दुश्मन से दोस्त फिर दोस्त से दुश्मन
समाजवादी पार्टी में इन दिनों चल रही उथल-पुथल उत्तरप्रदेश के बाहर भी काफी रोचक दिखती है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से अचानक फिर दूर हो चले हैं। यहां तक कि दोनों एक-दूसरे पर खुलेआम आरोप लगा रहे हैं। दोनों के झगड़ों के चलते कल्याण सिंह के बेटे राजबीर ने सपा के महासचिव पद से त्यागपत्र दे दिया है और पार्टी से भी अलग हो गए हैं।
मुलायम और कल्याण दोनों देश के सबसे बड़े और राजनीतिक-सामाजिक रूप से जटिल प्रदेश के मुखिया रहे हैं। दोनों का कद और प्रभाव एक जमाने में बड़ा था और दोनों नेता काफी महत्वाकांक्षी रहे हैं। वर्ष 1992 में जब बाबरी ढांचा हिंदूवादियों ने गिराया था, तब कल्याण मुख्यमंत्री थे और उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी थी। मुलायम उस समय कल्याण सिंह के भयंकर विरोधी थे।
मुलायम के वोट बैंक में मुस्लिम समुदाय का बड़ा समर्थन रहा है। इसी कारण मुलायम और कल्याण कभी एक साथ दिखेंगे, ऐसा नहीं लगा था। पर राजनीति में सब संभव है और ऐसा हुआ भी। लेकिन कुछ दिनों की राजनीतिक दोस्ती के बाद कल्याण शायद समझ गए हैं कि सपा उनके लिए ठीक पार्टी नहीं है। वे पुन: भाजपा में जाने की बातें कर रहे हैं।
समाजवादी पार्टी की दिक्कत यह है कि वह राममनोहर लोहिया जी के नाम पर राजनीति करती है, पर लोहिया जी की एक बात या सिद्धांत ऐसा नहीं होगा जिस पर मुलायम सिंह (और अमर सिंह) चलते हों। समाजवादी पार्टी ने जिस तरह राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और अच्छी राजनीति के मान्य सिद्धांतों को तिलांजलि दी है, शायद ही किसी अन्य पार्टी ने ऐसा किया हो।
उधर, कल्याण भी पहले राम भक्त थे, फिर सपा से दोस्ती कर अडवानी और हिंदूवादी विचारधारा को कोसने लगे और अब फिर घूम-फिर कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बातें कर रहे हैं। दोनों नेताओं की जमीनें उत्तरप्रदेश में खिसक रही हैं। जनता वैसे भी इन नेताओं के कारनामों से त्रस्त रहती है, पर अन्य उपाय न होने से इनमें से किसी न किसी को वोट देना उसकी मजबूरी है।
पिछले आम चुनावों में और फिर अब उपचुनावों में सपा को उसकी हैसियत भी जनता ने दिखाई है। आशा करनी चाहिए कि दलबदलुओं और बार-बार अपनी राजनीतिक मुद्राओं को अपने फायदों के लिए बदलने वाले नेताओं को जनता सत्ता से दूर ही रखेगी।










