Wednesday, Nov 18th, 2009, 7:43 am [IST]  

danik bhaskarदुबले हो रहे अफीम काश्तकार

Bhaskar News

भीलवाड़ा. नारकोटिक्स विभाग ने इस साल अफीम खेती के पट्टे तो जारी कर दिए, लेकिन काश्तकारों के सामने बुवाई के साथ ही उपज की समस्या पैदा हो गई है। इस बार खेती के लिए 50, 35 व 25 आरी के पट्टे दिए गए, लेकिन सिंचाई के लिए पानी नहीं होने से इनकी उपज बैठना मुश्किल है। वहीं विभाग के समक्ष भी नपाई व हंकाई की समस्या खड़ी हो सकती है। भीलवाड़ा खंड द्वारा भीलवाड़ा व चित्तौड़गढ़ जिले के करीब 5600 काश्तकारों को पट्टे दिए गए है।



जिले के कोटड़ी, जहाजपुर, मांडलगढ़ व बिजौलिया तथा चित्तौड़गढ़ के गंगरार, कपासन, बेंगू व रावतभाटा क्षेत्र के काश्तकारों को भीलवाड़ा खंड द्वारा पट्टे जारी किए गए। विभाग ने इस बार 50 आरी, (लगभग सवा दो बीघा), 35 आरी(लगभग डेढ़ बीघा), 25 आरी(एक बीघा से अधिक) काश्त के लिए 5600 लाइसेंस जारी किए। विशेषज्ञों का मानना है कि अफीम काश्त पानी मांगने वाली खेती है। इसे लगभग 8-10 बार पानी देना
पड़ता है। जबकि अभी से गांवों में पेयजल संकट गहराने लग गया है, ऐसे में फसल सिंचाई करना मुश्किल होगा।

गौरतलब है कि काश्तकार को न केवल विभाग को निर्धारित न्यूनतम उपज देनी पड़ती है बल्कि आवंटित भूमि से अन्य स्थान पर भी खेती नहीं की सकती है। लंबरदार सहित विभाग के अधिकारी इस पर पूरी निगरानी रखते हैं। आकोला क्षेत्र के रामचंद कहते हैं कि विभाग से हमने पट्टा तो प्राप्त कर लिया है, लेकिन अब कितनी आरी में बुवाई करे, यही अभी समझ नहीं पा रहे हैं। पट्टा बचाने के लिए बुवाई करना भी जरूरी है, और बराबर उपज देना भी। बरसात नहीं होने से काश्तकरों के सामने यह गंभीर समस्या हो गई है। कोटड़ी के बरदीचंद तेली कहते हैं कि 50 व 35 आरी के बजाय जिन काश्तकारों ने कम आरी के पट्टे मांगे थे, उन्हें कम आरी का पट्टा मिल जाता तो अच्छा रहता।

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