नीली साइकिल
दोनों साइकिलें बहुत धीमी चल रही थीं। एकाध मिनिट में कोई पैर आकर पैडल को धक्का मार जाता, इसीलिए आज दोनों साइकिलों के पास खूब वक्त था। एक घंटे में साइकिलों को डेढ़ किलोमीटर तय करना था। पांच मिनिट में दो किलोमीटर तय करना •यादा आसान है पर एक घंटे में डेढ़ किलोमीटर तय करना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन दोनों साइकिलों को मज़ा बहुत आ रहा था। वे आसपास से निकलती हुई हांफती खटर-पटर करती साइकिलों को देखती जातीं और इस बात से खुश हो जातीं कि वे आराम से चल सकती हैं।
उनके मालिक भी तो आज कितने खुश थे। एक मालिक का नाम था- जतिन और एक का अर्शी। दोनों शा.उ.मा.वि. नाम के एक स्कूल में आठवीं में पढ़ते हैं। साइकिलें स्कूल के बाहर ही खड़ी रहती थीं। इसलिए उन्हें बस स्कूल के बाहर की बातें ही पता थीं।
सुबह होती। ‘जत्तू उठ, जत्तू उठ, आठ बज गए।’ रोज़ घर के अंदर से ऐसी आवाज़ें घर के बाहर आती थीं। वक्त निकलता चला जाता। बड़ी मान-मनौव्वल के बाद जत्तू अपना बिस्तर छोड़ता। स्कूल जाने के थोड़े पहले वह एक कपड़ा लेकर आता और साइकिल को ठीक से पोंछता-झाड़ता। कभी-कभी मम्मी की सिलाई मशीन का तेल चेन में डाल देता।
तेल डालने के बाद वह स्टैंड पर खड़ी साइकिल को कुछ पैडल मार देता। इससे कांटों का तेल समूची चेन पर लग जाता होगा। जैसे ही उसका ये काम खत्म होता, वो तीन बार घंटियां बजाता। साइकिल को अक्सर लगता कि वो घंटी बजाकर उसे बता रहा है कि काम पूरा हो गया है पर क्या सचमुच जत्तू साइकिल को यह बताने के लिए घंटी बजाता था?
एक दिन जत्तू ने साइकिल साफ की। तेल दिया और नहाने चला गया। साइकिल को लगा कि आज वो घंटी बजाना भूल गया है। साइकिल ने उसके जाते ही खुद ही अपनी घंटी बजा दी। जत्तू तौलिया लपेटे झट से बाहर आया।
उसने साइकिल की तरफ देखा। वहां कोई नहीं था। उसने इधर-उधर देखा और फिर खुद के सिर पर चपत मारी और हंसता हुआ फिर से नहाने चला गया।
उस दिन नीली साइकिल रास्ते में वहां नहीं मिली, जहां वो रोज़ मिल जाती है। कभी अगर वह न मिलती, तो जत्तू साइकिल को स्टैंड पर खड़ी कर देता। बेवजह पैडल चलाता। आगे देखता, पीछे देखता। कभी ब्रेक लगाता कभी उल्टे पैडल मारता। उसका ऐसा बर्ताव साइकिल को समझ में नहीं आता था। वह यह सब समझने की कोशिश कर रही होती थी कि तभी नीली साइकिल आती दिख जाती और जत्तू की साइकिल ठीक हो जाती। जत्तू झट से तेज़-तेज़ साइकिल चलाना शुरू कर देता।
पीछे से घंटी की आवाज़ आती रहती। उस दिन दोनों साइकिलों के मालिक रास्ते भर चुप रहते। दोनों साइकिलें भी स्टैंड पर अलग-अलग जगह खड़ी रहतीं। पर, आज तो देखो दोनों चुप होने का नाम नहीं ले रहे हैं। ‘तूने तो सब पढ़ लिया अर्शी, मेरा क्या होगा? मैंने तो बस शुरू का एक पन्ना पढ़ा है।’ जत्तू कह रहा था। ‘क्यों डर रहा है, कोई भी तो पढ़कर नहीं आता। तू कोई अकेला तो होगा नहीं। सब पर डांट पड़ेगी। सब को डांट पड़ती है तो डांट •यादा नहीं लगती।’ अर्शी ने समझाते हुए कहा।
