Friday, Nov 20th, 2009, 6:32 pm [IST]  

danik bhaskarरेजांग ला के वीरों को सलाम..

भास्कर रिसर्च टीम

g218 नवंबर 1962 को भारतीय सेना की कुमायूं रेजीमेंट की एक कंपनी ने चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला र्दे में शौर्य व शहादत का गौरवशाली अध्याय लिखा था। मेजर शैतानसिंह की इस कंपनी ने जो शौर्य दिखाया उसने राष्ट्र की चेतना को झकझोर दिया था, लेकिन इसे भुला दिया गया। इस पर आज विशेष प्रस्तुति :-

जब घायल हुआ हिमालय..

चीन ने जब 20 अक्टूबर1962 को हमला किया तो ब्रिगेडियर टीएन रैना के मातहत 114वीं ब्रिगेड पर लद्दाख की जिम्मेदारी थी। जबरदस्त हमले में जब अग्रिम चौकियां ध्वस्त हो गईं तो बिग्रेड के पास लेह के बाहरी इलाके में अपनी सीमित सैन्य टुकड़ियों व हथियार व गोला-बारूद का अधिकतम इस्तेमाल करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

चुशुल पर बुरी नजर..

4337 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद चुशुल घाटी लेह के रास्ते पर पड़ती है। इसके उत्तर में पानगोंग त्सो झील, पूर्व व पश्चिम में 5700 मीटर की पर्वत श्रंखला और दक्षिण में रणनीतिक महत्व की चुशुल हवाई पट्टी थी। चुशुल घाटी पर कब्जा होने के बाद चीनियों को लेह जाते देर नहीं लगती। आगे बढ़ने के लिए रेजांग ला दर्रा महत्वपूर्ण था।

सिर्फ रायफल से मुकाबला..

रेजांग ला में मेजर शैतानसिंह की ‘चार्ली कंपनी’ में तीन प्लाटून थीं। इन करीब 125 सैनिकों में प्रत्येक के पास एक पाइंट थ्री नाट थ्री रायफल और 600 गोलियां थी। इसके अलावा इनके पास सिर्फ छह लाइट मशीनगनें व एक हजार हथगोले व मोर्टार थे। ऊंचाई पर होने के कारण इन्हें तोपों की भी कोई मदद नहीं मिलने वाली थी।

धुंध छंटी तो नजर आए चीनी..

18 नवंबर 1962 की सुबह पांच बजे जब धुंध छंटने लगी तो चीनी सैनिक नजर आने लगे। घाटी में मौजूद नदी की सूखी तलहटी की ओर जाने वाले हर उतार पर भारी संख्या में दुश्मन सैनिक बढ़ते चले आ रहे थे।

फायर..

पांच बजे के आस-पास चीनी सैनिकों के निशाने की जद में आते ही मेजर शैतान सिंह ने फायरिंग का आर्डर दिया। जल्द ही घाटी मारे गए और घायल चीनी सैनिकों से भर गई पर उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी कि शेष आगे बढ़ते रहे। सामने से हमला नाकाम होते देख चीनियों ने रेजांग र्दे में तोपों से भारी गोलाबारी की। हथियारों के मामले में हमारा चीनी सैनियों से कोई मुकाबला नहीं था। र्दे में भारतीय सैनिकों का कोई बंकर साबुत नहीं बचा।

असाधारण नेतृत्व..

चारों ओर से घिर जाने के बाद मेजर शैतान सिंह ने अपनी कंपनी को नई मोर्चाबंदी में लगाया। गोलियों की बौछार के बीच वे घूम-घूमकर सैनिकों को निर्देश देने के साथ उनका उत्साह बढ़ा रहे थे। उन्हें बांह पर गोली लगी। कुछ देर बाद उनके पेट में मशीनगन की गोलियां लगीं। दो सैनिक उन्हें बचाकर ले जाने के लिए आगे बढ़े तो खतरा भांपकर उन्होंने सैनिकों को वहां से जाने का आदेश दिया।

अंतिम गोली तक संघर्ष..

युद्धविराम के बाद घाटी का जायजा लेने वाले ब्रिगेडियर रैना (जो बाद में जनरल बने) ने कहा, ‘मुश्किलों का सामना करने के बाद भी वहां न तो घबराहट दिखाई दी और न पीछे हटने के कोई संकेत।’ बांग्लादेश युद्ध के हीरो रहे मेजर जनरल इयान कारदोजो ने अपनी पुस्तक ‘परमवीर : अवर हीरोज इन बैटल’ में लिखा, ‘वीरगति प्राप्त सभी सैनिकों के हाथों में हथियार थे। मोर्टारमैन के हाथों में भी गोला पाया गया।

कर चले हम..

मेजर शैतानसिंह को मरणोपरांत सर्वोच्च शौर्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। हरियाणा के रेवाड़ी जिले के कई जवानों को मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया। हरियाणा के रेवाड़ी की रेजांग ला शौर्य समिति के महासचिव नरेश चौहान ने बताया कि इस युद्ध में हरियाणा के 62, राजस्थान के मेजर शैतान सिंह सहित 25, उप्र के चार तथा बिहार, पंजाब व मप्र का एक-एक जवान शहीद हुआ था। हर साल की तरह समिति बुधवार को एक कार्यक्रम में रेजांग ला के वीरों को याद करेगी। इस मौके पर विभिन्न युद्धों में शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को भी सम्मानित किया जाएगा।

—भास्कर रिसर्च टीमइलस्ट्रेशन : गौतम चक्रवर्ती

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