अब विकृति का जमाना आया
इंदौर. वे कहते हैं मशीन के आने पर एनॉलॉग संगीत दूर चला गया और डिजिटल संगीत का जमाना आ गया है। अब आत्मा नहीं देह का संगीत पॉपुलर है। गायक हाई पिच पर गाते हैं क्रूर और कर्कश आवाजों का जमाना है यह। सॉफ्ट म्यूजिक भी ऐसे ही गायब हो चुका है। यह सब वक्त के हिसाब से डिसाइड हुआ है।
हम फिल्म जगत में शौक के चलते आए, पिताजी व्यवसायी थे, उन्होंने हमें छूट दी कि हम जो चाहें करें, लेकिन जो भी करें वह बताएं भी। पहले स्कूल के समय से ही हमें संगीत के कार्यक्रम में बुलाया जाता था। हम लोग भी स्टेज पर म्यूजिक देते थे और वहीं से हमें संगीत का चस्का लगा।
स्कूल से कार्यक्रम देने जाने पर हमें बढ़िया दूध और अच्छा खाना मिलता था, हमारे लिए यही संतोष की बात हुआ करती थी। हमारे दादा-नाना गुजरात में लोक संगीत गाया करते थे, सो हमारे पास कल्चर तो था ही। भाई कल्याणजी भी बोर्डिग में रहते थे और बैंड में शामिल थे।
पहले कल्याणजी ने वीरजी शाह के नाम से फिल्मों में संगीत दिया। हमने संगीत के लोकल नोट्स पर ध्यान दिया। कल्याणजी ने बीन बजाई वह भी नॉनफेमस गायकों को लेकर। नागिन फिल्म आने के बाद हमारी लोकप्रियता बढ़ गई। विक्टोरिया 203 में हमने नया वाद्य लिया जिससे तीखी आवाज निकाली, वह हमारे विदेश में रह रहे मित्रों ने भेजा था।
अनुभव के गीत हैं हमारे
मेरे एक मित्र का देहांत हो गया था। उसे श्मशान ले जाने की तैयारियां चल रही थीं तब मेरे मुंह से एक गीत का मुखड़ा निकला ए साथी रे.. तेरे बिना भी क्या जीना, यह गाना विभिन्न सिचुएशन्स में कई लोगों पर लागू होता है।
मेरी प्यारी बहनिया, बाबुल प्यारे, मेरा जीवन कोरा कागज कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे आदि ऐसे ही गाने हैं जो सब अवसरों पर अलग-अलग तरीके से लागू होते हंै। पहले के गायक भी डिवोटेड होते थे। कैरेक्टर के अनुरूप उनका गाना होता था, अब यह सब नहीं है।










