गुज़रे बचपन की यादें कितनी सुहानी
गुज़रे बचपन की यादें कितनी सुहानी होती हैं, यह आपके अनुभवों से पता चला। आपकी हर याद, जो बचपन से जुड़ी थी, अनोखी थी। लगा जैसे फिर वह बचपना, फिर वही छुटपन लौट आया। कुछ ऐसे ही अनुभवों को हम प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि फिर एक बार आंधियों से अमियां चुराएं, चोट के निशां छुपाएं और बाबूजी या बड़े भैया के हाथ से मार खाएं। आप भी पढिए-
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काफी हुआ ‘शोर’
बचपन की बात हो, तो 35 साल पुरानी एक घटना याद आती है। मैं अपनी दादा-दादी की लाड़ली थी। दादी के पास ही सोना, खेलना होता था और मैं अपनी बचत के रुपए-पैसे भी उन्हीं को देती थी। हां, जब कुछ नई चीज़ मंगवानी होती थी, तो दादाजी से कहती थीं, क्योंकि वे पिताजी से कहकर तुरंत मंगवा देते थे। उनके स्नेहमयी लाड़-प्यार और डांट-फटकार के दिन आज भी स्मृति के खूबसूरत पन्नों में दर्ज हैं। उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
एक बार मैं और मेरी बड़ी बहन घर वालों को बिना बताए अपने स्कूल की अध्यापिकाओं के साथ ‘शोर’ फिल्म देखने चले गए। जब घर वापस आए तो देखा, दादाजी आगंन में ही छड़ी लिए बैठे हैं। कांपते-कांपते जैसे ही घर में दाखिल हुए, तो दादाजी ने देख लिया और हम दोनों को खूब पिटाई लगाई। वो तो दादीमां आ गई बीच में और हमें बचा लिया, वरना बहुत मार पड़ती। हम दोनों बहनों ने माफी मांगी और कसम खाई कि घर में बिना बताए अब कभी भी बाहर नहीं जाएंगे। वह फिल्म मुझे आज भी याद है।
दादा-दादी के सिखाए संस्कार आज भी मेरी कभी न खत्म होने वाली पूंजी की तरह हैं। उनके आशीष से बचपन, बचपन बन सका। उनकी डांट ने काफी बातें सिखाई, जो आज भी मेरे साथ है। उस समय उनकी बातें और सीख बुरी लगती थीं, लेकिन आज महसूस होता है कि उनके बिना मेरा बचपन अधूरा ही रहता। उनकी सिखाई बातें तो याद हैं ही, अपनी कारगुज़ारियों को याद कर आज भी हंसी आ जाती है।
संतोष गर्ग हिसार, हरियाणा
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नहीं बनना खतरों का खिलाड़ी!
बात उस समय की है जब मैं सातवीं क क्षा में पढ़ता था। हमारा गांव इंदौर शहर से 20 किलोमीटर दूर है। हमारे गांव में सभी के घर अक्सर अपने-अपने खेतों के नज़दीक बनाए जाते थे। हमारा घर भी खेत के पास ही था। हमारे परिवार के साथ चाचाजी और उनका परिवार भी रहता था। इस कारण घर में हम बच्चों की संख्या भी अधिक थी। बड़ा होने की वज़ह से मैं सभी बच्चों का नेता था। मैं कहीं भी जाता, सभी बच्चे मेरे पीछे हो लेते।
एक दिन हम सब भाई-बहन नदी पर गए, जो घर से पास ही थी। मैं नदी में उतरकर पत्थरों को पलट-पलटकर देखता या फिर किनारे पर बने केकड़ों के बिलों में हाथ डालकर केकड़ा ढूंढता था। जब कोई केकड़ा पकड़ में आ जाता, तो सभी मेरी बहादुरी का लोहा मानते। केकड़े को बाहर लाकर कभी मैं उससे सभी को डराता, तो कभी-कभी उन्हें एक डिब्बे में एकत्र कर लेता और उन्हें लाकर अपने कुएं में डाल देता। एक बार की घटना याद है। मैंने केकड़ा पकड़ने के लिए एक बिल में हाथ डाला, तो पानी का सांप निकल आया। जब मैंने उसे बाहर निकाला, तो मेरे होश उड़ गए। मैंने तुरंत हाथ झटक लिया, जिससे वह सांप फिर नदी में चला गया। उस दिन मेरी हालत देखने लायक थी। मैंने उसी दिन से बिल में हाथ डालना छोड़ दिया।
