Wednesday, Nov 18th, 2009, 8:35 am [IST]  

danik bhaskarडिग्री पर राजनीति का ककहरा भारी

लोकेन्द्रसिंह तोम�

bikanerबीकानेर. राजनीति में शिक्षा का क्या मायने है इस पर न तो सरकार ने अब तक कोई नीति तय की और न ही निवार्चन आयोग ने।

इसी कारण इस बार निकाय चुनाव में पार्षद पद के लिए साक्षर से लेकर स्नातकोत्तर, एलएलबी और बीएड डिग्री धारक चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। शिक्षित प्रत्याशी राजनीति में शिक्षित और युवाओं की वकालत कर रहे हैं तो साक्षर प्रत्याशी का कहना है कि राजनीति में कागजों का नहीं लोगों के भीतर के मर्म को समझने की जरूरत है।

हालांकि दोनों ही वर्ग मानते हैं कि बेहतर होगा कि सभी प्रत्याशी शिक्षित और समझदार हों। नगर निगम चुनाव में इस बार जो तस्वीर उभरकर आई है उस देखकर यही कहा जा सकता है कि राजनीति और राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण में शिक्षा का कोई कॉलम तय नहीं किया।

कई बार राजनीतिक पार्टियां शिक्षित, समाजसेवी और युवाओं को बढ़ावा देने की बात करती हैं लेकिन टिकट वितरण के समय शिक्षा का कोई कॉलम नहीं तय किया जिससे कि शिक्षित प्रत्याशी मैदान में उतारा जा सके। दोनों ही पार्टी के प्रत्याशी मानते हैं कि टिकट वितरण में शिक्षा को अधिक तवज्जो देनी चाहिए।

पार्षद पद के लिए कांग्रेस और भाजपा ने 116 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जिसमें शिक्षा का स्तर बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता। शिक्षा को आधार बनाकर देखें तो यहां अलग ही एक लड़ाई है। करीब 25 प्रत्याशी ऐसे हैं जो सिर्फ हस्ताक्षर करना ही जानते हैं।

जिन्होंने अपने हलफनामे में स्वयं को साक्षर करार दिया है जबकि इन्हीं के सामने 17 प्रत्याशी ऐसे हैं जो किसी न किसी विषय में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। इसमें एलएलबी और बीएड डिग्री धारक भी शामिल हैं। स्नातक प्रत्याशियों की संख्या सात है और 10वीं से 12वीं तक शिक्षा हासिल करने वालों की संख्या आठ ही है। शैक्षिक योग्यता में सबसे बड़ी संख्या साक्षर से दसवीं तक है जिसमें 45 से अधिक प्रत्याशी हैं।

वार्ड 60 की कांग्रेस प्रत्याशी चेतना चौधरी व वार्ड 28 की भाजपा प्रत्याशी मोनिका मोदी का मानना है कि राजनीति में शिक्षित होना जरूरी है क्योंकि पब्लिक के बीच हर तरह के व्यक्ति का सामना करना पड़ता है। यदि आप शिक्षित नहीं हैं तो कई बार हंसी का पात्र बनना पड़ता है।

दूसरी बात कुछ ऐसे बिंदु होते हैं जिसे स्वयं को समझना पड़ता है और आप शिक्षित नहीं है तो सदा दूसरों पर निर्भर रहना होगा। दोनों ने जोर देकर कहा कि सरकार और चुनाव आयोग ने भले ही नियम न बनाएं हों लेकिन सभी राजनीतिक पार्टियों को शिक्षित व्यक्ति को टिकट देना चाहिए तो न सिर्फ सदन की गरिमा भी बनी रह सकेगी बल्कि लोगों की समस्या को भी अच्छी तरीके से समझा और सुलझाया जा सकेगा।

दूसरी ओर भाजपा की सावित्री देवी और कांग्रेस की शकूराबानो का कहना है कि राजनीति में कागजों पर लिखी बातें समझना महžवपूर्ण नहीं है बल्कि लोगों की समस्याओं को समझना और उन्हें सुलझाना महžवपूर्ण है। जिसके लिए पढ़ाई की नहीं बल्कि कड़ाई की जरूरत होती है। यह गलत है कि बिना पढ़े लिखे लोग राजनीति में अच्छा कार्य नहीं कर सकते। गरीब की बात को साक्षर ही समझ सकता है।



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