18000 फीट की ऊंचाई पर शहर की कुड़ी
लुधियाना. शहर की इस कुड़ी ने वो काम कर दिखाया है, जिसकी हिम्मत बड़े-बड़े नहीं कर सकते। 18000 फीट ऊंची पहाड़ की चोटी पर चढ़ना बच्चों को खेल नहीं। परमिंदर की इसी योग्यता ने अब उसे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के काबिल बना दिया है।
‘गर देखनी हो मेरी उड़ान, तो आसमान को कह दो थोड़ा और ऊंचा हो जाए।’यही कह रही थीं परमिंदर कौर। कहें भी क्यों न। वह खड़ी थी 18000 फीट ऊंची पहाड़ की चोटी पर। इतने ऊपर जहां बर्फ से ढकी पहाड़ की चोटी आसमान की गोद में समाई हुई थी। बादल उसके कदमों में थे। बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा और शहर की इस कुड़ी ने अपनी हिम्मत, जोश और जज्बे से इतनी ऊंचाई को भी बौना कर दिया है। एससीडी गवर्नमेंट कालेज की छात्रा और नंबर 4 पंजाब एनसीसी एयरविंग की कैडेट परमिंदर ने दार्जिलिंग में हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट (एचएमआई) का एडवांस कोर्स कंप्लीट किया है। इस कैंप में पंजाब से वह अकेली ही थीं। इस ऊंचाई के उनके सफर को जाना सिटी रिपोर्टर ने।
बेसिक कैंप में लिया एल्फा ग्रेड
परमिंदर कौर ने बताया कि वह कैंप में एनसीसी के जरिए गईं। एनसीसी के द्वारा पहले वह मनाली में एक जून से 26 जून तक लगे बेसिक कैंप में हिस्सा लेने पहुंची। यह कैंप सिर्फ लड़कियों का था। इस कैंप में एनसीसी कैडेट्स, पसर्नल तौर पर भारत और कैनेडा आदि से करीब 32 लड़कियां पहुंची थीं। इस कैंप को डिपार्टमेंट ऑफ माउंटेन एंड एलाइड स्पोर्ट्स, मनाली द्वारा आयोजित किया गया था।
परमिंदर ने बताया कि बेसिक कैंप में उनके कई तरह के टेस्ट हुए। इसमें माउंटेनियरिंग की बेसिक ट्रेनिंग दी गई। इसमें हुए टेस्ट के आधार पर ही परमिंदर को एल्फा यानि की ए ग्रेड मिला। इसके बाद वह एडवांस ट्रेनिंग के लिए सलेक्ट की गई।
पानी भी जम जाता था वहां
हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट (एचएमआई) द्वारा माउंटेनियरिंग की एडवांस ट्रेनिंग दार्जिलिंग में करवाई गई। यह कैंप 17 अक्टूबर से 13 नवंबर तक चला। परमिंदर ने बताया कि इस कैंप में एनसीसी कैडेट्स के साथ आर्मी के ऑफिसर्स भी थे। कैंप में कुल 55 ट्रेनी थे। कैंप की लोकेशन बताते हुए परमिंदर कहती है हम 15000 फीट की ऊंचाई पर ठहरे हुए थे। इतनी ऊंचाई पर रहना ही रोमांचक था। वहां जीरो डिग्री सेल्सियस या फिर माइनस में तापमान होता था।
तापमान इतना कम होता था कि झीलों का पानी बिल्कुल जम जाता था। परमिंदर बताती हैं, हम अपना पानी स्लिपिंग बैग में रखते थे, क्योंकि यदि बोतल का पानी बाहर रह जाता था, तो पीने को पानी नहीं, खाने को बर्फ मिलती थी। वहां के शेडच्यूल के बारे में परमिंदर ने बताया कि वहां जितनी माउंटेनियरिंग करते थे, उतनी ट्रैकिंग भी करनी पड़ती थी। इतनी ठंड में सुबह पांच बजे फॉल इन हो जाता था। उसके बाद शुरू होता था सफर। करीब 26 किलोमीटर ट्रैकिंग करने के बाद मिलती थी वह जगह जहां से ऊपर चढ़ने का सफर शुरू होता था।
अद्भुत था वह पल
वहां पर हमें अनुशासन में रहकर सारे काम करने होते थे, क्योंकि मैंने देखा था, थोड़ी सी लापरवाही से कई ट्रेनी को फ्रैक्चर हो गया था। और उन्हें ट्रेनिंग छोड़ कर वापस आना पड़ा था। पीठ पर टंगा सामान और रस्सी के सहारे बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर चढ़ने का रोमांच, शायद शब्दों में बयां करना मुश्किल है। परमिंदर ने बताया कि वहां पर मुझे डर नहीं लगा। लेकिन हां हमेशा लगता था कि कहीं कोई गलती न हो जाए। कैंप में आखिरी दिन ‘पीक समिट’ का टेस्ट था।
यानि ट्रेनिंग के बाद परीक्षा। सभी को 18000 फीट हजार से ज्यादा ऊंचाई वाले पहाड़ की चोटी को फतह करना था। केवल चोटी पर खड़ा ट्रेनी ही सफलता पा सकता था। इसके अलावा कोई ऑप्शन नहीं। मैं नियमों के मुताबिक मन में जीत का जज्बा लिए जब उस चोटी पर पहुंची, तो मन में अद्भुत एहसास था।
18000 फीट की ऊंचाई, ग्रेट, आखिर मैं चढ़ ही गई, यही निकला था मेरे मुंह से उस पल। मुझे मिल गया था माउंटेनियरिंग का एडवांस सर्टिफिकेट, जिसके बाद मैं माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए भी इलीजिबल हूं। परमिंदर का कहना है मैं या तो लेक्चरर बनूंगी या फिर एयरफोर्स ज्वॉइन करूंगी। लेकिन इतना जरूर है कि यह ट्रेनिंग, यह पल हमेशा मेरी यादों में ताजा रहेंगे। इन अद्भुत पलों की बर्फ मेरे मन में कभी पिघलेगी नहीं।










