Sunday, November 15, 2009 19:08 [IST]  

danik bhaskarधूल का बोझ

poetry

हटती ही नहीं



मन पर बिछी



धूल की परतें,



कोशिश कर लो जितनी भी।



जब तक झाड़ो कुछ धूल,



आ जाते हैं तब तक,



और-और धूल के कण।



बन जाती है



नई-नई परतें धूल की,



बोझ तले जिनके



दबा रहता है अक्सर मन



और बन जाता है आख़िर



खुद भी एक हिस्सा



धूल का ही।।



हरीश कुमार ‘अमित’ गुड़गांव, हरियाणा

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