छुटपन की यादें कैसी थीं, यह सवाल पूछते ही, हल्की-हल्की झुर्रियों के बीच मिचमिचाती आंखें जाने किन गलियों-मैदानों में खो जाती हैं। आम की मिठास और बेर के खट्टे-मीठे स्वाद जैसी यादों का सिलसिला चल पड़ता है। ढेर सारी दोस्तियां, कच्चे आंगन-पक्के मन, मनमौजी दौर, चूल्हे की रोटियों की खुशबू, खेलों में कच्ची रोटी की अहमियत..और पता नहीं क्या-क्या। आप भी साथ चलिए न, उन राहों पर जहां बचपन साइकिल के टायरों को डंडी से हांकता सरपट भागता था..
आज से पचास-साठ साल पहले का बचपन। अल्हड़ भोला, आडम्बरों से रहित, सीधा-सादा। हम बच्चे आधी-आधी रात तक लुक-छिप जाना खेलते थे। मिट्टी में नंगे पांव, न चोट लगती थी, न कभी बीमार होते थे। खुलकर स्वाभाविक हंसी हंसते थे। दुखों की दुनिया से अनजान, कोई झमेला नहीं, बस मेला ही मेला। आज भी वहीं मौजूद है वह नीम का पेड़, उसकी वह डाल, जिस पर पींग बढ़ाते जाते थे, नभ को छूने की होड़ में।
याद आता है कागज़ की किश्ती बनाकर बरसात के पानी में बहाना और ताली बजा-बजाकर उसके साथ दौड़ना। हम साथी हंसते-हंसाते, लड़ते-झगड़ते, मगर पल-भर में फिर एक हो जाते।
गर्मी के मौसम में घर के सदस्यों के सो जाने पर घर से निकलकर, सामने वाले इमली के पेड़ से कटारे तोड़ने जाना, कंचे खेलना, गिल्ली-डंडे के टुल लगाते हुए दूर तक निकल जाना, पतंग के पेंच लड़ाना, कबड्डी खेलना- सबकुछ कल जैसा लगता है। स्कूल के शिक्षकों का प्यार, घरवालों की डांट आज भी याद आती है। मन बचपन की यादों में खोकर रोमांचित हो उठता है।
मेरी आयु लगभग 73 साल है। आज फिर मेरा मन अपने बचपन के स्कूल में जाकर, टाट और डेस्कों पर बैठकर, पुराने शिक्षकों से पढ़ना चाहता है, उनका प्यार और डांट पाना चाहता है। मेरे भीतर का लड़का साथियों और सहपाठियों के साथ फुटबॉल और छल्ला खेलना चाहता है। तंदूर के अंदर जलाने वाली मुड़ी हुई लकड़ी से हॉकी बनाकर खेलना चाहता है। कटी पतंग के पीछे, दूसरे लड़कों के साथ वो काटा-वो काटा कहते, डोर लूटने के लिए भागना चाहता है।विद्यालय की प्रार्थना सभा में पंक्ति में खड़ा होकर प्रार्थना करने को उतावला हो रहा है मेरा मन।
फिर से रस्सी कूदना चाहता है।
फिर खेलना चाहता है
‘कोकला छिपाकी जुम्मे रात आई,
जे राजा-रानी तेरी नगरी में चोर।
बांध लो।
किसके साथ?
रस्सी के साथ।’
क्या लौटकर आ सकता है मेरा बचपन?










