हटती ही नहीं
मन पर बिछी
धूल की परतें,
कोशिश कर लो जितनी भी।
जब तक झाड़ो कुछ धूल,
आ जाते हैं तब तक,
और-और धूल के कण।
बन जाती है
नई-नई परतें धूल की,
बोझ तले जिनके
दबा रहता है अक्सर मन
और बन जाता है आख़िर
खुद भी एक हिस्सा
धूल का ही।।
हरीश कुमार ‘अमित’ गुड़गांव, हरियाणा