राष्ट्र या महाराष्ट्र!
राज ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) कई सालों से अखबार की सुर्खियों में छाए हुए हैं। बहुत से वैचारिक और बुद्धिजीवी किस्म के लेख राज ठाकरे को किसी शातिर खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं, जो ठग और बदमाशों की पार्टी चलाता है। बहुत ईमानदारी से कहें तो यह संकीर्णतावादी सोच राज ठाकरे के समर्थकों की सोच से कुछ ज्यादा भिन्न नहीं है, जो उन्हें हाशिए पर पड़े हुए मराठी मुद्दों के मुक्तिदाता के रूप में देखते हैं।
किसी व्यक्ति पर इस तरह की सीधी निशानेबाजी वास्तविक मुद्दों को समझने में मुश्किल पैदा करती है। हमें याद रखना चाहिए कि नवनिर्माण सेना अकेली नहीं है। लाखों लोग अब इस पार्टी को वोट देते हैं। मात्र तीन वर्ष की अवधि में इस पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनावों में छह प्रतिशत वोट हथिया लिए। अगर कांग्रेस के २१ प्रतिशत वोटों से तुलना करें तो एमएनएस अब भी पीछे है।
लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस को वोट देने वाले प्रत्येक चार व्यक्तियों के पीछे एक व्यक्ति ऐसा था, जिसने एमएनएस को वोट दिया और यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। राज ठाकरे ने कैसे इतनी तेज रफ्तार से इतने सारे समर्थक जुटा लिए, इस बात को समझने के लिए हमें जरूर उन असल मुद्दों को समझना चाहिए, जिन्हें एमएनएस ने उठाया। मैं सबसे महत्वपूर्ण तीन मुद्दों की बात करता हूं:
महाराष्ट्र की असमानता : हिंदुस्तान के अधिकांश करोड़पति महाराष्ट्र में रहते हैं, लेकिन इसी के साथ-साथ इस देश का बहुतायत गरीब तबका भी इसी राज्य में रहता है। इस राज्य की बहुसंख्यक आबादी कृषि पर निर्भर है और गांव गिरती हुई कृषि उपज और बहुत खराब सिंचाई व्यवस्था की मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। पूरे भारत में जहां औसतन ४क् प्रतिशत जमीन पर सिंचाई होती है, उसकी तुलना में महाराष्ट्र में केवल १६ प्रतिशत कृषि योग्य भूमि की सिंचाई हो पाती है।
यह नतीजा है मानसून पर निर्भरता का। वर्षा में भारी अनिश्चितता और अस्थिरता होती है। पूरे देश में महाराष्ट्र के गांवों में ही सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्यों? अगर हम हिंदुस्तान की तरक्की चाहते हैं तो क्या हमारे किसानों का भी विकास नहीं होना चाहिए?
अयोग्यता : वर्तमान में तथाकथित सहिष्णुतावादी व राष्ट्रवादी पार्टियां कुछ करती नजर नहीं आतीं। ऐसा विकास जो सामने नजर आए, उसके बहुत कम निशान हैं। जहां एक ओर कृषि की बुरी हालत है, वहीं दूसरी ओर शहरों में भी चरमराती हुई बुनियादी व्यवस्था के चलते हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। जो लोग कुछ नहीं करते, उनके बरक्स देखें तो एमएनएस वाले कुछ तो करते नजर आते हैं।
मीडिया का श्रेष्ठतावादी झुकाव : अधिकांश मीडिया उच्च वर्ग के मुद्दों और सवालों को उठाने में ही रुचि रखता है और इसीलिए मुंबई के लोग मराठी संस्कृति को निम्न वर्ग की संस्कृति मानते हैं। हम शायद इकलौते ऐसे देश हैं, जहां स्थानीय संस्कृतियों को कमतर समझा जाता है। बहुत ज्यादा हिंदुस्तानी रंग में रंगी या बहुसंख्यक हिंदुस्तानियों द्वारा चाही जाने वाली चीज अमूमन बाजार की नजरों में निचले दर्जे की समझी जाती है।
यह इसके बावजूद है कि मराठी संस्कृति बहुत समृद्ध और बुनियादी भारतीय संस्कृतियों में से एक है और महाराष्ट्र में रहने वाले अधिकांश लोग इस संस्कृति का पालन करते हैं। ऐसे में कोई भी पार्टी, जो उपेक्षित लेकिन दिलों में बसी संस्कृति को उसकी पहचान और चेहरा दिलाने की बात करे तो उस पार्टी को लोगों का समर्थन मिलना लाजिमी है।
