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Monday, November 16, 2009 01:58 [IST]  

danik bhaskarनहीं आई एंबुलेंस, बुझ गया चिराग

Bhaskar News

ambalaअम्बाला सिटी. रविवार को सड़क दुर्घटना में घायल हुए बच्चे को पीजीआई ले जाने की खातिर पिता 45 मिनट तक एंबुलेंस के लिए 102 नंबर पर डायल करता रहा, लेकिन एंबुलेंस नहीं आई। आखिर जब बच्चे को प्राइवेट एंबुलेंस से पीजीआई भेजा गया तो रास्ते में उसने दम तोड़ दिया।



जिसके बाद पीड़ित परिवार ने सरकार के प्रति रोष जाहिर करते हुए नारेबाजी की। साथ ही अधिकारियों को भी जमकर कोसा। खेद इस बात का है कि एक दिन पहले ही बड़े-बड़े दावों के साथ प्रदेश सरकार ने रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम शुरू किया था। दावा था कि 102 नंबर पर डायल करते ही कहीं भी 15 मिनट में एंबुलेंस पहुंच जाएगी।



रविवार को सिटी की घास मंडी में रहने वाला 12 वर्षीय कुक्कू काम से बाजार की तरफ जा रहा था। जहां रास्ते में उसे एक मोटरसाइकिल ने अपनी चपेट में ले लिया। हादसे में गहरी चोट लगने के बाद कुक्कू बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा और चालक मौका देखते ही फरार हो गया।



लेकिन उसी समय इलाके में सटे दुकानदारों ने कुक्कू को सिटी सिविल अस्पताल पहुंचाया। बेटे के साथ हुए हादसे की सूचना पाकर परिजन भी अस्पताल पहुंच गए। वहां डाक्टर भारती ने बच्चे को चंडीगढ़ पीजीआई रेफर कर दिया और जल्द एंबुलेंस लाने को कहा।



इस पर अस्पताल परिसर में एक भी एंबुलेंस नहीं मिली। इस पर परिजनों ने अस्पताल की एक दीवार पर लगे एंबुलेंस सेवा के बोर्ड पर एक नंबर देखा और तुरंत 102 नंबर डायल किया। पर उन्हें फोन पर हर बार यही जवाब मिला कि जल्द एंबुलेंस आ रही है पर नहीं आई।



रेडक्रास सचिव को जांच



यह अफसोस जनक हादसा है। मेरी जानकारी के मुताबिक उस वक्त सिटी के आसपास चार एंबुलेंस थी। लेकिन सभी सीरियस मरीजों को लेकर पीजीआई गई हुई थी। इस मामले की जांच रेडक्रास सचिव को सौंपी गई है। - समीर पाल सरो डीसी, अम्बाला



गलती मिलने पर कार्रवाई



सिटी के विधायक विनोद शर्मा का कहना है कि यदि रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम के तहत किसी भी मरीज को परेशानी आई है तो इस संबंध में डीसी से बात की जाएगी। खामी मिलने पर उसे दुरुस्त करने का प्रयास भी किया जाएगा। ताकि आने वाले समय में होने वाली घटनाओं को रोका जा सके।



प्रशासन की लापरवाही ने निगला मेरे बेटे को



नवनीत शर्मा. अम्बाला सिटी. पल-पल समय बीतता जा रहा था। कुक्कू की नब्ज डूबती जा रही थी। दूसरी तरफ बेटे को बचाने के लिए बढ़ रही थी दिनेश की जद्दोजहद । धीरे-धीरे सारा अस्पताल ही यहां मौके पर जुट गया था, नहीं पहुंची तो एंबुलेंस।



बाल दिवस पर एंबुलेंस सुविधा में सुधार के बड़े-बड़े दावे करने वाले स्वास्थ्य महकमे में अधिकारियों के पास आज कोई जवाब नहीं था। प्रशासन की लापरवाही मेरे बेटे को निगल गई। अगर 45 मिनट पहले एंबुलेंस मिल गई होती तो आज मेरा लाडला मेरी आंखों के सामने होता।



लेकिन इन अधिकारियों को किसी की कोई परवाह नहीं। इन्हें तो बस अपनी वाहवाही से मतलब है। फिर चाहे चल रहे सिस्टम में कितनी भी खामियां क्यों न हो। यह कहना था सिविल अस्पताल में विलाप कर रही उस मां का। जिसने एंबुलेंस न मिलने पर अपने बच्चे को खो दिया।



पहले तीन, अब रह गई एक एंबूलेंस



सिटी सिविल अस्पताल जिले का सबसे बड़ा अस्पताल है। इसीलिए सरकार ने पूर्व में यहां ओपीडी अधिक होने पर तीन एंबुलेंस दे रखी थी। यदि किसी घायल को एंबुलेंस पीजीआई लेकर जाती थी तो दूसरे घायल को अन्य एंबुलेंस पीजीआई पहुंचाती थी। सिस्टम काफी हद तक दुरुस्त चल रहा था और कभी इस तरह की कोई घटना भी सामने नहीं आई।



लेकिन अब रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम शुरू होने के बाद अस्पताल में एक एंबुलेंस रह गई है। जिसका खामियाजा सड़क दुर्घटना में घायल हुए लोगों को भुगतना पड़ेगा। क्योंकि एक एंबुलेंस के पीजीआई होने पर अस्पताल में अन्य सरकारी एंबुलेंस का कोई विकल्प नहीं है।



कर्मचारियों को नहीं पता क्या है सिस्टम



शनिवार को रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम शुरू होने के बाद नवनिर्मित ट्रामा सेंटर में मोनिटरिंग नियंत्रण कक्ष बनाया गया था। जिसके तहत सड़कों पर दौड़ने वाले सभी एंबुलेंस का कर्मचारी गलोब्ल पोजीशिनिंग सिस्टम के तहत नजर रखी जाएगी। साथ ही उनकी लोकेशन को भी अपनी जगह बैठे कवर करेंगे।



लेकिन इस सिस्टम की बागडोर संभालने वाले कर्मचारियों को यह तक नहीं पता कि पीजीआई भेजी गई एंबुलेंस इस समय किस दिशा में और कितनी दूरी पर चल रही है। पूछने पर कर्मचारी यही जवाब देते हैं कि बस सर रास्ते में होगी। अभी आ जाएगी। काफी देर हो गई ड्राइवर को चले। ऐसे में सिस्टम दुरुस्त चले इसकी कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही।



प्राइवेट एंबुलेंस चालकों की चांदी



भले ही सरकार ने बड़े-बड़े दावों के साथ 13 एंबुलेंस देकर जनता का दिल लुभाने का प्रयास किया हो। लेकिन असल में इसका लाभ सरकारी अधिकारियों व रसूकदार लोगों के साथ-साथ प्राइवेट एंबुलेंस चालकों को होता नजर आ रहा है। क्योंकि सरकारी एंबुलेंस के अभाव में हुई बच्चे की मौत ने यह साफ कर दिया है कि अब प्राइवेट एंबुलेंस चालकों की चांदी है।

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