वोटरों से ज्यादा बागियों और निर्दलीयों का भय
विशेष. प्रचार शुरू हो गया है और नेता जो हमें चौराहे पर घंटों खड़ा रखकर लाल बत्ती की गाड़ी में फुर्र से निकल जाते हैं, घर-घर आने लगे हैं। दरअसल, निकाय चुनाव का सच यह है कि इसमें प्रत्याशी छोटे नेता होते हैं लेकिन दांव पर प्रतिष्ठा बड़े नेताओं की होती है।
वैसे ही जैसे कुछ कहानियों में तोते की गर्दन मरोड़ो तो कहानी का मुख्य पात्र तिलमिला उठता है। वजह कई हैं- किसी बड़े नेता ने उस प्रत्याशी को पात्र न होते हुए भी टिकट दिलवाया होता है या कोई प्रत्याशी उस बड़े नेता का नाते-रिश्तेदार होता है।
बहरहाल, चुनाव को अब मात्र छह दिन शेष हैं। शहरों, कस्बों, ढाणियों और चौपालों से जो खबरें मिल रही हैं, उनके अनुसार पार्टी प्रत्याशियों को वोटरों से ज्यादा डर बागियों और निर्दलीयों से लग रहा है। लाजिमी भी है क्योंकि महापौर को छोड़ दें तो इन चुनावों में बाकी पदों का क्षेत्र छोटा होता है। हर व्यक्ति हर प्रत्याशी को जानता भी है और पहचानता भी है। बहुत न सही, कुछ वोट इन निर्दलीयों और बागियों को जरूर मिलते हैं। यही वोट पार्टी प्रत्याशियों की जीत का गणित बिगाड़ते हैं।
यही वजह है कि पार्टियां बागियों को चुन-चुन कर निष्काषित कर रही हैं। इस बार खतरा बढ़ जो गया है। दरअसल, पहले राजनीतिक दलों की लहर इसलिए चल जाती थी कि जिस दल के ज्यादा पार्षद होते थे, शहर में सरकार उसी की बनती थी। जैसे पिछले चुनाव में जयपुर से 7 निर्दलीय चुने गए थे लेकिन बाद में इनमें से चार ने अलग-अलग पार्टियों का दामन थाम लिया। अब ऐसा नहीं है। जोड़तोड़ कर शहर की सरकार बनाने के दिन लद चुके।
अब तो महापौर, सभापति और अध्यक्ष भी हम ही चुनेंगे और पार्षद भी। फिर डर कैसा? जो आपके सवालों पर खरा उतरे, उसे ही चुनिए। पार्टी का हो तो अच्छा, नहीं हो तो भी अच्छा। वैसे बालोतरा राजस्थान का सबसे दूरस्थ कस्बा है। लेकिन निकाय चुनाव में अनोखा उदाहरण उसी ने पेश किया। वहां लोग प्रत्याशियों से शपथ पत्र भरवा रहे हैं जिसमें लिखा है- वादा करता हूं, समस्याएं नहीं सुलझा पाया तो इस्तीफा दे दूंगा। लोकतंत्र के सही मायने यही हैं।










