोकप्रिय येद्दियुरप्पा को सरेआम रुला नहीं पाते। कर्नाटक का हालिया नाटक इस बीमारी का लक्षण मात्र है। पर नेतृत्व से भी ज्यादा जरूरी है, अपने पैरों पर खड़ा होना। संघ के पालने में बैठकर सत्ता के दुधमुंहे सपने पालने से जीवनी शक्ति नहीं आएगी। वाजपेयी संघ के रहते भी अपनी राजनीति स्वयं करते थे और यहां तक कि अल्पसंख्यकों तक में अपनी छवि के बल पर पैठ बनाने की क्षमता रखते थे। भाजपा को एक नया वाजपेयी चाहिए जो बोले तो लोग सुनें। चुनें या ना चुनें, उनकी मर्जी। संघ स्वयं अपनी जमीन खो रहा है क्योंकि उसकी विचारधारा प्राचीन हो गई है। नया भारत अब वापस सोने की चिड़िया नहीं होना चाहता। नया भारत सिलिकॉन का चिप बनकर ज्यादा खुश है। अगर नए भारत के साथ कदम दर कदम चलना है तो भाजपा को मरकर जिंदा होना पड़ेगा। नई पार्टी, नया संविधान फिर नेता स्वयं अवतरित होगा। नेता नियुक्त नहीं किये जाते, नेता हो जाते हैं। अमीर खुसरो की उन पंक्तियों को कव्वाल अजीज मियां संशोधित कर गाते थे। पहली फारसी की लाइन के बाद अपनी हिंदुस्तानी की लाइन लगाकर। वक्त आ गया है भाजपा संघ से अजीज मियां वाला वर्जन कहे।
अज सरे बालीने मन बर खेज ऐ नादां तबीब,
तू अच्छा कर नहीं सकता, मैं अच्छा हो नहीं सकता!











