बूढ़े मां-बाप को अंतत: मिल गया आसरा
भिलाई. 73 वर्षीय केदारनाथ और उनकी पत्नी सुनंदा (दोनों परिवर्तित नाम) को अंतत: आसरा मिल ही गया। बीएसपी से रिटायर होने के बाद उनके तीनों बेटोंे ने अपने साथ रखने से मना कर दिया। वे दर-दर की ठोकर खाते रहे। पैसे सब खत्म हो गए थे। आखिर में साईं मंदिर के सामने फूलमाला व नारियल बेचकर अपना गुजारा करने लगे। भरण-पोषण और आसरा के लिए उन्होंने कोर्ट में गुहार लगाई। दो साल से मामला चल रहा था। आज आखिर उन्हें न्याय मिल ही गया।
उनके बड़े बेटे जो बीएसपी कर्मी हैं अपने बूढ़े मां-बाप को हर महीने गुजारा के लिए 1700 और 1000 रुपए मकान किराया देने तैयार हो गया। यह कोई कहानी या नाटक का सीन नहीं, हकीकत है। मिडिएशन कमेटी फार मानीटरिंग दी मिडिएशन सेंटर उच्च न्यायलय छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने उच्चस्तरीय मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया था।
इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा के सदस्य डा सुधीर जैन और नीना बंसल ने प्रदेश के सभी सोलह जिलों के 28 जजेस और एडवोकेट को मध्यस्थता के जरिए विवादों का निपटारा करने का प्रशिक्षण दिए।
सोमवार को कार्यक्रम के समापन से पहले 9 मामलों की सुनवाई हुई। इसमें 8 प्रकरण फटाफट निपट भी गए। सभी मामलों में दोनों पक्ष हंसी-खुशी राजी हो गए। कार्यशाला के समापन अवसर पर मुख्यअतिथि जिला एवं सत्र न्यायधीश एके पंडा ने कहा कि विवादों के निपटारे में मध्यस्थता महत्वपूर्ण रोल अदा करता है। इसमें दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होता है और गलतफहमी भी दूर हो जाती है।
दोनों पक्ष न्याय से संतुष्ट रहते हैं। ट्रेनिंग लेने वाले जजेस और एडवोकेट से उन्होंने कहा कि अब उनके सामने नई चुनौती है। मध्यस्थता के पूर्व दोनों पक्षों की मानवीय प्रवृत्ति को समझना बहुत जरूरी होता है। जिसने समझ लिया उसके लिए फिर केस का निराकरण बहुत आसान हो जाता है।










