पार्टियों को सक्षम नारी की तलाश
रतलाम. इस बार के नगरीय निकाय चुनाव में 50 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने से राजनीतिक दलों की परेशानी बढ़ गई है। अब तक का पार्टियों का अनुभव महिलाओं के मामले में कड़वा ही रहा है। कुछ को छोड़ दें तो ज्यादातर महिला पार्षदों ने अपना कार्यकाल पति अथवा पुत्र के दम पर पूरा किया।
आगे ऐसा न हो इसलिए पार्टियां ऐसी दमखम वाली महिलाओं को तलाश रही हैं जो चुनाव जीतने के बाद सत्ता के गलियारों में अपने बल पर जनता के काम करवा सकें। अन्यथा अगली नगर निगम परिषद में भी असल ‘निजाम’ पति या पुत्रों का ही होगा।
तीनों नगर निगम परिषदों (1994, 1999 व 2004) में एक बार भी 33 फीसदी से ज्यादा महिला उम्मीदवारों को राजनीतिक दलों ने टिकट नहीं दिया। सिर्फ 1999-2004 की परिषद में ही 18 पार्षद थीं। ऐसा सामान्य वार्ड से निर्मला झालानी के निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीतने के कारण हुआ था।
इस चुनाव में अनीता पाहुजा भी निर्दलीय चुनी गईं थीं। इस बार हो रहे चुनाव में भी किसी भी पार्टी की नीयत महिलाओं को 50 फीसदी से ज्यादा टिकट देने की नहीं है। 2004 में नगर के 49 वार्डो में से 10 पर भाजपा की व सात पर कांग्रेस की महिला प्रत्याशी जीतकर नगर सरकार में शामिल हुईं थीं।
इनमें 10 गृहिणी तथा सात घर से बाहर निकलकर समाज में पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने वाली महिलाएं हैं। इनमें से सात कक्षा बारहवीं या उससे अधिक पढ़ी-लिखी हैं। किस्मत को बड़ा मानने वाली इन नेताओं में से कुछ अपने पति तो कुछ बेटों के कहने पर चुनावी समर में उतरीं और चुने जाने के बाद उन्हीं के दम पर पांच साल का कार्यकाल गुजारा।
वार्ड ९ की पार्षद बनी कांग्रेस की कमलाबाई व्यास अपने पूर्व पार्षद पुत्र रजनीकांत व्यास के भरोसे नैया पार लगाई। वार्ड 25 से भाजपा की मंजुला पोरवाल को राजनीति पति दिनेश पोरवाल ने राजनीति सिखाई। वार्ड नंबर 4 की गीताबाई शर्मा, 12 की शारदा भगौरा, 13 की आशा उपाध्याय, 14 की केसरबाई, 17 की सुशीला गुर्जर, 24 की माया सोलंकी, 35 की अनामिका जोशी, 36 की मोनिका सोनी व 46 की लता खिंची निगम के गलियारे में अंगुली पकड़ कर चलना इनके पतियों ने ही सिखाया। इस बार ऐसा न हो इसके लिए जनता के साथ ही राजनीतिक दल भी काफी चिंतित हैं।










