ग्लेशियर पिघले उठा विवाद
हिमालय के पिघलते ग्लेशियर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र और भारत के विशेषज्ञ आमने सामने आ गए हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और 2035 तक ये समाप्त हो जाएंगे। वहीं भारत का कहना है कि 2005 से लेकर अब तक ग्लेशियर की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
संयुक्त राष्ट्र के इंटनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने 2007 के रिपोर्ट में कहा था कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया में सबसे तेजी से घट रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो 2035 तक या उससे भी पहले ये पूरी तरह गायब हो जाएंगे। इसके जवाब में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि इतनी दहशत फैलाने की जरूरत नहीं है। यह रिपोर्ट गलत है। भारत सरकार ने भी सर्वेक्षण करवाएं है, जिन्हें भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व उपनिदेशक वीके रैना ने तैयार किया है। रमेश का कहना है कि हिमालय के ग्लेशियर में ऐसी कोई असमान्य स्थिति नहीं दिख रही है जिससे लगे कि यह कुछ ही दशक में गायब हो जाएंगे।
आईपीसीसी रिपोर्ट कहती है : हिमालय में 10 हजार के लगभग ग्लेशियर हैं, लेकिन सरकारी रिपोर्ट दर्जन भर ग्लेशियर के अध्ययन पर ही आधारित है। 30 किलोमीटर लंबा गंगोत्री का ग्लेशियर सालाना 22 मीटर की दर से घट रहा है। लेकिन 2004-2005 में सालाना दर 12 मीटर रही। अगर यही हाल रहा तो भारत की नदियां सूख जाएंगी। संयुक्त राष्ट्र की इसी रिपोर्ट को खारिज करते हुए पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि हिमालय के ग्लेशियर पिछले 100 वर्षो में अलग-अलग तरह से व्यवहार करते दिखे हैं। 2007 से लेकर इस साल जून तक ग्लेशियर जस का तस है।
संयुक्त राष्ट्र की इंटनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके चलते यहां झीलें बन गई हैं। हर साल सात प्रतिशत की दर से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। पश्चिमी हिमालय में ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली। उन्होंने कहा कि सिक्किम के पूर्वी राठॉग स्थित एक ग्लेशियर की 80 प्रतिशत बर्फ पिघल चुकी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हिमालय को ध्रुवों से ज्यादा ऊंचाई पर बताना गलत है। असल में ध्रुवों की ऊंचाई ज्यादा है और वहां सूर्य की किरणों सीधी नहीं पड़तीं, जबकि हिमालय पर ये किरणों सीधी पड़ती हैं।
नहीं पिघल रहे ग्लेशियर : ‘‘यह रिपोर्ट 25 ग्लेशियर पर सालों के रिसर्च के बाद तैयार की गई है। रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियर की स्थिति को जितना भयानक बताया है, वह उतनी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने गलत रिपोर्ट दी है। हिमालय के पर्यावरण को बचाने के लिए वैज्ञानिक नजरिए से नीतियां बनाकर अमल करने की जरूरत है। - जयराम नरेश, वन एवं पर्यावरण मंत्री
अकड़ रहे हैं मंत्री : ‘‘आईपीसीसी ने दो साल पहले ही चेता दिया था कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। लेकिन पर्यावरण मंत्री का ताजा बयान उनकी अकड़ दिखा रहा है। वह भले ही कुछ भी कहें, लेकिन सैटेलाइट से खींची तस्वीरों से साफ है कि हिमालय के ग्लेशियर की क्या स्थिति है? - राजेन्द्र पचौरी, चेयरमैन, आईपीसीसी
ग्लोबल वार्मिग का असर नहीं पड़ेगा : ‘‘पिछले दिनों नासा की रिपोर्ट इस संबंध में आई है। इसके अनुसार हिमालय के ग्लेशियर ज्यादा ऊं चाई पर हैं इसलिए उन पर ग्लोबल वार्मिग का असर कम ही पड़ेगा। - वैज्ञानिक, नासा
गहन अध्ययन की जरूरत है : ‘‘वैज्ञानिकों ने 9000 में से 30 ग्लेशियर का दो साल तक अध्ययन किया है। जबकि इतनी बड़ी बात कहने से पहले 8-10 सालों तक और ज्यादा ग्लेशियरों का गहन अध्ययन करना चाहिए। - आरके गंजू, डायरेक्टर, हिमालय ग्लेसियोलॉजी जम्मू यूनिवर्सिटी
बड़ी भूल है सच्चई को नहीं मानना : ‘‘जयराम रमेश वास्तविकता को जानते हुए भी संयुक्त राष्ट्र की उस रिपोर्ट को खारिज कर रहे हैं, जिसमें हिमालय के ग्लेशियर पिघलने की बात कही गई है। यह बड़ी भूल है। यह बात अलग है कि हमारे पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे पुष्टि हो सके कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं। केंद्र सरकार चाहती भी नहीं है कि ऐसा हो, क्योंकि इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट लंबे समय से यूनाइटेड नेशंस एनवायरमेंट प्रोग्राम के साथ इस दिशा में शोध करना चाहता है, लेकिन केंद्र ने उसे मंजूरी नहीं दी है। - देविंदर शर्मा, एक्सपर्ट, फूड एंड कल्चर
भले ही भारत के वन एवं पर्यावरण मंत्री इस बात से इनकार करें कि ग्लोबल वॉर्मिग के कारण हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, लेकिन वॉर्मिग का असर हर तरफ देखा जा सकता है। बढ़ती वॉर्मिग के चलते तेजी से दुनियाभर के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इसका खुलासा कई वैज्ञानिक शोधों के जरिए हो चुका है।