‘खुद करें, तो कोई बात नहीं, डांटे या मारें क्या फर्क पड़ता है। पर अपने ही दोस्तों से पिटवाएं, यह क्या बात हुई? उस दिन मुझे कम्मू को मारना पड़ा। मैं अभी तक उससे बात नहीं कर पाता हूं।’ जत्तू बोला। ‘आज तू मुझसे छड़ी खाएगा।’ अर्शी बोली। जत्तू बोला, ‘अकेले में मार लेगी, तो चलेगा पर कक्षा में सबके सामने अच्छा नहीं लगता।’ ‘कहता तो तू सही है।’ अर्शी बोली। ‘टीचर यदि सज़ा देना ही चाहते हैं, तो खुद दे। बच्चों को आपस में क्यों लड़वाते हैं?’ दोनों मालिक बातों में ऐसे लगे कि पैडल मारना ही भूल गए।
साइकिलें कहना चाहती थीं कि स्कूल पहुंचने में देर हो रही है पर कैसे कहतीं और उस दिन स्कूल पहुंचने में सचमुच दस मिनिट की देरी हो गई थी। जत्तू बहुत डर रहा था। एक तो उसने अकबर वाला पाठ ठीक से नहीं पढ़ा था और ऊपर से वह लेट पहुंच रहा था। उसने अर्शी से कहा-‘तुम पहले जाओ।’ अर्शी ने कहा- ‘नहीं, साथ चलते हैं। आधी-आधी मार या डांट खा लेंगे। पहले जाने या बाद में जाने से पूरी डांट खानी पड़ेगी।’ दोनों साथ पहुंचे। तब तक मास्टर जी पढ़ाना शुरू कर चुके थे। सात बच्चे खड़े थे। ‘चले आओ, चले आओ..’ वह चबाते हुए बोल बोल रहे थे। वह अक्सर शब्दों को ऐसे ही चबाते हुए ही तो बोलते हैं। ‘अकबर ने दीन-ए-इलाही क्यों चलाया था? अर्शी बताओ!’ वे कड़ककर बोले। जत्तू ने राहत की सांस ली। दीन-ए-इलाही तो दूसरे पन्ने पर था।
उसने उस पाठ का सिर्फ पहला पन्ना ही पढ़ा था। वह ठीक से इस बात पर खुश भी नहीं हो पाया था कि मास्टर जी ने कहा-‘नहीं अर्शी नहीं, तुम बताओ जत्तू।’ ‘सर मुझे नहीं मालूम।’ जत्तू ने धीरे से कहा। मास्टर जी छड़ी लेकर अर्शी के पास आए। अर्शी को छड़ी पकड़ाते हुए बोले- ‘पहले तुम उत्तर पूरा कहा और फिर दो मज़ेदार छड़ी इस गधे को रसीद कर दो।’ अर्शी ने किसी तरह छड़ी पकड़ ली। उसका सिर लटका हुआ था। मास्टर जी कह रहे थे-‘हां, तुम सही बता रही थीं..आगे बताओ।’ अर्शी को दीन-ए-इलाही सूझ ही नहीं रहा था। याद करने की सारी कोशिशें बेकार हो रही थीं। मास्टर जी ने वही सवाल विकास से पूछा। विकास ने सही उत्तर दिया। मास्टर जी ने उसे सज़ा देने का हक दे दिया था। दो छड़ियां अर्शी के हथेलियों पर पड़ीं और दो जत्तू की हथेलियों पर।
पर साइकिलें कुछ और कहती हैं। स्टैंड के पास जाकर दोनों ने अपनी हथेलियां देखीं। जत्तू की हथेलियों पर छड़ियों के मोटे निशान उभर आए थे। ‘मुझे तो उसने धीमे से मारीं। देख, कितने पतले निशान हैं।’ अर्शी अपनी हथेलियां जत्तू को दिखाते हुए बोली- ‘जत्तू चल छड़ियां बदल लें।’ अर्शी हंसते हुए बोली और उसने अपनी दोनों हथेलियां अर्शी की हथेलियों पर उलट दीं।
सुशील शुक्ल भोपाल, मध्यप्रदेश










