गड़बड़ाया हिसाब, नहीं दिखता लाभ
बीकानेर. एशियाई विकास बैंक के ऋण के बोझ तले दबे नगर निगम को राज्य वित्त आयोग की राशि बाद में मिलती है, कटौती पहले ही हो जाती है। भले ही शहर का अधिकांश भाग राजस्थान शहरी ढांचागत विकास परियोजना में शामिल नहीं होने के कारण विकास की अभी भी बाट जोह रहा हो लेकिन भुगतान नगर निगम को ही करना पड़ रहा है।
कोई नहीं जानता कि नगर विकास न्यास की दूसरे चरण की सीवरेज योजना के बाद बीकानेर शहर का नंबर कब आयेगा लेकिन अभी तक पहली सीवरेज का कर्जा भी नगर निगम ही चुका रहा है। उस पर तुर्रा यह कि कुछ साल पहले ही सरकार ने निकाय को चुंगी वसूलने से रोक दिया है।
नगर निगम के पास चुंगी वसूली एक ऐसा आय का साधन था जिसने निगम की आय को अचानक बढ़ा दिया था लेकिन इसे बंद कर के सिर्फ निगम की आय पर ही अंकुश नहीं लगा बल्कि ताकत भी कम हो गई। कहने के लिए सरकार ने चुंगी पुनर्भरण राशि देनी शुरू की है लेकिन निगम के जानकारों का कहना है कि अगर चुंगी जारी रहती तो नगर निगम आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकता था लेकिन एक तरफ जहां चुंगी बंद हुई तो दूसरी ओर योजनाओं का पैसा इधर-उधर लगा देने के कारण निगम का हिसाब भी गड़बड़ा गया।
इस गड़बड़ाए हिसाब में सबसे अधिक प्रभावित हुआ यहां का कर्मचारी। कर्मचारियों के वेतन परिलाभों की स्थिति यह है कि लगभग दो करोड़ रुपए की राशि आज भी बकाया चल रही है। हालात यह हो जाते हैं कि जब किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की तारीख नजदीक आती है तो कर्मचारी के मन में पहला सवाल यह होता है कि क्या विदा होते समय सारे परिलाभ मिल जाएंगे।
सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों के करीबन 50 लाख रुपए नगर निगम में अटक हुए पड़े हैं। इस तरह के सवालों से जूझते हुए नगर निगम हालांकि बड़े-बड़े ठेके भी कर रही है। ठेकेदारों को भुगतान भी हो रहे हैं लेकिन आर्थिक स्वायत्तता नहीं मिल पाने के कारण कसमसा रहे हैं। ठेकेदार काम नहीं करते तो उन्हें पुराना भुगतान कर दिया जाता है। कर्मचारी आंखें दिखाते हैं तो उनके पैसे भी खातों में डाल दिए जाते हैं लेकिन आज भी नगर निगम की यह स्थिति नहीं है कि किसी भी बड़े कार्य के लिए बड़ा फैसला कर सके।
ऐसे में नगर निगम को सिर्फ सरकार की इमदाद पर ही भरोसा है। इसके अलावा जो भी राशि कर और जुर्माने के रूप में आती है, उसका भी एक बड़ा आधार है। चुंगी पुनर्भरण राशि के रूप में नगर निगम को सरकार से एक करोड़ 18 लाख रुपए मिलते हैं लेकिन खर्च हर महीने एक करोड़ 66 लाख के करीब है।
कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य प्रशासनिक व्यय जिसमें डीजल, पेट्रोल, सफाई और सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था शामिल है, पर खर्च हो जाता है। इस बड़े अंतर को पाटने के लिए नगर निगम को हर महीने पैसा कमाने की जरूरत है लेकिन सच्चई यह है कि इतना पैसा नगर निगम कमाने में अक्षम साबित हो रहा है। लिहाजा, उसे कभी योजनाओं को इधर-उधर करना पड़ता है तो कभी कर्मचारियों के हित के लिए आए हुए पैसे का गुणा-भाग करना पड़ता है। इस गुणा-भाग का असर कब और कैसे पड़ेगा यह तो भविष्य में कभी होने वाली ऑडिट में ही पता चलेगा लेकिन तब तक एक करोड 75 लाख रुपए की आय से दो करोड़ 20 लाख रुपए कैसे खर्च हो रहे हैं, रहस्य ही रहेगा।
मकसूद बोले, आय के रास्ते खोले
नगर निगम के महापौर के रूप में मकसूद अहमद ने कुर्सी संभालने के बाद जमीन बेचकर पैसा एकत्र किया। नगर विकास न्यास से साढ़े पांच करोड़ रुपए से ज्यादा राशि भूमि विक्रय अंश दान के रूप में हासिल की। इजाजत तामीर की फीस 180 रुपए से बढ़ाकर 1100 रुपए कर दी। अग्निशमन, सीवरेज, वैवाहिक स्थल आदि का शुल्क बढ़ा दिया। महापौर बताते हैं कि उन्होंने यह सब निगम की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए किया और परिणाम भी बेहतर आने लगे।
अगर बेचने के लिए खोजी गई जमीन को विवादों में नहीं घसीटा जाता तो नगर निगम की स्थिति और अधिक अच्छी हो सकती थी लेकिन फिर भी खुशी है। महापौर का कहना है कि अभी भी ऐसी जमीन है जिसे बेचने के बाद नगर निगम को आने वाले दो साल कोई परेशानी नहीं आएगी। हालांकि हमने सफाई उपविधियां, तहबाजारी, डेयरी पशुधन, यात्रीकर, किराया उपविधियां सरकार के पास मंजूरी के लिए भेजी लेकिन स्वीकृति नहीं मिली।
होटल व रेस्टोरेंट उपविधियों से हमारी आय बढ़ी। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ कर्मचारियों को मिलने के बाद अगर सरकार हमें भी नया वेतनमान देने के लिए फंड उपलब्ध करवाती तो हमें बड़ा लाभ मिल सकता था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मैंने अपने कार्यकाल में नगर निगम के लिए किसी तरह का ऋण नहीं लिया है।
पूर्व में एशियाई विकास बैंक के ऋण की राशि राज्य वित्त आयोग की राशि से काटी ही जा रही है। मेरे कार्यकाल से पूर्व एक करोड़ 48 लाख रुपए का कर्ज लिया गया था जिसकी दो किस्तें चुका दी गइ्र है। नगरीय विकास कर के रूप में पिछले वर्ष 23 लाख 15 हजार और इस वर्ष 35 लाख 11 हजार रुपए वसूले गए हैं।
ञ्चअगर सरकार समय-समय पर फंड देती रहे और योजनाओं के तहत आया हुआ पैसा सही तरीके से लगे तो निगम की स्थिति सुधर सकती है। निगम के पास आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए कई स्रोत हैं जिनका दोहन किया जाना चाहिए। एक्ट में कई प्रावधान है। इच्छाशक्ति हो तो निगम की आर्थिक स्थित में सुधार हो सकता है।
बजरंगसिंह खींची, प्रांतीय उपाध्यक्ष, नगर पालिका कर्मचारी फैडरेशन
सफाई कार्य के लिए ठेके की जरूरत ही नहीं है। अगर सरकार ने यह फैसला किया है कि नगर निगम अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति करे तो निगम को ऐसा करना चाहिए। जितना पैसा सफाई के ठेके पर लगाया जा रहा है, उतनी राशि नवनियुक्त कर्मचारियों पर खर्च की जाएगी तो अच्छे परिणाम मिलेंगे।
शिवलाल तेजी, सफाई कर्मचारी नेता










