‘ई ’के अलावा सब कुछ है ई-लाइब्रेरी में
सागर. डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विवि की ई-लाइब्रेरी तीन साल बाद भी मूर्तरूप नहीं ले सकी है। ई-लाइब्रेरी के नाम पर अभी तक कंप्यूटर, एसी, फर्नीचर खरीदे गए हैं। न तो लाइब्रेरी की किताबों की बार-कोडिंग हो सकी है और न ही शोधार्थियों को जर्नल आदि की सुविधा मिल सकी है।
देश की प्रतिष्ठित ई-लाइब्रेरी बनाने का दावा करने वाले विवि प्रशासन अपने विद्यार्थियों को तीन साल में ई-लाइब्रेरी के नाम पर बनाए गए एक कक्ष के दूर से ही दर्शन करा रहा है। ई-लाइब्रेरी ढाई करोड़ रुपए की लागत से बनाई जाना है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जुलाई 2006 में विवि के हीरक जयंती समारोह में ई-लाइब्रेरी के लिए राज्य शासन की ओर से ढाई करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। लगभग छह माह बाद विवि को ढाई करोड़ रुपए में से पहली किश्त भी प्राप्त हो गई थी।
लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और कथित खरीद-फरोख्त के नाम पर अभी तक काम पूरा नहीं हो सका। कथित अधिकारियों एवं व्यवस्थापकों ने ई-लाइब्रेरी के सिद्धांत की चिंता किए बिना कंप्यूटर, एसी, फर्नीचर आदि खरीदने में दिलचस्पी दिखाई।
वर्तमान में विवि की जवाहर लाल नेहरू लाइब्रेरी में ही ई-लाइब्रेरी के तहत वातानुकूलित कक्ष बनाया गया है। जिसमें कंप्यूटर, एसी, फर्नीचर लगाए गए हैं। लेकिन यहां विद्यार्थियों को ई-लाइब्रेरी के तहत मिलने वाली सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं।
वाय-फाय सिस्टम को लेकर संस्पेंस
ई-लाइब्रेरी के तहत वाय-फाय सिस्टम लगाया जाए या नहीं? इसको लेकर संस्पेंस बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार ई-लाइब्रेरी के लिए वाय-फाय सिस्टम लगाना जरूरी है, ताकि कैंपस ही नहीं संबंधित विद्यार्थियों के लैपटॉप पर भी घर बैठे ई-लाइब्रेरी की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि सही मायने में यह ई-लाइब्रेरी का सिद्धांत भी है।
कब होगी बार-कोडिंग- लाइब्रेरी की ढाई लाख से अधिक किताबों की बार कोडिंग होना है। इसके लिए तत्कालीन कुलसचिव डॉ. परीक्षित सिंह के कार्यकाल में निविदाएं जारी की गई थीं। पिछले वित्त वर्ष के अंतिम माह मार्च में निविदाओं के लिफाफे खोले गए थे। एक कंपनी की निविदा स्वीकृत की गई थी।
प्रभारी लाइब्रेरियन मुकेश साहू से बार-कोडिंग के कार्य को लेकर सवाल पूछा तो उनका कहना था कि कुछ तकनीकी कारणों से कार्य पूरा नहीं हो पा रहा है। श्री साहू ने इसके अलावा किसी भी प्रकार की जानकारी देने से इंकार कर दिया। लाइब्रेरी की कुछ महत्वपूर्ण किताबों को डिजीटल रूप में भी दिया जाना है, लेकिन यह कार्य शुरू ही नहीं हो सका है।
क्यों जरूरी है बार-कोडिंग- लाइब्रेरी में उपलब्ध सभी किताबों की जानकारी कंप्यूटर पर क्लिक करते ही उपलब्ध होगी। लेकिन इसके लिए किताबों की बार-कोडिंग एवं डाटा एंट्री का कार्य होना जरूरी है।
कमेटी और विशेषज्ञों की अनदेखी- ई-लाइब्रेरी का ज्यादातर कार्य प्रशासनिक अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ा है। तत्कालीन कुलपति प्रो. डीपी सिंह द्वारा इस कार्य की गुणवत्ता के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। ई-लाइब्रेरी से जुड़े देश के कुछ विशेषज्ञ बुलाए गए थे। इन्होंने अपने सुझाव दिए थे।
उस समय प्रोफेसर इंचार्ज (लाइब्रेरी) प्रो. पीके कठल थे। प्रो. कठल के निर्देशन में कार्य आगे ही बढ़ रहा था कि उनके स्थान पर दूसरे प्रोफेसर इंचार्ज बना दिए गए। फिर तीसरे और चौथे। इस अंतराल में कतिपय प्रशासनिक अधिकारियों ने विशेषज्ञों की अनदेखी करते हुए कंप्यूटर, एसी, फर्नीचर खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। वर्तमान में प्रोफेसर इंचार्ज प्रो. आरके त्रिवेदी हैं। रविवार को वह विवि के कार्य से बाहर थे, इसलिए चर्चा नहीं हो सकी।