(एमएनएस ने मराठी कविता पाठ और साहित्यिक प्रदर्शनियां इत्यादि आयोजित की हैं।) इन तमाम वाजिब और जोरदार मुद्दों और नेक इरादों के बावजूद संभवत: एमएनएस मराठियों के लिए सबसे उम्दा विकल्प नहीं है।
मुख्यत: इसकी तीन वजहें हैं :
विध्वंस की राजनीति : एमएनएस को सबसे ज्यादा प्रचार तब मिलता है, जब वह कोई नाटकीय और हिंसक कार्रवाई करती है। एक ओर तो इस तरह की हरकतें ध्यान आकर्षित करती हैं, लेकिन दूसरी ओर इनमें बहकने और फिसलने का खतरा भी होता है। अगली बार भी अपनी ओर ध्यान खींचने के लिए आपको ज्यादा तीखा रुख अपनाना पड़ता है और ज्यादा चौंकाने और हंगामा खड़ा करने वाला कोई काम करना पड़ता है।
एमएनएस विधानसभा में एक चुने हुए प्रतिनिधि को थप्पड़ मारने की हद तक जा चुकी है। वह कहानी भी जल्द ही ठंडी पड़ गई। बाद में वह और आग भड़काएंगे, भोले-भाले मासूम लोगों को नुकसान पहुंचाएंगे और जल्द ही एक सभ्य समाज की सीमाओं को भी लांघ जाएंगे। क्या यही मराठी संस्कृति है? क्या तब भी आप उनके समर्थक बने रहेंगे?
विकास में केंद्र की भूमिका : एमएनएस ने मराठी के मुद्दे को उठाया है, लेकिन लगभग हर गैरमराठी का विरोध करके उन लोगों ने यह जता दिया है कि केंद्र सरकार पर राज्य की निर्भरता के बारे में वे कितना समझते हैं। सिंचाई के प्रोजैक्ट को आगे बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र को केंद्र की सहायता की दरकार है। इस काम में हजारों करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
सच तो यह है कि एक राष्ट्र के रूप में तरक्की की दिशा में हमारा सबसे मजबूत कदम वह होगा, जब सभी राज्य आपस में मिलकर किसी एजैंडे पर काम करें। ऐसा न हो कि हर कोई अपनी अलग-अलग दिशा में चला जा रहा है।
साथ ही दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ हिंसक झड़पों से वे यह दिखा रहे हैं कि दूसरों के हितों की परवाह करने में उनकी रुचि नहीं है। वैसे भी हिंदुस्तान जैसे देश में इस तरह का रवैया बहुत अव्यावहारिक है। अगर वे लोगों की आवाज नहीं सुन सकते तो उनकी आवाज कौन सुनेगा?
वैश्वीकरण के अवसरों की उपेक्षा : मुंबई को सिर्फ मराठियों का राज्य बताने वाली और बाकी सभी को बाहरी कहने वाली एमएनएस एक व्यापक फलक पर दरअसल अपना ही नुकसान कर रही है। मौजूदा भारत में तरक्की एक-दूसरे पर निर्भरता की जमीन पर ही मुमकिन हो सकती है। वैश्विक कृषि कंपनियों को महाराष्ट्र में अपने पैर जमाने के लिए आकृष्ट किया जा सकता है और उनका स्वागत किया जा सकता है।
आधुनिक विश्व की इतनी कम समझ दरअसल एमएनएस की क्षमताओं पर शुबहा पैदा करती है। एमएनएस ने जो मुद्दे उठाए हैं, वे उसे कितनी दूर लेकर जा पाएंगे? बहुत से मराठी अभी भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को वोट नहीं देते। यही लोग हैं, जो सबसे ज्यादा मददगार हो सकते हैं। वे अपने समुदाय के समक्ष उपलब्ध विकल्पों पर विचार करके और उसके नफे-नुकसान के बारे में बातचीत करके मदद कर सकते हैं।
आज एक सुलझी हुई और संतुलित मराठी आवाज की जरूरत है। इस संदर्भ में हाल ही में सचिन तेंदुलकर की सहिष्णुतापूर्ण टिप्पणी ध्यान देने लायक है: गैरमराठियों को खलनायक बताने की बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि अपनी जमीन से उखड़े लोगों को ठोस आधार कैसे मिल सकता है।
अगर आप और गहरे जाएंगे तो पाएंगे कि आप ही की तरह सारे एमएनएस समर्थक जिस चीज की तलाश में हैं वह है एक बेहतर जिंदगी। यह सामूहिक इच्छा अकेले ही इस चीज के लिए काफी है कि हम सब एकजुट हों।










