Monday, November 16, 2009 06:23 [IST]  

danik bhaskarठिठकते-झिझकते बढ़े कदम

हरीश बी. शर्मा

बीकानेर. उनके लिए जितना करीब चूल्हा है, उतनी ही दूर कचहरी है। नगर निगम तो देखा ही नहीं। यह मानने में उन्हें झिझक भी नहीं है। उन्हें बिल्कुल भी संकोच नहीं होता जब वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार करने का सारा क्रेडिट अपने पतिदेव को देती है।



नगर निगम चुनाव में प्रत्याशी बनी महिलाओं में से अधिकांश की कमोबेश यही बात है। किसी को बेटे ने चुनाव मैदान में उतारा है तो कोई भाई के कहने पर नामांकन भर चुकी हैं लेकिन उन्हें इस बात पर सख्त एतराज है कि सिर्फ किसी के कहने पर चुनाव लड़ने को तैयार हुई हैं। अधिकांश महिलाएं पढ़ी हुई हैं और कहती हैं कि हम क्या आदमी भी किसी की प्रेरणा से आगे बढ़ता है।



राजनीति में नया होने की बात को सिरे से खारिज करते हुए एक वयोवृद्ध प्रत्याशी कहती हैं कि ‘मां रे पेट सूं कोई सीख’र थोड़ां ही आवै है लाडी?’ उन्हीं के सामने चुनाव लड़ने वाली प्रत्याशी कहती है कि ‘दूसरे भी तो चुनाव लड़ने के लिए आगे आ रहे हैं।’



आरोप लगाया जा सकता है कि उन्हें इस तरह के जवाब रटाए गए हैं लेकिन यह गलत साबित हो सकता है कि अगर उनके जनसंपर्क को देखा जाए। रत्ताणी व्यासों के चौक से जब जनसंपर्क करने के लिए निकली महिलाएं पान की दुकान के पास खाली चौकी पर वोटर-लिस्ट रखकर रोड-मैप बनाती है तो अच्छे-अच्छे रणनीतिकारों को दिक्कत हो सकती है।



हालांकि इन महिलाओं के लिए घूंघट हटाना आज भी कठिन है लेकिन मतदाताओं के घर तक कदम पहुंचने लगे हैं, यह कम नहीं है। वोट मांगते हुए उनके हाथ जुड़ते हैं। मुस्कान के साथ वोट देने की अपील करती हैं और मतदाता भी खुश हैं। वार्ड नंबर सात की एक गृहिणी शारदा पुरी कहती हैं कि पार्षद के लिए क्या नया, क्या पुराना। फिर कौनसा निहाल कर दिया पुराने पार्षदों ने। हम चाहते हैं पढ़ी-लिखी महिला पार्षद बने तो वार्ड के लिए विकास का काम करेगी।



महिला प्रत्याशियों को यह मानने में भी दिक्कत नहीं है कि विवाह पंजीयन के लिए पहली बार नगर निगम देखा, फिर काम ही नहीं पड़ा। पब्लिक पार्क से निकलते हुए दूर से कचहरी देखने वाली महिलाओं के लिए नामांकन फाइल करने वाला वक्त भले ही पहली बार कचहरी में कदम रखने का रहा हो लेकिन उन्हें लगता है कि उन्हें अगर मौका मिला है तो आगे आना चाहिए।



राजनीति में महिलाओं को आगे लाकर समानता करने पर इन महिलाओं में जरूर कुछ हौसला आता है। सोनिया गांधी से लेकर वसुंधरा राजे तक के गुण गाती हैं लेकिन संकोच कैसे तोड़ेंगी? इस सवाल का जवाब कुछ के पास नहीं है। एक महिला प्रत्याशी इस सवाल के जवाब में वापस सवाल करती हैं कि आखिर महिलाओं को संकोच तोड़ने की जरूरत क्यों है। क्या हम अपनी हदों में रहते हुए शहर की सफाई और रोशनी की व्यवस्था को पटरी पर नहीं ला सकते?



ऐसे में यह कहना होगा कि तीस वार्ड से दावेदारी में उतरी महिलाओं के लिए भले ही चुनाव और कचहरी बहुत बड़ी चीज हो लेकिन नगर निगम की अव्यवस्थाओं से उन्हें बड़ी कोफ्त होती है। इन महिलाओं का कहना है कि पार्षद बनकर अपने वार्ड को स्वच्छ बनाना चाहती हैं। एक दूसरी महिला प्रत्याशी का कहना है कि वार्ड पार्षद बनने से चूल्हा-चौका थोड़े ही छूटेगा। घर का काम तो करेंगे ही। पार्षद बन जाएंगे तो सुनवाई होगी, इसीलिए लड़ रहे हैं चुनाव।



राजनेता इतने भर से खुश हैं। उन्हें लगता है महिलाएं जीतकर नगर निगम की एक-दो साधारण सभाएं देखेंगी तो सब समझ में जा जाएगा। चुनाव से पहले एक-एक महिला वार्ड में महिला प्रत्याशी को ढ़ूंढ़ने के लिए तकड़ी मशक्कत करने वाले पार्टी पदाधिकारियों को यह कहते हुए सुनना जल्दबाजी में दिया गया स्टेटमेंट कहा जा सकता है लेकिन यह तो तय है कि अगर इतनी महिलाएं एक साथ नगर निगम की साधारण सभा में पहुंचेंगी तो सदन में अनुशासन तो रहेगा ही।

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