Monday, November 16, 2009 01:33 [IST]  

danik bhaskarजो करें सौ फीसदी करें

Bhaskar News

indoreइंदौर. रविवार को इंदौर आए प्रसिद्ध कमेंट्रेटर हर्षा भोगले के व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलू सामने आए। इंडस वर्ल्ड स्कूल और दैनिक भास्कर की पहल पर प्रमुख स्कूलों के बच्चों से रूबरू हुए हर्षा ने सपनों को सच करने का रास्ता दिखाया।



जो करें सौ फीसदी करें, इतने रन बनाएं कि आपके लिए उपलब्धियों का दरवाजा कभी बंद न हो, जैसे सूत्र वाक्यों से उन्होंने बच्चों का दिल जीत लिया। जब हर्षा भास्कर कार्यालय पहुंचे तो शहर के प्रमुख स्कूलों के बच्चों ने प्यारी मुस्कान के साथ बुके देते हुए उनका स्वागत किया।



हर्षा इस बात से अंजान थे कि बच्चों की यह टीम उन्हें क्रिकेट के मैदान से हटकर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देगी। कभी उनकी हॉबी जानने की उत्सुकता तो कभी पढ़ाई के महत्व को टटोलने की जिज्ञासा को हर्षा ने बखूबी शांत किया।



पहला ही सवाल यह था कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आए, हर्षा ने मुस्कुराते हुए कहा मैं फन के लिए कमेंट्री में आया। तुरंत नया सवाल आया आपने फन के लिए हॉबी को प्रोफेशन बनाया और अपने दिल की आवाज सुनी नई पीढ़ी को क्या सीख देंगे? हर्षा ने कहा दिल की आवाज जरूर सुनो लेकिन दूसरा रास्ता भी तैयार रखो, जैसा मैंने किया था।



पहली बार रेडियो पर एक मिनट और १क् सेकंड की कमेंट्री की तो मेरा गला सूख गया था। बच्चों का अगला सवाल था कमेंट्री की प्रेरणा किससे मिली? हर्षा ने कहा मुझे रेडियो पर बिनाका गीत माला में अमीन सयानी को सुनता था तो कार्यक्रम का हिस्सा बनने की इच्छा होती थी। उन्होंने मुझे इंस्पायर किया।



एक बच्चे ने पूछा क्या कमेंट्रेटर बनने के बाद आपको यह अहसास होता है कि आईआईएम की पढ़ाई पर समय बर्बाद किया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कभी नहीं मुझे आईआईएम की पढ़ाई से आत्मविश्वास मिला जो आज मेरी प्रस्तुति को बेहतर बनाता है। मौके पर दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक अवनीश जैन, वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र जोशी, इंडस वर्ल्ड स्कूल के चेयरमैन सुजीत भट्टाचार्य, प्रिंसिपल स्मिता राठौर भी मौजूद थीं।



आप जो कर रहे हैं वह बेस्ट है



हर्षा ने कहा आप जो भी काम करें उसके प्रति डर या दु:ख न रखें। जब आप अपने काम को बेस्ट मानेंगे तभी उसे एंजॉय कर पाएंगे और संतुष्ट रहेंगे।



अच्छा लगता है सोना



आपकी दूसरी हॉबी क्या है? इसके जवाब में हर्षा ने बेबाक जवाब दिया सोना..फिर कहा मैं दो दिन से सोया नहीं शायद इसलिए यह कह रहा हूं। वैसे मुझे पढ़ना पसंद था जो अब मैं कर नहीं पाता।



सिर्फ क्रिकेट



उन्होंने कहा 1997-98 में सचिन से इंटरव्यू के लिए समय मांगने गया लेकिन मैच से एक दिन पहले उन्होंने इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया। बोले मैच के एक दिन पहले मैं केवल क्रिकेट पर ध्यान कें्रद्रित करता हूं।



खोने के लिए कुछ नहीं



बड़े शहरों की अपेक्षा छोटे शहरों से क्रिकेट प्रतिभा ज्यादा आ रही हैं। ट्रेनिंग की सुविधा भी बढ़ी है। बड़े शहरों में लोगों को घर से स्टेडियम तक आने-जाने में 2 घंटे लग जाते हैं। छोटे शहर में खिलाड़ी प्रैक्टिस पर ज्यादा समय दे पाते हैं। गरीब परिवार से आ रही प्रतिभाओं के पास खोने के लिए कुछ नहीं है इसलिए बिना डर खेलते हैं।



दूर करें 10वीं का डर



उन्होंने कहा बच्चों पर बोर्ड का खौफ हावी न होने दें। उन्हें रुचि के अनुसार पढ़ाई की स्वतंत्रता दें। वीवीएस लक्ष्मण का उदाहरण देते हुए बताया वीवीएस लक्ष्मण खेल में भी अपना सर्वश्रेष्ठ देते और पढ़ाई के समय क्लास में भी अव्वल रहा करते थे। वे एक समय में एक ही काम पर शत प्रतिशत दिमाग लगाते थे।



ये स्टूडेंट्स शामिल हुए



डेली कॉलेज- वंश डेंग, देवाशीष सक्सेना व गौरव रावत।



शिशुकुंज इंटरनेशनल स्कूल- शिवानी मंडलोई, प्रसाद जैन व अरुणिमा राठी।



चोइथराम इंटरनेशनल-फरा पटेल, स्वाति मोढ़।



देहली पब्लिक स्कूल- मृदुल मुजुमदार, पीयूष झा, क्षितिज पांडे।



सत्यसांई विद्या विहार- अवनि अंधारे, कार्तिक धाकड़, अभिनव गर्ग।



इंडस वर्ल्ड स्कूल



तुषिता जोशी, दिव्य धनोतिया, अथर्व चौधरी, सिद्धांत जैन, सुष्मित शेखरन, श्वेता, प्रचीत गर्ग, अरुंधति सिंह, प्रखर त्रिपाठी, तितिक्षा सेठ, पीयूष गर्ग।



सफल होना है तो करिए टाइम मैनेजमेंट



हर्षा ने टाइम मैनेजमेंट पर जोर देते हुए कहा हर सफल व्यक्ति का समय प्रबंधन गजब का रहता है। ८ घंटे काम, 8 घंटे सोने के अलावा 2-3 घंटे आने-जाने में खर्च होते हैं। बाकी पांच-छह घंटे फिजूल जाते हैं। यानी सभी के पास दो घंटे खेलने और तीन घंटे पढ़ने का वक्त है। रविवार को फिल्म भी देखी जा सकती है।



सचिन से सीखें



अपार दौलत और शोहरत के बावजूद सचिन जब पिच पर होते हैं तो केवल बेट्समैन के रूप में। हर बार उनके खेल में नयापन होता है। इसी वजह से उन्होंने शानदार 20 वर्ष पूरे किए हैं, जबकि बाकी खिलाड़ियों को तीन साल में ही दिक्कत होने लगती है।

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