कथक नृत्य बन गया इनकी जुबां
अम्बाला. इन्हें तबले की थाप सुनाई नहीं देती, न ही सुर और ताल में भेद मालूम है। फिर भी भाव-भंगिमाओं के सहारे कथक नृत्य में इस कदर पारंगत हैं कि देखने वाले ‘वाह’ कहे बिना नहीं रह पाते। यह कहानी है हरियाणा के इस शहर की जन्म से मूक-बधिर नेहा और चारु की।
यहां रोटरी क्लब द्वारा संचालित मूक-बधिर बच्चों के स्कूल में दसवीं की छात्रा नेहा (16) व नौवीं की चारु मलिक (14) का कुछ माह पहले तक कथक से कोई नाता नहीं था। लेकिन, इस साल कथक नृत्यांगना और समाजसेवी शबनम नाथ ने इनके स्कूल का दौरा कर बच्चों को कथक सिखाने की इच्छा जाहिर की थी। इसके कुछ दिनोंबाद इन छात्राओं ने अपने परिजनों के साथ शबनम नाथ से मुलाकात की और कथक सीखने का सिलसिला शुरू हो गया।
मुश्किल को बनाया आसान
यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। ये दोनों न तबले की थाम सुन सकती थीं ओर न ही गायन के बोल। इससे सामान्य लड़कियों के साथ परीक्षण के दौरान ताल पर पिछड़ने पर उन्हें उपहास का भी सामना करना पड़ा।
इस का हल निकालते हुए शबनम नाथ ने नेहा और चारु को वे कहानियां लिखकर दीं, जिन पर कथक नृत्य आधारित था। नेहा और चारु ने भाव-भंगिमा के जरिए इन कहानियों को नृत्य में इतनी सुंदरता से ढाला कि आज कथक ही उनकी पहचान बन गई है।
बेटियों ने नाम रोशन किया
छिपी प्रतिभा के उजागर होने के बाद परिजनों को उन पर गर्व है। एकाउंटेंट जनरल कार्यालय में कार्यरत चारु के पिता हरबंस मलिक अपनी बेटी की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। तो रेलवे में कार्यरत नेहा के पिता ओमप्रकाश कहते हैं कि बेटी ने इतनी कम उम्र में ही उनका नाम रोशन कर दिया।