ऐसी ही एक और घटना याद है। घर के पास ही एक बगीचे में अमरूद का पेड़ था। उसके चारों ओर कंटीले तारों की फेंसिंग भी की गई थी। हम सभी बच्चे बगीचे के पिछले हिस्से से दाखिल होते थे। फिर मैं फेंसिंग को पार कर अंदर उतर जाता था। एक दिन यूं ही फेंसिंग पर चढ़ते हुए मेरा पैर फिसल गया और मेरी हथेली कटीले तारों से लहूलुहान हो गई। काफी गहरा घाव हो गया था। काफी खून बह रहा था और मैं रोने की बजाय हाथ की मुट्ठी बांधकर घर आ गया। मुझे गहरी चोट लगी है, यह किसी ने नहीं देखा और न ही मैंने किसी को बताया। घर में अंदर आते वक्त चाचा की बड़ी लड़की ने मेरा लहूलुहान हाथ देख लिया और तुरंत जाकर पिताजी से बोल आई। पिताजी ने देखते ही पूरी घटना पूछी, तो डर के मारे मैंने भी उन्हें सब सच-सच बता दिया।
पिताजी ने अपना जूता उठाया और सबके सामने मुझे धो दिया। बहुत मार पड़ी थी उस दिन। उसी दिन तय कर लिया कि अब नहीं बनना मुझे खतरों का खिलाड़ी। पिताजी पिटाई के बाद मुझे अस्पताल ले गए और पट्टी कराई। घर आया, तो सभी मुझे चिढ़ाने लगे, ‘आज तो खतरों का खिलाड़ी जूते से पिटा।’ उस समय तो सभी पर बहुत गुस्सा आता था, लेकिन आज हंसी आती है। बीते बचपन की यादें ताज़ा करने के लिए मैं आज भी बच्चों के साथ बच्च बन जाता हूं, ताकि अपना बचपन याद रख सकूं।
पीयूष मोहता महू, मध्यप्रदेश
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कितनी ऊंचाई, कैसी दीवार?
बचपन याद करते हैं, तो सभी को मासूमियत, शरारत और मस्ती भरे खेलों की याद आ ही जाती हैं। बात तब की है, जब हम नारायणगढ़ में रहते थे। हमारे घर के पास ही आमों का बाग था। एक दिन मेरी सहेलियों ने आम तोड़ने का फैसला किया। हम लोग जैसे ही आम तोड़कर लौटने लगे, तभी माली आ गया। मैं डर के मारे इतनी बुरी तरह भागी कि बगीचे की सात फीट ऊंची दीवार से छलांग लगा दी। जल्दबाजी में कूदने के कारण मुझे चोट आई। यह सुनकर मेरे घरवाले लाठी लेकर आ गए। उन्होंने सोचा कि शायद कोई सांप निकल आया है। हमारे घर के आसपास अधिक हरियाली होने की वजह से अक्सर सांप निकल आया करते थे। परंतु जब वास्तविकता का पता चला, तो खूब खिंचाई हुई। गुज़रा बचपन ऐसी ही अनगिनत यादों से अमीर है। लेकिन आज तो जैसे यह सब छिन-सा गया हो।
शालिनी दीवान पंचकुला, हरियाणा
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निशान आज भी है!
बचपन सभी के लिए यादगार होता है। कुछ खट्टी-मीठी यादें ऐसी होती हैं, जो जीवनर्पयत भुलाए नहीं भूलता। ऐसी ही एक याद मेरे साथ आज भी है, जिसका निशान मेरी नाक पर ताज़ा है। जब मैं कोई 6 साल का था। स्कूल में पढ़ता तो था पर उस दिन छुट्टी का दिन था।
सभी दोस्त नदी किनारे वाले मैदान पर मस्ती कर रहे थे। जब मैं वहां पहुंचा, देखा कि किसी बात पर शर्त लगाई जा रही है, लेकिन कोई भी चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार न था।
मेरी उत्सुकता बढ़ गई। जब मैंने पूछा, तो बताया गया कि जो कोई भी घोड़ी का दूध पीता है, वह बेहद बलवान हो जाता है। वह घोड़े के तरह तेज़ दौड़ सकता है और कभी थकता भी नहीं है। मुझे लगा, यह तो आसान है और मैं कर भी सकता हूं। यह सोचकर कि घोड़ी का दूध पीकर मैं भी सबसे ज्यादा ताकतवर बन जाऊंगा, खुश हो रहा था। मैंने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली। मैंने भी आव देखा न ताव, इस चुनौती को पूरा करने अस्तबल में चला गया। आंख खुली तो खुद को घर के बिस्तर पर सभी से घिरा पाया।
पता चला कि घोड़ी ने ऐसी ज़ोरदार लात मारी कि मेरी नाक पर पट्टी बंधी है और शर्ट खून से रंगी हुई है। खुद की करनी पर हंसी भी आ रही थी और शर्म भी। घर के बड़े-बुज़ुर्ग मां-बाबूजी को उलाहना दे रहे थे, ‘शुक्र मनाओ, शेरनी का दूध पीने की शर्त नहीं लगाई, वरना भगवान जाने क्या होता?’
इस घटना को कई बरस बीत गए लेकिन नाक पर घोड़ी की लात से लगी चोट का निशान आज भी जैसे मुझे चिढ़ाता है और याद दिलाता है वह बचपना, जो मैंने किया था। इस निशान को देखकर आज भी मुझे हंसी आ ही जाती है। वह बचपना आज भी मूर्खतापूर्ण नहीं लगता।
एन.पी. कोरी छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश
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नहीं भूलता वो तमाचा..
बात उन दिनों की है, जब मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। मेरे बाबूजी को पान खाने का बहुत शौक था। सप्ताह के बाज़ार से पान ज़रूर आते थे। एक दिन घर में पान नहीं थे और ठीक से याद तो नहीं, पर मां ने चिल्लर पैसे देकर पास के पान ठेले पर भेजा था। पान वाले के पास पहुंचकर मैंने उससे कहा- ‘भैया चवन्नी के पान दे दो,’ पानवाला पान लगाने में व्यस्त था। मैंने दो-तीन बार फिर अपनी बात कही, लेकिन फिर उसने अनसुना कर दिया। तभी मेरी नज़र पास ही में लगे आइने पर गई। मैं उसमें अपना प्रतिबिंब देखने लगी। गोल-मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें, ऊपर की ओर कसकर बंधी हुई दो चोटियां। बड़े ध्यान से अपने आपको मैं आइने में निहारने लगी। शायद, इतना बड़ा आइना पहले कभी देखा न था। पानवाले ने पान दिया या नहीं, मुझे घर भी जाना है, ये सब बातें तो जैसे मैं भूल ही गई। कभी बाईं चोटी को ऊपर करके देखती, कभी दाईं, तो कभी उसमें अपने दांत देखती। दीन-दुनिया से बेखबर पूरी तल्लीनता से मैं उस शीशे में खुद को निहारने में मस्त थी, कि अचानक मेरे प्रतिबिंब के पीछे बड़े भैया का प्रतिबिंब दिखाई दिया और तभी उनका जोरदार थप्पड़ सिर पर पड़ा। पानवाले से पान लिया या नहीं, ये तो याद नहीं लेकिन घर आकर खूब डांट पड़ी। मां ने भया को मुझे देखने भेजा था कि देखकर आ, कब से पान लेने गई है। आज इतने सालों बाद भी उस घटना को याद करती हूं तो लगता है कि बचपन भी कितना मस्ती भरा होता है। जिसमें धुन लग जाए, उसी में खो जाता है, लेकिन हां बड़े भैया के उस झापड़ को भी भूलना आसान नहीं है, जिसके कारण दोबारा कभी मेरी दुकान पर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
जी. ठाकुर पांढुर्णा, मध्यप्रदेश
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छुपा-छुपी का खेल
बचपन में जब हम छुपा-छिपी खेलते थे, तो पड़ोसियों के घर के अंदर जाकर छुप जाते थे। ये सारी बातें, आज मेरे बेटे को हैरान कर देती हैं कि किसी के घर के अंदर जाकर मस्ती कैसे की जा सकती है?
हमारा बचपन तो ऐसा ही था। चाहे किसी के मेहमान आए हुए हों, हमें कोई परवाह नहीं। आस-पड़ोस के सारे बच्चे इकट्ठे खेलते थे। रिश्तों में इतना अपनापन था कि सारे मोहल्ले में कोई आंटी नहीं, हां ताई, चाची, बुआ, ये संबोधन ज़रूर थे रिश्तों के।
सिदक भुल्लर चंडीगढ़
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वो रंग-बिरंगा बचपन
बचपन बहुत रंग-बिरंगा था हमारा। स्कूल से आए, थोड़ा पढ़े, फिर चले साथियों के साथ। समय के अनुसार कभी बेर खाने, कभी इमली खाने, कभी खेत में तीवरा चना खाने तो कभी सिला-सिलाने (धान की कटाई के समय गिरे धान को उठाना)। हमारे गांव में बहुत सारे तालाब हैं, हम सहेलियां हर दिन अलग-अलग तालाब में नहाने जाती थीं। बाद में भले ही देर से आने के कारण अम्मा डांटे, कोई फर्क नहीं पड़ता था। कार्तिक महीने में भोर के अंधेरे में नहाने चले जाते और वहां दीपदान की पूजा करके ही वापस आते। इसके बाद फूल तोड़ने जाते। आकर उसे गिनना होता और सब मंदिरों में चढ़ाकर आना, हमारा बचपन था।
सब बच्चों के बीच इस बात की प्रतियोगिता रहती कि किसने ज्यादा फूल चढ़ाए और जो ज्यादा फूल अर्पण करता उसका बड़ा रौब रहता। इन सबके बाद खुशी-खशी स्कूल जाते। तब मां-पिताजी भी पढ़ाई के लिए इतना दबाव नहीं डालते थे। उन दिनों हम लोग चालगोटी (कसाड़ी), कसाड़ी, गिल्ली-डंडा, बिल्लस खेला करते थे। वे दिन हमारे सूरजमुखी के फूल की तरह प्रसन्नता के चारों ओर चक्कर लगाने के दिन थे। वे दिन खुले नीले आकाश में सफेद बादलों की तरह गुÊार गए।
पूनम यादव भिलाई, छत्तीसगढ़
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निशान आज भी है!
बचपन सभी के लिए यादगार होता है। कुछ खट्टी-मीठी यादें ऐसी होती हैं, जो जीवनर्पयत भुलाए नहीं भूलता। ऐसी ही एक याद मेरे साथ आज भी है, जिसका निशान मेरी नाक पर ताज़ा है। जब मैं कोई 6 साल का था। स्कूल में पढ़ता तो था पर उस दिन छुट्टी का दिन था।
सभी दोस्त नदी किनारे वाले मैदान पर मस्ती कर रहे थे। जब मैं वहां पहुंचा, देखा कि किसी बात पर शर्त लगाई जा रही है, लेकिन कोई भी चुनौती स्वीकार करने के लिए तैयार न था।
मेरी उत्सुकता बढ़ गई। जब मैंने पूछा, तो बताया गया कि जो कोई भी घोड़ी का दूध पीता है, वह बेहद बलवान हो जाता है। वह घोड़े के तरह तेज़ दौड़ सकता है और कभी थकता भी नहीं है। मुझे लगा, यह तो आसान है और मैं कर भी सकता हूं। यह सोचकर कि घोड़ी का दूध पीकर मैं भी सबसे ज्यादा ताकतवर बन जाऊंगा, खुश हो रहा था। मैंने तुरंत चुनौती स्वीकार कर ली। मैंने भी आव देखा न ताव, इस चुनौती को पूरा करने अस्तबल में चला गया। आंख खुली तो खुद को घर के बिस्तर पर सभी से घिरा पाया।
पता चला कि घोड़ी ने ऐसी ज़ोरदार लात मारी कि मेरी नाक पर पट्टी बंधी है और शर्ट खून से रंगी हुई है। खुद की करनी पर हंसी भी आ रही थी और शर्म भी। घर के बड़े-बुज़ुर्ग मां-बाबूजी को उलाहना दे रहे थे, ‘शुक्र मनाओ, शेरनी का दूध पीने की शर्त नहीं लगाई, वरना भगवान जाने क्या होता?’
इस घटना को कई बरस बीत गए लेकिन नाक पर घोड़ी की लात से लगी चोट का निशान आज भी जैसे मुझे चिढ़ाता है और याद दिलाता है वह बचपना, जो मैंने किया था। इस निशान को देखकर आज भी मुझे हंसी आ ही जाती है। वह बचपना आज भी मूर्खतापूर्ण नहीं लगता।
एन.पी. कोरी छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश



